<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-4702532971528007953</id><updated>2012-02-16T12:08:19.190+05:30</updated><category term='न्याय व्यवस्था'/><category term='खरोष्टि'/><category term='विष्णुगुप्त चाणक्य'/><category term='कृष्ण छल'/><category term='जनमानस'/><category term='ग्रीक'/><category term='शक्ति-पूजा'/><category term='जातीय विभाजन'/><category term='जमींदारी'/><category term='अथेन्स'/><category term='शास्त्रीय संस्कृत'/><category term='लक्ष्मी'/><category term='मनोवैज्ञानिक साम्राज्य'/><category term='आरक्षण'/><category term='हैदराबाद'/><category term='चित्रगुप्त'/><category term='देवीदुर्गा'/><category term='अध्यात्म'/><category 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href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>राम बंसल/Ram Bansal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10182040999161020512</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/Sy4At1JB9aI/AAAAAAAAAAU/fJMHsDrudkE/S220/Ram30.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>45</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4702532971528007953.post-1708197562110985539</id><published>2010-12-21T09:10:00.000+05:30</published><updated>2010-12-21T09:10:45.880+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मनोवैज्ञानिक साम्राज्य'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ईश्वर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='निष्काम-कर्म'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भक्ति'/><title type='text'>भक्ति का ढकोसला</title><content type='html'>भक्ति, ईश्वर की अथवा अन्य किसी महापुरुष की, भारत में दीर्घ काल से प्रचलित है, बिना इसका वास्तविक अर्थ समझे अथवा बिना&amp;nbsp;इसे सार्थक बनाए. इसका अर्थ बस यह लिया जाता है कि इष्टदेव पर यदा-कदा कुछ फूल समर्पित कर दिए जाएँ अथवा उसके नाम पर कुछ लाभ कमा लिया जाए भक्ति की इस कुरूपता का मूल कारण यह है कि भक्ति का आरम्भ ही स्वार्थी लोगों ने अपने हित-साधन हेतु किया. अन्यथा किसी भी व्यक्ति को किसी की भक्ति की कोई आवश्यकता नहीं है. उसे तो बस निष्ठावान रहते हुए अपना कर्म करना चाहिए.&amp;nbsp;भक्ति ईश्वर की परिकल्पना की एक व्युत्पत्ति है और उसी प्रकार निरर्थक है जिस प्रकार कि ईश्वर की परिकल्पना. किन्तु ये दोनों एक दूसरे के पूरक और पोषक होने के कारण स्वार्थी समाज द्वारा निरंतर पनापाये जा रहे हैं.&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/TRAhreskzHI/AAAAAAAAAO0/Cvf-3l6NNHw/s1600/devotion.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="270" src="http://4.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/TRAhreskzHI/AAAAAAAAAO0/Cvf-3l6NNHw/s400/devotion.jpg" width="400" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;भारत में केवल भक्ति ही है जो निरंतर पनप रही है क्योंकि यह मनुष्य को दीनहीन बनाती है, जो इसे पनपाने वालों के लिए वरदान सिद्ध होता है, वे लोगों पर&amp;nbsp;सरलता से अपना मनोवैज्ञानिक साम्राज्य बनाए रखते हैं. भक्ति की सदैव विशेषता रही है इसका पोषण करने वाले स्वयं कभी किसी के लिए&amp;nbsp;भक्ति भाव&amp;nbsp;नहीं रखते, क्योंकि वे इसकी निरर्थकता जानते हैं. वे इसे&amp;nbsp;बस एक व्यवसाय के रूप में विकसित करते रहते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत में भक्ति का आरम्भ देवों और यवन-समूह के मध्य&amp;nbsp;महाभारत संघर्ष के समय हुआ जो यवन-समूह द्वारा किया गया. तभी ईश्वर के वर्तमान अर्थ&amp;nbsp;की परिकल्पना की गयी और कृष्ण को ईश्वर का अवतार घोषित किया गया और लोगों को उसकी भक्ति में लीं रहने के लिए प्रोत्साहित किया गया. कृष्ण ने भी बढ़-चढ़ कर स्वयं को विश्व का सृष्टा और न जाने क्या-क्या कहा. उसी समय राम की महिमा भी थी किन्तु राम ने कभी कहीं स्वयं को दिव्य शक्ति आदि कुछ नहीं कहा. यही विशेष अंतर है जो नकली और असली महापुरुषों में होता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राम देव जाति के प्रमुख थे और लोगों को परिश्रम करने के लिए प्रोत्साहित करते थे, काल्पनिक&amp;nbsp;दिव्य शक्तियों की&amp;nbsp;भक्ति आदि उनके जीवन में कहीं नहीं पायी जाती. वे निष्ठापूर्वक सम्मान करते थे वह भी पार्थिव व्यक्तित्वों का. यही उनके लिए श्रेष्ठ मानवीय&amp;nbsp;मार्ग था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत में भक्ति के प्रचार-प्रसार का परिणाम देश और समाज के लिए अनेक रूपों में घातक सिद्ध हुआ - लोग अकर्मण्य बने, शत्रुओं ने आक्रमण किये और लोग उनके अत्याचारों को दीन-हीन बने सहते रहे, देश हजारों वर्ष गुलाम बना रहा - वह भी चोर-लुटेरी जातियों का.&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.amazon.com/How-History-Made-Mind-Objective/dp/0812695364?ie=UTF8&amp;amp;tag=httpbhaaratta-20&amp;amp;link_code=bil&amp;amp;camp=213689&amp;amp;creative=392969" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;" target="_blank"&gt;&lt;img alt="How History Made the Mind: The Cultural Origins of Objective Thinking" src="http://ws.amazon.com/widgets/q?MarketPlace=US&amp;amp;ServiceVersion=20070822&amp;amp;ID=AsinImage&amp;amp;WS=1&amp;amp;Format=_SL160_&amp;amp;ASIN=0812695364&amp;amp;tag=httpbhaaratta-20" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;img alt="" border="0" height="1" src="http://www.assoc-amazon.com/e/ir?t=httpbhaaratta-20&amp;amp;l=bil&amp;amp;camp=213689&amp;amp;creative=392969&amp;amp;o=1&amp;amp;a=0812695364" style="border: none !important; margin: 0px !important; padding: 0px !important;" width="1" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भक्ति में आस्था होने से व्यक्ति की कर्मठता दुष्प्रभावित होती है क्योंकि वह अपने कर्म से अधिक ईश्वर की कृपा पर आश्रित हो जाता है. जन-मानस पर&amp;nbsp;भक्ति का सर्वाधिक घातक प्रहार निष्काम-कर्म की परिकल्पना द्वारा हुआ, जिसमें लोगों को परिणाम से निरपेक्ष रहते हुए और सर्वस्व को ईश्वर को समर्पित करते हुए कर्म करने का उपदेश दिया गया. जबकि व्यवहार में कभी भी किसी भी व्यक्ति ने बिना परिणाम की आशा के कोई कर्म नहीं किया है. यदि कोई करता भी है तो कर्म में उसकी आस्था क्षीण ही रहती है और वह अपने कर्म को उत्तम तरीके से नहीं कर पाता.&amp;nbsp;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4702532971528007953-1708197562110985539?l=bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/feeds/1708197562110985539/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/12/blog-post.html#comment-form' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/1708197562110985539'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/1708197562110985539'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/12/blog-post.html' title='भक्ति का ढकोसला'/><author><name>राम बंसल/Ram Bansal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10182040999161020512</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/Sy4At1JB9aI/AAAAAAAAAAU/fJMHsDrudkE/S220/Ram30.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/TRAhreskzHI/AAAAAAAAAO0/Cvf-3l6NNHw/s72-c/devotion.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4702532971528007953.post-5923280268224879381</id><published>2010-11-10T16:33:00.000+05:30</published><updated>2010-11-10T16:33:24.829+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सकल सम्पन्नता'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भिखावृत्ति'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='स्वतंत्र भारत'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='निर्धनता'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गुप्त काल'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दरिद्रता'/><title type='text'>दरिद्रता और निर्धनता</title><content type='html'>प्रायः 'दरिद्रता' और 'निर्धनता' को पर्यायवाची के रूप में उपयोग किया जाता है किन्तु इन दोनों शब्दों में भारी अंतराल है. 