बृहस्पतिवार, 11 मार्च 2010

अज्ञानता और अचिंतन का अन्धकार

ईश्वर, धर्म, अद्यात्म, आदि, यदि हम इन शब्दों को वर्तमान में प्रचलित अर्थों में लें, मानवता में अचिंतन के सूत्रपात सिद्ध होते हैं. ये सभी शब्द भारत के प्राचीन वेदों और शास्त्रों में पाए जाते हैं किन्तु वहाँ इनके अर्थ वर्तमान में प्रचलित अर्थों से भिन्न हैं. इन शब्दों के नए अर्थ जानबूझकर भिन्न किये गए ताकि ज्ञान के अकूत भण्डार इन देव ग्रंथों के ज्ञान को सदा सदा के लिए लुप्त कर दिया जाये और लोग इनमें उन विकृत भावों को ही देख पायें जो शब्दार्थ परिवर्तन से इन पर थोपे गए हैं. इससे तीन लाभ हुए -
  1. वेदों और शास्त्रों का वास्तविक ज्ञान लुप्त हो गया, 
  2. वेदों और शास्त्रों की प्रमाणिकता का दुरूपयोग कर षड्यंत्रकारियों ने अपना भ्रम फ़ैलाने का लक्ष्य प्राप्त किया.
  3. निरक्षर षड्यंत्रकारियों को अपने मंतव्य हेतु कोई नया ग्रन्थ नहीं लिखना पड़ा. परिणामस्वरूप, देवों के विज्ञानं और इतिहासपरक ग्रन्थ - वेद और शास्त्र, धर्म ग्रन्थ मने जाने लगे.        
इसी आधार पर श्रीमद भगवद्गीता में जन समुदाय को दो वर्गों में दर्शाया गया है - धर्मक्षेत्रे और कुरुक्षेत्रे, अर्थात धर्मावलम्बी और कर्मावलम्बी. इसी से सिद्ध होता है कि धर्म और कर्म परस्पर विरोधी धारणाएं हैं. धर्म का आडम्बर चाहे जितना भी किया गया हो, कर्म के महत्व को कभी कम नहीं किया जा सका. इससे लोगों में असमंजस उत्पन्न हुआ कि वे धर्म को अपनाएं या कर्म को. अपने परिश्रम के बल पर आजीविका चलाने और मानव सभ्यता का विकास करने के पक्षधरों ने कर्म का मार्ग अपनाया तो समाज को ब्रमित कर उसे अज्ञानता के अचिंतन में निमग्न करते हुए उस पर मनोवैज्ञानिक हनन के माध्यम से राजनैतिक शासन करने वालों ने धर्म को अपनाया. यहीं से आरम्भ हुआ मानवता के संगठित शोषण का इतिहास.

आज का भारतीय समाज तीन वर्गों में विभाजित देखा जा सकता है - नगण्य कर्मावलम्बी, संगठित धर्मावलम्बी और असंख्य अज्ञान और अचिंतन के अन्धकार से भ्रमित जनसाधारण. कर्मावलम्बी परिश्रम करते हैं और अपनी बुद्धि का सदुपयोग करते हुए मानवीय गुणों का विकास करते हैं, धर्मावलम्बी संगठित रूप में तीसरे वर्ग का शोषण करते हुए वैभव भोगते हैं और अपनी बुद्धि का दुरूपयोग करते हुए समाज को भ्रमित एवं ईश्वर के नाम से आतंकित करने एवं रखने हेतु नए नए मार्ग खोजते हैं. तीसरा वर्ग वस्तुतः शोषित है और असमंजस में है, वह कर्म करता है अपनी आजीविका हेतु किनता इससे प्राप्तियों का बहुलांश संगठित धर्मावलम्बी हड़प लेते हैं  आजीविका के संकट से तृस्त यह वर्ग आतंकित भी है और अचिंतन के अन्धकार में निमग्न भी. चूंकि यह समाज का बहुत बड़ा अंश है, इसलिए इसी की स्थिति को समाज की सामान्य स्थिति माना जा सकता है.

समाज का शोषित तीसरा अंश पूरी तरह निर्धन नहीं है, इसमें अनेक धनवान भी सम्मिलित हैं किन्तु ये बौद्धिक कंगाल हैं क्योंकि ये तो यह भी नहीं जानते कि कितना कमाएं और किसलिए. कमाई की अनंत यात्रा पर बस चलते रहते हैं - धनवान होते हुए भी अनंत धन-सम्पदा की कामना लिए हुए अपनी कमाई कोई सदुपयोग भी नहीं कर पाते. संगठित धर्मावलम्बी इन्ही की अज्ञानता, अचिंतन और सम्पन्नता का शोषण करते हुए वैभवपूर्ण जीवन जीते हैं.           

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