'निर्धनता' एक भौतिक स्थिति है जिसमें व्यक्ति के पास धन का अभाव होता है किन्तु इससे उसकी मानसिक स्थिति का कोई सम्बन्ध नहीं है. निर्धन व्यक्ति स्वाभिमानी तथा परोपकारी हो सकता है. 'दरिद्रता' शब्द&amp;nbsp;भौतिक स्थिति से अधिक मानसिक स्थिति का परिचायक है जिसमें व्यक्ति दीन-हीन अनुभव करता है जिसके कारण उसमें&amp;nbsp;और अधिक पाने की इच्छा सदैव बनी रहती है. अनेक धनवान व्यक्ति भी दरिद्रता से पीड़ित होते हैं.&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/TNp76rClzFI/AAAAAAAAANc/48UCHAJbseU/s1600/devadasi2_26.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="266" src="http://4.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/TNp76rClzFI/AAAAAAAAANc/48UCHAJbseU/s400/devadasi2_26.jpg" width="400" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;निर्धनता व्यक्ति की व्यक्तिगत स्थिति होती है, किन्तु दरिद्रता व्यक्ति की सामाजिक स्थिति होती है और उसी से&amp;nbsp;पनपती है. किसी समाज में सदस्यों की आर्थिक स्थिति में अत्यधिक अंतराल होने से समाज में दो प्रकार से दरिद्रता विकसित होती है. प्रथम, धनाढ्य व्यक्ति निर्धनों का शोषण करते है और उन्हें पीड़ित करते हैं, जिससे पीड़ितों में दरिद्रता का भाव पनपने लगता है. द्वितीय, व्यक्ति अपने से अधिक धनवान व्यक्तियों से अधिक धनवान होने की चाह में पर्याप्त धनवान होते हुए भी अपने अन्दर दरिद्रता का भाव विकसित करने लगती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गुप्त काल के&amp;nbsp;प्राचीन भारत सर्वांगीण रूप से धनवान था. समाज में जो धनी नहीं भी थे, वे भी प्रसन्न रहते थे क्योंकि कोई उनका शोषण नहीं करता था. इस लिए कुछ लोग निर्धन अवश्य रहे होंगे किन्तु कोई भी दरिद्र नहीं था. गुप्त वंश के शासन के बाद भारत में शोषण का युग आरम्भ हुआ, समाज को वर्णों और जातियों में विभाजित किया गया, कुछ लोगों से बलात तुच्छ कार्य कराकर उन्हें अस्पर्श्य घोषित किया गया. समाज के धर्म और विधानों को कुछ प्रतिष्ठित वर्गों के हित में बनाया गया, जिससे कुछ साधनविहीन वर्गों का बहु-आयामी शोषण करके उन्हें दरिद्र बना दिया गया. यह क्रम तब से स्वतन्त्रता पर्यंत चलता रहा. अतः निर्धन वर्ग दरिद्र भी बन गया, जिसके कारण 'निर्धन' और 'दरिद्र' शब्द परस्पर पर्याय माने जाने लगे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्वतन्त्रता के बाद यद्यपि शासन तथाकथित प्रतिष्ठित वर्गों के हाथों में ही रहा, तथापि सामाजिक&amp;nbsp;स्थिति में अंतर लाया गया किन्तु इस अंतर को सकारात्मक नहीं कहा जा सकता. विदेशियों द्वारा शोषण का अंत हुआ इसलिए देश की&amp;nbsp;सकल सम्पन्नता विकसित हुई जो कुछ वर्गों में ही वितरित रही. अन्य भारतीय समाज के वर्ग इस सम्पन्नता से वंचित ही रहे. तथापि देश के&amp;nbsp; संपन्न वर्गों के उपभोगों का अपरोक्ष प्रभाव अन्य वर्गों की सम्पन्नता पर भी पड़ा जिससे अन्य वर्गों की निर्धनता भी घटने लगी. आज भारत केव अधिकाँश लोगों को भर पेट भोजन, तन ढकने को वस्त्र और शरण हेतु भवन उपलब्ध हैं इसलिए देश में निर्धनता कम हुई है. तथापि दरिद्रता का असीमित विकास हुआ है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्वतन्त्रता के बाद की सरकारों ने दलित वर्गों के उत्थान के नाम पर एवं भृष्टाचार के माध्यम से स्वयं और अधिक धनवान बनने के लिए&amp;nbsp;अनेक कल्याणकारी योजनाएं चलायी हैं जिनके माध्यम से &amp;nbsp;दलितों को भिक्षा के रूप में कुछ आर्थिक सहायता&amp;nbsp;देकर उनकी निर्धनता को घटाया अवश्य है किन्तु उनमें भिखावृत्ति विकसित करते हुए&amp;nbsp;दरिद्रता का विकास किया है. अब वे सदैव यही आस लगाये बैठे रहते हैं कि शासक वर्ग उनपर कुछ और कृपा करेंगे. इन वर्गों को शिक्षित कर स्वावलंबी बनने के कोई प्रयास नहीं किये गए हैं. इससे इनकी दरिद्रता दूर होती. यह&amp;nbsp;भृष्ट शासक वर्ग के प्रतिकूल सिद्ध होता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.amazon.com/Gender-Sexuality-India-Selling-ebook/dp/B0037RDPFA?ie=UTF8&amp;amp;tag=httpbhaaratta-20&amp;amp;link_code=bil&amp;amp;camp=213689&amp;amp;creative=392969" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;" target="_blank"&gt;&lt;img alt="Gender and Sexuality in India: Selling Sex in Chennai" src="http://ws.amazon.com/widgets/q?MarketPlace=US&amp;amp;ServiceVersion=20070822&amp;amp;ID=AsinImage&amp;amp;WS=1&amp;amp;Format=_SL160_&amp;amp;ASIN=B0037RDPFA&amp;amp;tag=httpbhaaratta-20" /&gt;&lt;/a&gt;स्वतंत्र भारत के&amp;nbsp;शासक वर्ग ने भृष्टाचार के माध्यम से&amp;nbsp;निर्धनों का ही नहीं धनवान लोगों का भी शोषण किया है. जिससे धनवान लोगों में भी असुरक्षा की भावना विकसित हुई है जिसके निराकरण के लिए वे और अधिक धन कमाने का प्रयास करते हैं जो शासक वर्ग द्वारा उनसे हड़प लिया जाता है. इस असुरक्षा की भावना तथा और अधिक धन कमाने की लालसा ने धनवान वर्गों को भी दरिद्र बना दिया है यद्यपि उनके पास धन का नितांत अभाव नहीं है.&lt;br /&gt;&lt;img alt="" border="0" height="1" src="http://www.assoc-amazon.com/e/ir?t=httpbhaaratta-20&amp;amp;l=bil&amp;amp;camp=213689&amp;amp;creative=392969&amp;amp;o=1&amp;amp;a=B0037RDPFA" style="border: none !important; margin: 0px !important; padding: 0px !important;" width="1" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस प्रकार हम देखते हैं कि भारत में सकल&amp;nbsp;सम्पन्नता विकसित होने के बाद भी राजनैतिक अव्यवस्था के कारण दरिद्रता का सतत विकास हो रहा है जो समाज के निर्धन वर्ग के साथ-साथ धनवान वर्ग को भी ग्रसित कर रही है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4702532971528007953-5923280268224879381?l=bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/feeds/5923280268224879381/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/11/blog-post_10.html#comment-form' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/5923280268224879381'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/5923280268224879381'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/11/blog-post_10.html' title='दरिद्रता और निर्धनता'/><author><name>राम बंसल/Ram Bansal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10182040999161020512</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/Sy4At1JB9aI/AAAAAAAAAAU/fJMHsDrudkE/S220/Ram30.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/TNp76rClzFI/AAAAAAAAANc/48UCHAJbseU/s72-c/devadasi2_26.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4702532971528007953.post-5328634572476064368</id><published>2010-11-02T00:22:00.000+05:30</published><updated>2010-11-02T00:22:39.394+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अर्थ व्यवस्था'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विष्णुगुप्त चाणक्य'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='स्वतन्त्रता'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मनोवैज्ञानिक शासन'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आरक्षण'/><title type='text'>राजनीति : स्वतंत्रता के बाद</title><content type='html'>भारत स्वतंत्र हुआ क्योंकि अंग्रेज़ी शासन द्वारा शोषण&amp;nbsp;के लिए तब यहाँ कुछ शेष नहीं बचा था, तथापि स्वतन्त्रता की मांग की गयी और उसे स्वीकार कर लिया गया. किन्तु स्वतन्त्रता की मांग करने वालों ने कभी यह नहीं सोचा&amp;nbsp;कि वे स्वतंत्र होने के बाद देश कैसे चलाएंगे. मेरे विचार से&amp;nbsp;भारत के इतिहास की यह भयंकरतम भूल थी जिसका मूल्य हम अब तक चुकाते रहे हैं और न जाने कब तक चुकाते रहेंगे. उक्त भूल का परिणाम यह हुआ कि स्वतन्त्रता के बाद से ही भारत पर षड्यंत्रों का शिकंजा कसा जाने लगा जिन्हें 'राजनीति' कहा गया. नाम मात्र के लिए जन्तात्न्त्र की स्थापना की गयी किन्तु शासन उन परिवारों&amp;nbsp;को सौंप दिया गया जो स्वतन्त्रता संग्राम में&amp;nbsp;ब्रिटिश शासन के पक्षधर रहे थे.&amp;nbsp;अतः स्वतन्त्रता के बाद भी&amp;nbsp;शासन की रीति-नीति में कोई परिवर्तन नहीं किया गया. सत्ता के गलियारों में&amp;nbsp;जो परिवर्तन हुआ वह यह था कि अनुशासित ब्रिटिश लोगों का स्थान अनुशासनहीन भारतीयों ने ले लिया.&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/TM8MZkOkY2I/AAAAAAAAANI/7L8byO47Iws/s1600/poverty.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="291" src="http://2.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/TM8MZkOkY2I/AAAAAAAAANI/7L8byO47Iws/s400/poverty.jpg" width="400" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;कोई देश हो अथवा उसकी राजनीति, सुचारू अर्थ व्यवस्था के बिना अपने पैरों पर खडी नहीं रह सकती. यह सार्वभौमिक सत्य भारतीय राजनीति के आदि-पुरुष विष्णुगुप्त चाणक्य ने जान लिया था और अपने ग्रन्थ अर्थशास्त्र के माध्यम से उन्होंने भारत की अर्थ व्यवस्था सुचारू बनाए रखने के लिए सुदृढ़ नींव रख दी थी. उन्होंने समाज का एक वर्ग, जो उस समय शासक वर्ग भी था, इसी कार्य में लगा दिया था. यह वर्ग आज भी अर्थ व्यवस्था में लगा हुआ है किन्तु इसके अहिंसक होने के कारण&amp;nbsp;शासन में इसके लिए कोई स्थान नहीं रह गया है. इसी वर्ग की देन है कि भारत की राजनीति में भीषण उतार-चढ़ाव होने पर भी इसकी सकल&amp;nbsp;अर्थ व्यवस्था सदैव सुदृढ़ रही है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत में एक जाति ऐसी रही है जो सदैव सत्तासीन जातियों से घनिष्ठ सम्बन्ध बनाये रखती रही है, अधिकांशतः राजगुरु बनकर. इस कारण से यह जाति भारत पर अपना मनोवैज्ञानिक शासन सदा बनाये रही है. अतः यह&amp;nbsp;स्वभावतः सत्ताच्युत रहना पसंद नहीं करती. विगत २००० वर्षों से इस जाति ने&amp;nbsp;भारतीय समाज को इस प्रकार विभाजित किया कि इसका वर्चस्व सदा बना रहे. समाज में अछूत, दलित, कमीन, आदि वर्ग इसी जाति की देन हैं.&amp;nbsp;स्वतन्त्रता के बाद से ही भारतीय राजनीति में यह जाति अग्रणी रही और अपनी शोषण-परक रीति-नीतियों के कारण भारतीय राष्ट्र की संपदा पर अपना प्रभुत्व बढाती रही. आज भी यह जाति समाज की अग्रणी और&amp;nbsp;धनाढ्य है जबकि अर्थ व्यवस्था चलाने&amp;nbsp;में इसका कोई योगदान नहीं रहा है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्वतंत्र भारत के संविधान में&amp;nbsp;दीर्घ काल से पद-दलित वर्गों के लिए आरक्षण व्यवस्था इसलिए की गयी ताकि ये शिक्षित और सभ्य होकर देश के विकास में अपना योगदान दे सकें. किन्तु शासकों ने&amp;nbsp;इन्हें न शिक्षा लेने दी और न ही किसी अन्य प्रकार से सुयोग्य होने दिया. इनके कल्याण और&amp;nbsp;विकास के नाम पर इन्हें जो भिक्षा&amp;nbsp;दी गयी, उसके माध्यम से इन्हें पारंपरिक भिखारी बना दिया जो विगत ६० वर्षों से शासकों द्वारा दी जाने वाली भीख पर पल रहे हैं और भारत की अर्थ व्यवस्था पर एक भारी बोझ हैं. इन्हीं में से कुछ लोग इनकी वोटों के ठेकेदार बनते रहे हैं और सत्ताधारी लोगों के साथ रंगरेलियां मनाते&amp;nbsp;रहे हैं. शासकों और इनके ठेकेदारों का हित इसी में है कि वे इन दलितों को दलित ही बनाए रखकर इनकी वोटों के माध्यम से सत्तालाभ प्राप्त करते रहें. इसके लिए इन्हें निरंतर भीख दिए जाने की स्थायी व्यवस्था कर दी गयी है. विगत ६० वर्षों में आरक्षण व्यवस्था का विस्तार इसी भीख दिए जाने की व्यवस्था का अंग है.&amp;nbsp;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; margin-right: 0px; margin-top: 0px;"&gt;विगत २५०० वर्षों में भारत में अनेक विदेशी जाति बसती रही हैं जिनमें से अनेक जंगली जातियां थीं और जो स्वभावतः हिंसक थीं जिसके लिए जिन्हें सैनिक जातियां कहा जाता है. भारत में ये सैनिक जातियां युद्ध के लिए आयी थीं और इनका किसी मानवीय गुण से कोई परिचय नहीं था. मानवीय शासन के अधीन रहकर ये युद्ध करने में पारंगत सिद्ध होती थीं किन्तु स्वतंत्र रहकर ये अपने मूल हिंसक&amp;nbsp;स्वभाव के कारण अपने जंगली व्यवहार पर उतर आती थीं. इनकी स्थिति आज भी ऐसी ही है और ये भारत की वर्तमान राजनीति में सक्रिय हैं और राजनीति में वही होता है जो ये जातियां चाहती हैं. .&lt;/div&gt;&lt;div style="margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; margin-right: 0px; margin-top: 0px;"&gt;&lt;a href="http://www.amazon.com/Kautilyas-Arthashastra-Fianancial-Management-Governance/dp/8184950292?ie=UTF8&amp;amp;tag=httpbhaaratta-20&amp;amp;link_code=bil&amp;amp;camp=213689&amp;amp;creative=392969" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;" target="_blank"&gt;&lt;img alt="Kautilya's Arthashastra/The Way of Fianancial Management and Economic Governance" src="http://ws.amazon.com/widgets/q?MarketPlace=US&amp;amp;ServiceVersion=20070822&amp;amp;ID=AsinImage&amp;amp;WS=1&amp;amp;Format=_SL160_&amp;amp;ASIN=8184950292&amp;amp;tag=httpbhaaratta-20" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;img alt="" border="0" height="1" src="http://www.assoc-amazon.com/e/ir?t=httpbhaaratta-20&amp;amp;l=bil&amp;amp;camp=213689&amp;amp;creative=392969&amp;amp;o=1&amp;amp;a=8184950292" style="border: none !important; margin: 0px !important; padding: 0px !important;" width="1" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;स्वतन्त्रता के बाद&amp;nbsp;अनुशासनहीन भारतीयों के शासन में स्वतन्त्रता ने उद्दंडता का रूप ले लिया, जनतंत्र पर&amp;nbsp;'जिसकी लाठी उसकी भैंस' वाली उक्ति चरितार्थ होने लगी, जिससे भारतीय राजनीति में हिंसा - मनोवैज्ञानिक, भौतिक, आर्थिक, आदि - का स्थान सर्वोपरि हो गया. जनतंत्र के नाम पर जो चुनाव होते हैं वे भी शोषण और हिंसा के&amp;nbsp;साए में होते हैं जिनमें वोटों को बलपूर्वक प्राप्त किया जाता है अथवा धन प्रदान कर खरीदा जाता है. यह प्रक्रिया निम्नतम स्तर ग्राम पंचायत से लेकर शीर्षस्थ स्तर भारतीय संसद तक चल रही है जिसमें कोई भी मानवीय तत्व विद्यमान नहीं है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4702532971528007953-5328634572476064368?l=bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/feeds/5328634572476064368/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/11/blog-post.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/5328634572476064368'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/5328634572476064368'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/11/blog-post.html' title='राजनीति : स्वतंत्रता के बाद'/><author><name>राम बंसल/Ram Bansal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10182040999161020512</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/Sy4At1JB9aI/AAAAAAAAAAU/fJMHsDrudkE/S220/Ram30.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/TM8MZkOkY2I/AAAAAAAAANI/7L8byO47Iws/s72-c/poverty.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4702532971528007953.post-3252303790100690761</id><published>2010-10-01T05:42:00.001+05:30</published><updated>2010-10-01T05:47:19.102+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='महाभारत'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्रथम विश्व-युद्ध'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आर्य'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सिकंदर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='वैदिक संस्कृत'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='वैज्ञानिक दृष्टिकोण'/><title type='text'>इतिहास, भावुकता और असहिष्णुता</title><content type='html'>इतिहास प्रायः कटु सत्यों का विषय होता है, न कि भावनाओं का. किन्तु इसको लोग प्रायः अपनी भावनाओं से जोड़ने लगते हैं. ऐसा करके वे इतिहास विषयक शोधों में व्यवधान उत्पन्न करते हैं. शोधों के आधार पर बड़े से बड़े और स्थापित&amp;nbsp;वैज्ञानिक सत्य भी बदलते रहते हैं तो ज्ञात&amp;nbsp;इतिहास में त्रुटि क्यों नहीं खोजी जानी चाहिए. भारत के ज्ञात इतिहास में इतनी भयंकर त्रुटियाँ हैं कि इसे विश्व स्तर पर विश्वसनीय नहीं माना जा रहा है. इसलिए हम सभी भारतीयों का कर्तव्य है कि हम इस पर शोध करें और इसे विश्वसनीय बनाएं. केवल भावनाओं के आधार पर इस विषय में कट्टरता दिखने से कोई लाभ नहीं होने वाला.&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/S-SP9zlWoyI/AAAAAAAAAIc/jUTQEEiMk1c/s1600/philosophers.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="400" src="http://3.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/S-SP9zlWoyI/AAAAAAAAAIc/jUTQEEiMk1c/s400/philosophers.jpg" width="311" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;इस विषय में&amp;nbsp;दूसरा महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि इतिहास किसी जाति अथवा धर्म का पक्षधर बने रहने से सही रूप में नहीं रचा जा सकता, इसके लिए धर्म और जाति से निरपेक्ष होने की आवश्यकता है. भारत के महाभारतकालीन&amp;nbsp;इतिहास के बारे में तो यह अतीव&amp;nbsp;सरल और सहज&amp;nbsp;इसलिए भी है कि उस समय भारत का मौलिक समाज किसी वर्तमान&amp;nbsp;धर्म अथवा जाति से सम्बद्ध नहीं था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत सहित विश्व के सभी भाषाविद और इतिहासकार जानते और मानते हैं कि वैदिक संस्कृत, जिसमें भारत के वेद और शस्त्र रचे हुए हैं, आधुनिक संस्कृत से कोई सम्बन्ध नहीं है. तथापि आज तक ऐसा कोई प्रयास नहीं किया गया कि वैदिक संस्कृत को जाना जाए. इसका&amp;nbsp;कारण और प्रमाण यह है कि आज तक वेदों और शास्त्रों का कोई ऐसा अनुवाद नहीं किया गया जो आधुनिक संस्कृत पर आधारित न हो. इस कारण से इन प्राचीन ग्रंथों के कोई भी सही अनुवाद उपलब्ध नहीं है जिनसे&amp;nbsp;भारत के तत्कालीन इतिहास की सत्यता को प्रमाणित किया जा सकता. जो भी इतिहास संबंधी सूचनाएं उपलब्ध हुई हैं वे उक्त भृष्ट अनुवादों से ही प्राप्त हुई हैं. इसी लिए वे भी भृष्ट हैं और विश्वसनीय नहीं हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महर्षि अरविन्द ने 'वेद रहस्य' नामक पुस्तक में वैदिक संस्कृत के बारे में कुछ अध्ययन किया है और संकेत दिए हैं कि वैदिक संस्कृत की&amp;nbsp;शब्दावली लैटिन और ग्रीक भाषाओं की शब्दावली से मेल खाती है. इस आधार पर मेने भी कुछ अध्ययन किये और पाया कि हम लैटिन और ग्रीक भाषाओँ के शब्दार्थों के आधार पर वेदों और शास्त्रों के सही अनुवाद प्राप्त कर सकते हैं. चूंकि मैं लैटिन और ग्रीक भाषाओँ का&amp;nbsp;महर्षि अरविन्द की तरह ज्ञानवान नहीं हूँ तथापि इन भाषाओँ के शब्दकोशों के आधार पर वेदों और शास्त्रों के कुछ अंशों के अनुवाद पाने में समर्थ हो पाया हूँ, जिसके आधार पर भारत के इतिहास के पुनर्रचना आरम्भ की है. इसमें दूसरों का भी सहयोग मिले इसी आशा से वैदिक और शास्त्रीय शब्दावली के अर्थ भी प्रकाशित करने आरम्भ किये हैं.&amp;nbsp;यदि किसी व्यक्ति की दृष्टि में वैदिक&amp;nbsp;संस्कृत के बारे में दोषपूर्ण है तो वह यह अपने विचार से सही अवधारणा प्रतिपादित करे न कि केवल दोष निकालने को ही अपना कर्तव्य समझे. किन्तु ऐसा किसी ने कुछ नहीं किया है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहाँ यह भी सभी को स्वीकार्य होगा कि 'महाभारत' युद्ध विश्व का भीषणतम सशस्त्र संग्राम था जिसमें तत्कालीन विश्व के अधिकाँश देश सम्मिलित थे. इसकी भीषणता&amp;nbsp; सिद्ध करती है कि दोनों पक्षों की जीवन-शैली, चरित्र और विचारधारा में अत्यंत गहन अंतराल थे. एक परिवार के ही दो पक्ष तो बन सकते हैं, और&amp;nbsp;दोनों के मध्य स्थानीय स्तर का संघर्ष भी हो सकता है&amp;nbsp;किन्तु उनके कारण विश्व व्यापक सशस्त्र संघर्ष नहीं हो सकता. वस्तुतः यह युद्ध पृथ्वी&amp;nbsp;का प्रथम विश्व-युद्ध था किन्तु भारत के इतिहास को विश्वसनीयता प्राप्त न होने के कारण इसे इतिहास में कोई महत्व नहीं दिया जा रहा है. यह भी हम भारतीयों को अपनी त्रुटि सुधारने का पर्याप्त कारण होना चाहिए यदि हम में लेश मात्र भी आत्म-सम्मान की भावना शेष है. आखिर भारत के इतिहास में&amp;nbsp;कहीं तो कुछ ऐसा है जिसे हम समझ नहीं पा रहे हैं और लकीर के फ़कीर बने गलत-सलत अवधारणाओं को गले लगाये बैठे हैं और मूर्खतापूर्ण आत्म-संतुष्टि प्राप्त कर रहे हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आर्य विश्व स्तर की एक महत्वपूर्ण&amp;nbsp;जाति थी जिसका भारत से गहन सम्बन्ध था, इससे भी कोई इनकार नहीं कर सकता. किन्तु भारत के इतिहास के त्रुटिपूर्ण होने के कारण आर्यों के बारे में भी अभी तक इतिहासकार एक मत नहीं हो पाए हैं. यह भी हमारे लिए डूब मरने के लिए पर्याप्त होना चाहिए था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समस्त विश्व सिकंदर को महान कहता&amp;nbsp;है तथापि उसके बारे में शोधों से ज्ञात हुआ है कि वह समलिंगी था जिसे अभी हाल में बनी हॉलीवुड&amp;nbsp;फिल्म 'अलैक्सैंदर' में प्रस्तुत किया गया है, किन्तु उसे महान कहने वाले किसी व्यक्ति ने इस फिल्म पर उंगली नहीं उठायी क्योंकि विश्व भार के समझदार लोग इतिहास को भावुकता से प्रथक रखते हैं और इस बारे में शोधों को महत्व देते हैं. इसी व्यक्ति के बारे में इंटरपोल द्वारा की गयी छान-बीनों के आधार पर सिद्ध किया गया कि सिकंदर बेहद शराबी और&amp;nbsp;नृशंस व्यक्ति था जो उसकी महानता पर प्रश्न चिन्ह लगाता है. इसे भी डिस्कवरी&amp;nbsp;चैनल पर बड़े जोर-शोर से&amp;nbsp;प्रकाशित किया गया. इसी प्रकाशन में यह संदेह भी व्यक्त किया गया कि सिकंदर की हत्या उसके गुरु अरस्तू ने की थी.&amp;nbsp;किन्तु उसका भी भावुकता के आधार पर&amp;nbsp;कोई विरोध नहीं किया गया क्यों कि इसमें भी शोधपूर्ण दृष्टिकोण को महत्व दिया गया.&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.amazon.com/World-Wars-Paul-Dowswell/dp/0794519717?ie=UTF8&amp;amp;tag=httpbhaaratta-20&amp;amp;link_code=bil&amp;amp;camp=213689&amp;amp;creative=392969" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;" target="_blank"&gt;&lt;img alt="The World Wars" src="http://ws.amazon.com/widgets/q?MarketPlace=US&amp;amp;ServiceVersion=20070822&amp;amp;ID=AsinImage&amp;amp;WS=1&amp;amp;Format=_SL160_&amp;amp;ASIN=0794519717&amp;amp;tag=httpbhaaratta-20" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;img alt="" border="0" height="1" src="http://www.assoc-amazon.com/e/ir?t=httpbhaaratta-20&amp;amp;l=bil&amp;amp;camp=213689&amp;amp;creative=392969&amp;amp;o=1&amp;amp;a=0794519717" style="border: none !important; margin: 0px !important; padding: 0px !important;" width="1" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे आलेखों का कुछ भावुक लोग विरोध कर रहे हैं किन्तु इस बारे में वे कोई शोधपरक&amp;nbsp;तर्क न देकर केवल अपनी भावनाओं को सामने ले आते हैं, जो उग्रता है न कि मानवीय अथवा वैज्ञानिक दृष्टिकोण. अतः मेरा निवेदन है कि वे कुछ शोध करें विशेष कर वैदिक संस्कृत&amp;nbsp;और आधुनिक संस्कृत&amp;nbsp;के अंतराल पर और जब भी वे इस अंतराल को समझ सकें उसके आधार पर शास्त्रों के अनुवाद करें, तभी कोई सार्थक निष्कर्ष निकाला जा सकता है. &amp;nbsp; &amp;nbsp;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4702532971528007953-3252303790100690761?l=bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/feeds/3252303790100690761/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/10/blog-post.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/3252303790100690761'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/3252303790100690761'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/10/blog-post.html' title='इतिहास, भावुकता और असहिष्णुता'/><author><name>राम बंसल/Ram Bansal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10182040999161020512</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/Sy4At1JB9aI/AAAAAAAAAAU/fJMHsDrudkE/S220/Ram30.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/S-SP9zlWoyI/AAAAAAAAAIc/jUTQEEiMk1c/s72-c/philosophers.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4702532971528007953.post-8048352889118307919</id><published>2010-09-27T21:38:00.000+05:30</published><updated>2010-09-27T21:38:12.598+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='शासन व्यवस्था'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भारत की स्वतन्त्रता'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='न्याय व्यवस्था'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जमींदारी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आर्थिक शोषण'/><title type='text'>पुलिस और क़ानून व्यवस्था - अंग्रेज़ी राज से अब तक</title><content type='html'>भारत लम्बे समय तक&amp;nbsp;अंग्रेजों के अधीन रहा और उनके शासन का मुख्य उद्येश्य आर्थिक शोषण था जिससे कि ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था सुद्रढ़ रहे और वह विश्व पर अपना शासन रख सके. भारत पर शासन से ब्रिटेन को विश्व स्तर पर किसी&amp;nbsp;राजनैतिक लाभ की आशा नहीं थी, सिवाय इसके कि भारत का विशाल क्षेत्र भी उसके शासन में कहा जाए. इस शोषण के कारण भारत में पर्याप्त संसाधन होते हुए भी आर्थिक विपन्नता व्याप्त थी.&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/TKDBVpYLS3I/AAAAAAAAAMw/jTeLmNxHIiw/s1600/india+freedom.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="327" src="http://4.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/TKDBVpYLS3I/AAAAAAAAAMw/jTeLmNxHIiw/s400/india+freedom.jpg" width="400" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;भारत तब से अब तक गाँवों का देश रहा है इसलिए आर्थिक शोषण में गाँवों का शोषण भी अनिवार्य रहा. गाँवों की आर्थिक व्यवस्था का मुख्य आधार कृषि था जो आज भी है. इसलिए ब्रिटिश शोषण का सर्वाधिक दुष्प्रभाव भारत के कृषकों पर पड़ता था जिसके लिए जमींदारी&amp;nbsp;व्यवस्था को&amp;nbsp;एक माध्यम के रूप में स्थापित किया गया. इस व्यवस्था का मुख्य लक्ष्य जमींदारों द्वारा&amp;nbsp; कृषकों की भूमि हड़पना रहा जिसके लिए जमींदार अधिकृत थे और इसके लिए वे ब्रिटिश सरकार को धन प्रदान करते थे. यद्यपि जमींदार कृषकों से भी भूमिकर वसूल कर ब्रिटिश सरकार को प्रदान करते थे किन्तु ब्रिटिश आय में&amp;nbsp;इसका अंश अल्प था. इस प्रक्रिया में जमींदार और अधिक धनवान और बड़े&amp;nbsp;भूस्वामी&amp;nbsp;बनते गए और कृषक निर्धन और भूमिहीन.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उक्त जमींदारी व्यवस्था के सञ्चालन&amp;nbsp;में लोगों में&amp;nbsp;पुलिस का आतंक भी सम्मिलित था जिससे कि लोग उक्त आर्थिक शोषण के विरुद्ध अपना स्वर बुलंद करने योग्य ही न रहें. इसके लिए पुलिस को निरंकुश शक्तियां प्रदान की गयीं जिनका उपयोग जमींदारों के पक्ष में किया जाता था. इसी प्रकार&amp;nbsp;न्याय व्यवस्था भी जन साधारण के&amp;nbsp;आर्थिक शोषण हेतु ही&amp;nbsp;नियोजित थी. अपनी दमनात्मक शक्तियों के कारण उस समय पुलिस और न्याय व्यवस्था ही जन साधारण के विरुद्ध&amp;nbsp;ब्रिटिश प्रशासन के प्रमुख शस्त्र थे. इस कारण से सभी क़ानून केवल शोषण-परक बनाये गए थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;१९४७ में भारत द्वारा स्वतन्त्रता प्राप्ति के समय स्वतन्त्रता की मांग करने वालों के पास अपनी शासन व्यवस्था स्थापित करने हेतु कोई रूपरेखा उपलब्ध नहीं थी. इसलिए शीघ्रता में एक संविधान रचा गया जो प्रमुखतः शोषण-परक&amp;nbsp;ब्रिटिश शासन तंत्र पर आधारित रखा गया. यही संविधान आज तक भारत पर लागू है जो पूरी तरह दमनात्मक&amp;nbsp;और शोशंपरक है. अंतर केवल इतना है कि उस समय दमन और शोषण ब्रिटेन के लिए जाते थे जबकि आज उसी प्रकार के दमन और शोषण भारतीय शासकों और प्रशासकों के हित में किये जा रहे हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यद्यपि जन साधारण को प्रसन्न करने के लिए जमींदारी व्यवस्था समाप्त कर दी गयी किन्तु तत्कालीन जमींदार परिवारों को भारत की&amp;nbsp;शासन व्यवस्था&amp;nbsp;में महत्वपूर्ण भागीदारी&amp;nbsp;दे दी गयी ताकि वे अपना शोषण पूर्ववत&amp;nbsp; जारी रख सकें. इस प्रकार भारत की स्वतन्त्रता केवल उक्त जमींदार एवं अन्य शासक&amp;nbsp;परिवारों तक सीमित रही, जन साधारण को इसका कोई सीधा लाभ नहीं मिल पाया. आज भी न्यायालयों और पुलिस को ब्रिटिश काल की&amp;nbsp;निरंकुश शक्तियां प्राप्त हैं जिसका वे पूरी तरह उपयोग कर रहे हैं.&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.amazon.com/Mother-India-Nargis/dp/B00008IAJR?ie=UTF8&amp;amp;tag=httpbhaaratta-20&amp;amp;link_code=bil&amp;amp;camp=213689&amp;amp;creative=392969" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;" target="_blank"&gt;&lt;img alt="Mother India" src="http://ws.amazon.com/widgets/q?MarketPlace=US&amp;amp;ServiceVersion=20070822&amp;amp;ID=AsinImage&amp;amp;WS=1&amp;amp;Format=_SL160_&amp;amp;ASIN=B00008IAJR&amp;amp;tag=httpbhaaratta-20" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;img alt="" border="0" height="1" src="http://www.assoc-amazon.com/e/ir?t=httpbhaaratta-20&amp;amp;l=bil&amp;amp;camp=213689&amp;amp;creative=392969&amp;amp;o=1&amp;amp;a=B00008IAJR" style="border: none !important; margin: 0px !important; padding: 0px !important;" width="1" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभी विगत सप्ताह ही मेरे क्षेत्र के&amp;nbsp;उप जिला मजिस्ट्रेट ने मुझे बिना किसी पर्याप्त कारण मेरे विरुद्ध धार्मिक कट्टरपंथी होने का आरोप लगाते हुए&amp;nbsp;अपने न्यायालय में एक वाद स्थापित कर दिया जबकि मैं लिखित साक्ष्यों के अनुसार एक धर्म-निरपेक्ष नास्तिक हूँ. इसके अंतर्गत&amp;nbsp;मुझसे कहा गया कि मैं कारागार से बचने के लिए एक बंधक पत्र पर हस्ताक्षर कर अपना दोष स्वीकार करूं, जबकि कोई क़ानून मुझे इसके लिए बाध्य नहीं करता है किन्तु उक्त मजिस्ट्रेट की निरंकुश शक्तियां मुझे बाध्य करने हेतु पर्याप्त हैं. &amp;nbsp;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4702532971528007953-8048352889118307919?l=bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/feeds/8048352889118307919/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/09/blog-post_27.html#comment-form' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/8048352889118307919'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/8048352889118307919'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/09/blog-post_27.html' title='पुलिस और क़ानून व्यवस्था - अंग्रेज़ी राज से अब तक'/><author><name>राम बंसल/Ram Bansal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10182040999161020512</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/Sy4At1JB9aI/AAAAAAAAAAU/fJMHsDrudkE/S220/Ram30.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/TKDBVpYLS3I/AAAAAAAAAMw/jTeLmNxHIiw/s72-c/india+freedom.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4702532971528007953.post-537624682565669951</id><published>2010-09-17T18:13:00.000+05:30</published><updated>2010-09-17T18:13:09.788+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कीटनाशक'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जन-स्वास्थ'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कृषि उत्पादन'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पेय जल'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='औद्योगिक प्रदूषण'/><title type='text'>जन स्वास्थ - उत्तरदायी कौन</title><content type='html'>बचपन में विगत काल में&amp;nbsp;जन साधारण के स्वास्थ के बारे में अनेक प्रकार की बातें सुनी&amp;nbsp;थीं -&lt;br /&gt;&lt;ul&gt;&lt;li&gt;गिल्टी जैसी एक महामारी फ़ैली थी जिसमें हजारों लोग बिना किसी चिकित्सा के मरे गए थे.&amp;nbsp;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;चेचक, हैजा,&amp;nbsp;उल्टी, दस्त आदि बीमारियों से अनेक बच्चे मृत्यु को प्राप्त हो जाया करते थे.&lt;/li&gt;&lt;li&gt;अधिकाँश जनसँख्या को भर पेट भोजन उपलब्ध नहीं होता था.&amp;nbsp;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;कुछ लोग इतने सशक्त थे कि भैंसे को भी पछाड़ देते थे.&lt;/li&gt;&lt;li&gt;कुछ लोगों की खुराक अत्यधिक कल्पनातीत&amp;nbsp;थी और वे सशक्त भी बहुत थे.&amp;nbsp;&lt;/li&gt;&lt;/ul&gt;&lt;div&gt;इसके बाद मैंने अपनी आँखों से देखा था कि गेंहूं की फसल उठाने के समय&amp;nbsp;कुछ&amp;nbsp;लोग पशुओं के गोबर को धोकर उससे गेंहूं प्राप्त करते थे और उससे अपना पेट भरते थे. सिहराने वाली सर्दी, भयंकर बरसात और&amp;nbsp;भरी दोपहरी में कृषि कार्य किये जाते थे जिससे अनेक लोग बीमार हो जाते थे और उन्हें चिकित्सा उपलब्ध न होने के कारण मृत्यु को गले लगाना पड़ता था. तथापि कुछ लोग अत्यधिक सशक्त और स्वस्थ थे.&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/TJNiREHas-I/AAAAAAAAAMQ/ASG6tbyORQQ/s1600/slums.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="352" src="http://1.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/TJNiREHas-I/AAAAAAAAAMQ/ASG6tbyORQQ/s400/slums.jpg" width="400" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;आज सुनता हूँ कि देश में लोगों की&amp;nbsp;औसत आयु में वृद्धि हुई है, अस्पतालों चिकित्सा के लिए&amp;nbsp;में भीड़ लगी रहती है, और सर्वोपरि प्रत्येक धनवान व्यक्ति अत्यधिक व्यस्त और निर्धन व्यक्ति अत्यधिक अभावग्रस्त है जिससे कोई भी सुखी नहीं है. परिवार टूट रहे हैं और बच्चे मार्गदर्शन के अभाव में आवारा हो रहे हैं.&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;उपरोक्त तीन स्थितियां संकेत करती हैं कि देश में स्वास्थ सेवाओं का विकास हुआ है किन्तु जनसँख्या वृद्धि&amp;nbsp;की तुलना में पर्याप्त नहीं है. जो भी चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध हैं उनके कारण मृत्यु दर कम हुई है किन्तु अधिकाँश लोग अस्वस्थ हैं, अर्थात चिकित्सा सेवाएं लोगों को&amp;nbsp;केवल जीवित रखने में सफल रही हैं, उन्हें स्वस्थ रखने की सामर्थ इन सेवाओं में नहीं है. प्राचीन काल में चाहे कुछ व्यक्ति&amp;nbsp;ही सही वे आज के स्वस्थतम व्यक्तियों से अधिक स्वस्थ थे. इससे सिद्ध यह होता है कि हमने प्रदूषण द्वारा रोगों के स्रोतों में भी वृद्धि की है और भोजन की पोषण सामर्थ भी कम हुई है.&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अच्छे स्वास्थ के लिए व्यक्ति के पास स्वास्थ चिंतन हेतु सर्व प्रथम&amp;nbsp;समय होना चाहिए जिसका आज नितांत अभाव है - धनवान और अधिक धनवान होने में व्यस्त है जब कि निर्धन जीवित बने रहने के प्रयासों में स्वास्थ चिंतन के लिए समय नहीं दे पा रहे हैं. प्राचीन काल में लोगों के पास पर्याप्त समय उपलब्ध था जिसका कुछ लोग स्वस्थ बने रहने के लिए सदुपयोग करते थे जिसके कारण ये लोग आज के स्वस्थतम लोगों की तुलना में अधिक स्वस्थ थे.&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;प्राचीन काल में सभी को पर्याप्त भोजन उपलब्ध नहीं था किन्तु जो उपलब्ध था वह आज के उपलब्ध भोजन की तुलना में अधिक स्वास्थवर्धक था. इससे सिद्ध होता है कि देश में खाद्य पदार्थों का उत्पादन बढ़ा है किन्तु इसकी गुणवत्ता में गिरावट आयी है.&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;पेय जल का स्वास्थ पर सर्वाधिक प्रभाव पड़ता है. उपरोक्त विवरणों से सिद्ध होता है कि चाहे कुछ लोगों को ही सही, प्राचीन काल में शुद्ध पेय जल उपलब्ध था जो आज किसी को भी उपलब्ध नहीं है. इसके लिए सर्वाधिक दोषारोपण औद्योगिक प्रदूषण पर किया जाता है किन्तु यह केवल नगरीय जनसँख्या के लिए ही सही कहा जा सकता है. शुद्ध पेय जल का सर्वव्यापक स्रोत भूगर्भीय जल भण्डार रहा&amp;nbsp;है - प्राचीन काल से आज तक. इससे&amp;nbsp;आज भूगर्भीय जल भी प्रदूषित सिद्ध होता है. इस प्रदूषण का जो कारण स्पष्ट है वह है कृषि क्षेत्रों में रासायनिक खादों और कीटनाशकों का उपयोग. ये कृषि उत्पादन में वृद्धि&amp;nbsp;के कारण रहे हैं किन्तु साथ ही इनसे खाद्यान्नों की गुणता में कमी आयी है.&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;मुझे अच्छी तरह याद है, आज से लगभग ५० वर्ष पूर्व टिड्डी दल ही केवल खरीफ की&amp;nbsp;फसलों को क्षति पहुंचाते थे अन्य हानिकारक कीट पतंगे नगण्य थे. किन्तु आज मेरा कटु अनुभव है कि प्रत्येक फसल को अनेक प्रकार के कीट हानि पहुंचा रहे हैं. इन्ही से फसलों की रक्षा के लिए कीटनाशक अपरिहार्य हो गए हैं. संभवतः रासायनिक खाद का उपयोग ही इन कीटों की वृद्धि का कारण है जो मिट्टी को अम्लीय बनाते हैं जिससे कीटों की संख्या&amp;nbsp;में अप्रत्याशित वृद्धि होती है.&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;जन स्वास्थ को दुष्प्रभावित करने&amp;nbsp;में औद्योगिक प्रदूषण इतना व्यापक कारण नहीं है जितना व्यापक व्यावसायिक स्तर पर उत्पादित खाद्य पदार्थ हैं. इनके उत्पादन और इन्हें लोकप्रिय बनाने में&amp;nbsp;जन-स्वास्थ की अवहेलना की जा रही है. इन पदार्थों में चबाये जाने वाले पान-मसाले और तम्बाकू उत्पाद, बिस्कुट, डबल रोटी, आदि&amp;nbsp;बेकरी उत्पाद, और&amp;nbsp;हलवाइयों द्वारा तैयार की गयी अनेक प्रकार की मिठाइयाँ प्रमुख हैं. प्राचीन काल में इनका प्रचलन नगण्य था इसलिए इनसे उत्पन्न व्याधियां भी नहीं थीं. &amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;a href="http://www.amazon.com/Pollution/dp/B001QXVHPM?ie=UTF8&amp;amp;tag=httpbhaaratta-20&amp;amp;link_code=bil&amp;amp;camp=213689&amp;amp;creative=392969" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;" target="_blank"&gt;&lt;img alt="Pollution" src="http://ws.amazon.com/widgets/q?MarketPlace=US&amp;amp;ServiceVersion=20070822&amp;amp;ID=AsinImage&amp;amp;WS=1&amp;amp;Format=_SL160_&amp;amp;ASIN=B001QXVHPM&amp;amp;tag=httpbhaaratta-20" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;img alt="" border="0" height="1" src="http://www.assoc-amazon.com/e/ir?t=httpbhaaratta-20&amp;amp;l=bil&amp;amp;camp=213689&amp;amp;creative=392969&amp;amp;o=1&amp;amp;a=B001QXVHPM" style="border: none !important; margin: 0px !important; padding: 0px !important;" width="1" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;अतः जन-स्वास्थ के लिए सर्वाधिक घातक कृषकों द्वारा&amp;nbsp;कृषि उत्पादन हेतु अपनाई गयी तकनीकें हैं जिसके लिए कृषि वैज्ञानिक उत्तरदायी हैं. दूसरा घातक प्रहार सरकार द्वारा लोगों को शुद्ध पेय जल उपलब्ध न कराकर किया जा रहा है. तीसरे स्तर पर देश के व्यवसायी हैं जो अपने लाभ के लिए जन-स्वास्थ से खिलवाड़ कर रहे हैं. &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4702532971528007953-537624682565669951?l=bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/feeds/537624682565669951/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/09/blog-post.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/537624682565669951'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/537624682565669951'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/09/blog-post.html' title='जन स्वास्थ - उत्तरदायी कौन'/><author><name>राम बंसल/Ram Bansal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10182040999161020512</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/Sy4At1JB9aI/AAAAAAAAAAU/fJMHsDrudkE/S220/Ram30.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/TJNiREHas-I/AAAAAAAAAMQ/ASG6tbyORQQ/s72-c/slums.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4702532971528007953.post-9110164253066249954</id><published>2010-08-29T15:34:00.001+05:30</published><updated>2010-08-29T15:44:46.969+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='महाभारत'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सत्यमेव जयते'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ईश्वरीय व्यवसाय'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आत्मसंतुष्टि'/><title type='text'>असत्यमेव जयते</title><content type='html'>&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: 14px; line-height: 25px;"&gt;शीर्षक देखकर चौंकिए नहीं, यह भारत का धरातलीय यथार्थ है, इसे अच्छी तरह&amp;nbsp;पहचानिए. महाभारत कथा के छल-कपटों को छिपाए रखने के लिए&amp;nbsp;'सत्यमेव जयते' का&amp;nbsp;भ्रम विकसित किया गया, जबकि सच्चाई यह है कि महाभारत में 'असत्यमेव जयते' का ही बोलबाला था. इसका परिणाम यह हुआ कि छल-कपटों के माध्यम से&amp;nbsp;जो विजयी हुए उन्ही को सत्य का अनुयायी मान लिया गया. किसी में साहस नहीं हुआ कि महाभारत में असत्य की विजय को स्वीकारता. इसका परिणाम यह हुआ कि आज भी कहा जाता है 'जो जीता वही सिकंदर'. इस प्रकार से विजय का आधार सत्य न होकर सत्य&amp;nbsp;का आधार विजय बना.&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/THowk0vvXWI/AAAAAAAAAME/_SV_9F9N2qc/s1600/mahaabharat.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="640" src="http://1.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/THowk0vvXWI/AAAAAAAAAME/_SV_9F9N2qc/s640/mahaabharat.jpg" width="480" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: 14px; line-height: 25px;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: 14px; line-height: 25px;"&gt;इस 'सत्यमेव जयते' की&amp;nbsp;भ्रमित मान्यता में बौद्धिकता का कोई उपयोग अथवा सम्मान नहीं था, इसका एकमात्र आधार सर्व व्यापक&amp;nbsp;'भय' था जो ईश्वर के नाम पर फैलाया गया और एक आतंकवादी को ईश्वर का अवतार सिद्ध किया गया. इस सिद्धि के लिए&amp;nbsp;भी असत्यमेव जयते को आधार बनाया गया. इस ईश्वर का आतंक आज तक यथावत है, जिसके परिणामस्वरूप अधिकाँश मनुष्य&amp;nbsp;इसके बारे में प्रश्न उठाने का भी साहस नहीं कर पाते.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: 14px; line-height: 25px;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: 14px; line-height: 25px;"&gt;जिस मस्तिष्क में&amp;nbsp;ईश्वर&amp;nbsp;को मान्यता प्राप्त है, उसमें बुद्धि का उपयोग निषेध होता है, वहां&amp;nbsp;केवल&amp;nbsp;आस्था ही सर्वोपरि होती है. आस्था का अर्थ होता है - किसी दूसरे व्यक्ति के कथन पर विश्वास करना और उसे बिना किसी कसौटी के सत्य स्वीकार कर लेना. जब कि बुद्धि का उपयोग कसौटी&amp;nbsp;पर परीक्षण करने में ही&amp;nbsp;होता है. महाभारत से लेकर आज तक का भारतीय जन-मानस के लिए&amp;nbsp;सबसे अधिक घातक असत्य 'ईश्वर' है जिसे उसके महाभारत कालीन अवतार से पुष्ट किया गया. यही असत्य आज तक प्रचलित है और यही असत्य&amp;nbsp;भारतीय जन-मानस द्वारा&amp;nbsp;बुद्धि के उपयोग&amp;nbsp;का&amp;nbsp;निषेध करता रहा है.&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: 14px; line-height: 25px;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: 14px; line-height: 25px;"&gt;ईश्वरीय&amp;nbsp;व्यवसाय के अतिरिक्त&amp;nbsp;विश्व में कोई ऐसा व्यवसाय नहीं है जो इतने लम्बे समय से अक्षुण चला आ रहा हो और जिसे संचालित बनाए रखने के लिए इतने अधिक संसाधनों - मानव-शक्ति, वित्तीय निवेश, आदि; का उपयोग किया जा रहा हो. यही व्यवसाय भारत में असत्य की स्थापना और उसका पोषण करता रहा है और उसे ही विजयश्री का अधिकारी सिद्ध करता रहा है. &amp;nbsp;और इस भृष्ट आचरण पर पर्दा डाले रखने के लिए 'सत्यमेव जयते' का नारा दिया गया. इसके आधार पर सत्य को विजय के योग्य न माना जाकर विजय को ही सत्य की कसौटी माना जाता रहा है.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: 14px; line-height: 25px;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: 14px; line-height: 25px;"&gt;उक्त कारण से भारतीय जनमानस सत्य से निरपेक्ष रहकर केवल विजय की अभिलाषा करता रहा है जिसके आधार पर उसे सत्य की प्रतिमूर्ति माना जा सके. इसी से फल-फूलता रहा है भारत में चारित्रिक संकट जो आज विकराल रूप में हमारे समक्ष खडा है और संपूर्ण मानवीय नैतिकता को लील रहा है.&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: 14px; line-height: 25px;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: 14px; line-height: 25px;"&gt;महाभारत में जो घटा, वही आज भारत के&amp;nbsp;प्रत्येक छोटे-बड़े समाज और शासन-प्रशासन&amp;nbsp;में घटित हो रहा है, असत्य की सर्वस्व विजय हो रही है, जनमानस कराह रहा है. उसके पास आत्मसंतुष्टि के लिए एकमात्र आश्रय यही है 'जो जैसा करेगा, वैसा भरेगा'. किन्तु उसे ज्ञान नहीं है कि यह उसका आत्मसंतुष्टि हेतु भ्रम है. इसके भ्रम होने का प्रमाण यही है कि 'जो जैसा करेगा, वैसा कब भरेगा - आज कल में, अपने जीवन के अंत में, अथवा अपने&amp;nbsp;जन्मान्तर में'. आत्मसंतुष्टि इसी में निहित है कि ऐसा असुविधाजनक&amp;nbsp;प्रश्न उठाया ही न जाए.&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.amazon.com/Phantom-Psyche-Freeing-Ourself-Passivity/dp/0741421291?ie=UTF8&amp;amp;tag=httpbhaaratta-20&amp;amp;link_code=bil&amp;amp;camp=213689&amp;amp;creative=392969" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;" target="_blank"&gt;&lt;img alt="The Phantom of the Psyche: Freeing Ourself from Inner Passivity" src="http://ws.amazon.com/widgets/q?MarketPlace=US&amp;amp;ServiceVersion=20070822&amp;amp;ID=AsinImage&amp;amp;WS=1&amp;amp;Format=_SL160_&amp;amp;ASIN=0741421291&amp;amp;tag=httpbhaaratta-20" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: 14px; line-height: 25px;"&gt;&lt;img alt="" border="0" height="1" src="http://www.assoc-amazon.com/e/ir?t=httpbhaaratta-20&amp;amp;l=bil&amp;amp;camp=213689&amp;amp;creative=392969&amp;amp;o=1&amp;amp;a=0741421291" style="border: none !important; margin: 0px !important; padding: 0px !important;" width="1" /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: 14px; line-height: 25px;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: 14px; line-height: 25px;"&gt;ऐसी निराधार आत्मसंतुष्टि जनमानस में निष्क्रियता उत्पन्न कर रही है, जिसके कारण वह किसी भी अत्याचार, भृष्टाचार, व्यभिचार, आदि के विरुद्ध संघर्ष के लिए तैयार नहीं है और ये सब दुराचार निरंतर पनप रहे हैं - बिना किसी प्रतिकार के. &amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4702532971528007953-9110164253066249954?l=bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/feeds/9110164253066249954/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/08/blog-post_29.html#comment-form' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/9110164253066249954'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/9110164253066249954'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/08/blog-post_29.html' title='असत्यमेव जयते'/><author><name>राम बंसल/Ram Bansal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10182040999161020512</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/Sy4At1JB9aI/AAAAAAAAAAU/fJMHsDrudkE/S220/Ram30.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/THowk0vvXWI/AAAAAAAAAME/_SV_9F9N2qc/s72-c/mahaabharat.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4702532971528007953.post-2267524782010428768</id><published>2010-08-22T09:48:00.000+05:30</published><updated>2010-08-22T09:48:06.661+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जातीय विभाजन'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ईश्वर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='धर्म'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ज्योतिष'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जनसँख्या विस्फोट'/><title type='text'>समाज का जातीय विभाजन</title><content type='html'>भारत में एक विशिष्ट वर्ग है जो सबसे पहले लोगों को नष्ट करता है, सफल न होने पर उन्हें&amp;nbsp;भृष्ट करता है, भृष्ट न कर सकने पर उनकी चापलूसी करता है, और इसमें भी सफल न होने पर उन्हें स्वयं का अंग घोषित कर देता है. इसी वर्ग ने लोगों को भृष्ट करने के लिए उनमें जातीय विष फैलाया - व्यवसायों को जातियों से सम्बद्ध कहकर. तदनुसार, जिसने कभी एक बार किसी विवशता में कोई तुच्छ कार्य कर लिया, उसकी सन्ततियां&amp;nbsp;सदा-सदा&amp;nbsp;के लिए शुद्र ही रहेंगी चाहे वे कितने भी महान कार्य क्यों न करें. चूंकि यह वर्ग सुविधा-संपन्न होने के कारण समाज का अगुआ बना इसलिए जातीय आधार पर इसकी सन्ततियां भी समाज की अगुआ ही बनी रहीं चाहे वे कितने भी घृणित&amp;nbsp;कार्य क्यों न करें.&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://im.rediff.com/news/2009/oct/12sld02.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="213" src="http://im.rediff.com/news/2009/oct/12sld02.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;एक उदाहरण देखिये - विष्णुगुप्त चाणक्य एक ऐसे व्यक्ति थे जिन्हें कोई पराजित नहीं कर सका. इन्हीं से भारत में गुप्त वंश का आरंभ हुआ. एक विशेष प्रयोजन के लिए इन्होने एक छद्म रूप धारण किया था - ब्राह्मण का, अर्थात एक सृजनकर्ता का. उस समय तक भारतीय समाज&amp;nbsp;का जातीय विभाजन नहीं हुआ था. इसलिए विष्णुगुप्त&amp;nbsp;की कोई जाति नहीं थी. वे युगपुरुष थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उक्त विशिष्ट वर्ग ने समाज के जातीय विभाजन के लिए एक सुप्रसिद्ध देव्ग्रंथ 'मनुस्मृति' के&amp;nbsp;भृष्ट अनुवाद और भाष्य आदि प्रकाशित कर तत्कालीन व्यवसायों को जातियां बना दिया और निर्धारित कर दिया कि जो व्यक्ति जो व्यवसाय कर रहा है उसकी सन्ततियां भी वही व्यवसाय करती रहेंगी. चूंकि यह वर्ग छल-कपट के माध्यम से वैभवशाली जीवन जी रहा था, इसलिए इसने स्वयं के लिए इसे ही व्यवसाय बना लिया. धर्म, ईश्वर, आदि के नाम पर ज्योतिष, भूत-प्रेत, जन्म-जन्मान्तर, आदि अनेक मनगढ़ंत छल-कपट पूर्ण सिद्धांतों का प्रतिपादन किया और इन्हीं के माध्यम से समाज को भ्रमित करने&amp;nbsp;को अपना व्यवसाय बना लिया. इसी वर्ग ने विष्णुगुप्त चाणक्य को ब्राह्मण&amp;nbsp;घोषित किया हुआ है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जातीय विभाजन का यह घृणित कार्य गुप्त वंश के शासन के बाद किया गया जब भारत अनेक छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित हो गया था और यह वर्ग सर्वव्यापक&amp;nbsp;राजगुरु पद पर प्रतिष्ठित हो चुका था. इसी समय आधुनिक संस्कृत का विकास किया गया जिसमें&amp;nbsp;वैदिक संस्कृत की शब्दावली का उपयोग तो किया गया किन्तु उनके अर्थ विपरीत कर प्रकाशित&amp;nbsp;दिए गए. तदनुसार वैदिक ग्रंथों के अनुवाद भी भृष्ट कर दिए गए और उनके माध्यम से धर्म, ईश्वर, ज्योतिष, आदि शब्दों के प्रदूषित अर्थ और भाव प्रकाशित कर समाज के जातीय विभाजन को बहुविध पुष्ट किया गया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उक्त पुष्टि और समाज पर उक्त वर्ग के अंकुश बने रहने के कारण भारतीय समाज का जातीय विभाजन आज तक यथावत चल रहा है, इस विभाजन का सातत्व बनाये रखने के लिए जाति के अंतर्गत ही&amp;nbsp;विवाह की&amp;nbsp;प्रथा बनायी गयी. इससे समाज में लगी&amp;nbsp; जातीय दीवारें नित्यप्रति पुष्ट होती रहती हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आरम्भ में केवल चार जातियां बनायी गयीं जिन्हें वर्ण कहा गया. उसके बाद वर्णों में जातियां और उपजातियां बनायी जाती रही हैं. इसे व्यक्त करने के लिए कहा गया है -&lt;br /&gt;'ज्यों केले के पात में, पात पात में पात, त्यों हिन्दुओं की जात में जात जात में जात'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्वतन्त्रता के बाद स्थापित तथाकथित&amp;nbsp;जनतंत्र में यह जातीय विभाजन विष का कार्य कर रहा है. चूंकि प्रत्येक व्यक्ति अपनी जाति से ही अटूट रूप से जुदा है, इसलिए वह जनतांत्रिक चुनावों में भी जाति को ही आधार बनाता है, प्रत्याशियों की सुयोग्यता पर कोई विचार नहीं किया जाता. इस कारण भारत की राजनैतिक सत्ता उन लोगों के हाथों में खिसकती जा रही है जो संतान उत्पादन में अग्रणी और शिक्षा आदि में पिछड़े हुए हैं. जाति, धर्म, लिंग आदि के आधार पर&amp;nbsp;विविध प्रकार के आरक्षण जातीय विष को और भी अधिक तीक्ष्णता&amp;nbsp;प्रदान कर रहे हैं. अपने&amp;nbsp;पारस्परिक संयोग से जातीय विभाजन और आरक्षण नित्यप्रति पुष्ट होते जा रहे हैं.&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.amazon.com/Population-Explosion-Paul-R-Ehrlich/dp/0671732943?ie=UTF8&amp;amp;tag=httpbhaaratta-20&amp;amp;link_code=bil&amp;amp;camp=213689&amp;amp;creative=392969" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;" target="_blank"&gt;&lt;img alt="The Population Explosion" src="http://ws.amazon.com/widgets/q?MarketPlace=US&amp;amp;ServiceVersion=20070822&amp;amp;ID=AsinImage&amp;amp;WS=1&amp;amp;Format=_SL160_&amp;amp;ASIN=0671732943&amp;amp;tag=httpbhaaratta-20" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;img alt="" border="0" height="1" src="http://www.assoc-amazon.com/e/ir?t=httpbhaaratta-20&amp;amp;l=bil&amp;amp;camp=213689&amp;amp;creative=392969&amp;amp;o=1&amp;amp;a=0671732943" style="border: none !important; margin: 0px !important; padding: 0px !important;" width="1" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत में जनसँख्या विस्फोट भी इसी जातीय विभाजन का परिणाम है. इसके कारण अनेक जातियां अपनी-अपनी जनसँख्या में केवल इसलिए अत्यधिक वृद्धि कर रहें हैं ताकि एक दिन देश की राजनैतिक सत्ता उनके पास सदा-सदा बनी रहे. यदि स्थिति इसी दिशा में आगे बढ़ती रही तो भारत विनाश अवश्यम्भावी है. &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4702532971528007953-2267524782010428768?l=bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/feeds/2267524782010428768/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/08/blog-post_22.html#comment-form' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/2267524782010428768'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/2267524782010428768'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/08/blog-post_22.html' title='समाज का जातीय विभाजन'/><author><name>राम बंसल/Ram Bansal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10182040999161020512</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/Sy4At1JB9aI/AAAAAAAAAAU/fJMHsDrudkE/S220/Ram30.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4702532971528007953.post-5636188309312855884</id><published>2010-08-05T14:06:00.001+05:30</published><updated>2010-08-05T14:10:31.542+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='शक्ति-पूजा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लोकतंत्र'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दया'/><title type='text'>शक्ति की पूजा और दासत्व की मनोदशा</title><content type='html'>भारत की स्वतन्त्रता के पूर्व से&amp;nbsp;आज तक जो भारत में नहीं बदला है - वह है जन-साधारण द्वारा शक्ति की पूजा और उनका दासत्व की मनोदशा. वस्तुतः इन दोनों में गहन सम्बन्ध है, इसलिए एक में परिवर्तन हुए बिना दूसरे में परिवर्तन संभव नहीं है. इस मनोदशा के मूल में शासकों और समाज के अग्रणी जनों द्वारा जन-साधारण का सतत&amp;nbsp;संस्कारण है, जो तब से अब तक यथावत किया जा रहा है. लोगों में दासत्व भाव बनाए रखने के लिए उन्हें दयनीय बना कर रखा जाता है.&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/TFp4QLJImbI/AAAAAAAAALs/O_GwputfpC8/s1600/durga-400.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://2.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/TFp4QLJImbI/AAAAAAAAALs/O_GwputfpC8/s320/durga-400.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;शक्ति-पूजा का विधि-विधान&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;मूलतः&amp;nbsp;व्यक्ति को शक्ति देना शासन नीति के विरुद्ध है. अतः लोगों को शासन के अधीन बनाये रखने के लिए उन्हें संस्कारित इस प्रकार किया जाता है कि वे स्वयं शक्तिहीन हैं और उन्हें अपनी रक्षा के लिए किसी शक्तिशाली व्यक्ति की आवश्यकता है, जिसकी उन्हें पूजा-अर्चना करनी चाहिए ताकि वह प्रसन्न रहे और यथावश्यकता&amp;nbsp;उनकी रक्षा करता रहे. ऐतिहासिक दृष्टि से भारत में&amp;nbsp;शक्ति की पूजा का आरम्भ यवनों ने किया जब विष्णुप्रिया लक्ष्मी देवी&amp;nbsp;दुर्गा के रूप में रात्रि में&amp;nbsp;उनका संहार करने निकलती थीं तो भयभीत होकर वे रात्रिभर जागते रहते थे और देवी के गुणगान करते रहते थे ताकि देवी उनपर कृपा करे और उनका संहार न करे. तब से अब तक किसी न किसी रूप में लोगों को शक्ति की पूजा के लिए संस्कारित किया जाता रहा है ताकि वे स्वयं शक्तिशाली बनने का प्रयास न करके शक्ति पर निर्भर बने रहें.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्वतन्त्रता के बाद लोगों की शत्रुओं से रक्षा का दायित्व वैधानिक रूप में सेना और पुलिस का है जो लोकतांत्रिक विधान के अनुसार लोगों के अधीन व्यवस्थित हैं. इसे लोगों द्वारा स्वयं अपनी रक्षा के लिए मात्र&amp;nbsp;कार्य विभाजन माना जा सकता है. किन्तु लोगों को पुलिस का उपयोग&amp;nbsp;करने के लिए भी किसी शक्तिशाली माध्यम की आवश्यकता होती है. इसी प्रकार प्रशासनिक अधिकारी जो जनतंत्र में लोकसेवक हैं, से अपने कार्य करने के लिए भी उन्हें सशक्त माध्यम की आवश्यकता होती है. अतः शक्ति पूजा का मूल प्रभाव यह है कि लोग अशक्त हो गए हैं और अशक्त ही बने रहना चाहते हैं. इस बाव से उन्हें दायित्व-विहीन बने रहने का&amp;nbsp;मनोवैज्ञानिक लाभ भी प्राप्त होता है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोगों&amp;nbsp;में स्वयं अशक्त बने रहने की भावना इतनी कूट-कूट कर भर दी गयी है कि उन्हें जीवन-यापन हेतु प्रत्येक कदम पर किसी न किसी सशक्त व्यक्ति की आवश्यकता बनी रहती है. इसी मनोदशा के कारण वे सदैव किसी सशक्त व्यक्ति के अनुयायी बने रहना चाहते रहते हैं, चाहे वह कितना भी दुर्जन क्यों न हो. अतः स्वतंत्र भारत की राजनीति में बलशालियों का बोलबाला है, सज्जनों और विद्वानों के लिए वहां कोई स्थान नहीं रह गया&amp;nbsp;है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.amazon.com/Mercy-Complete-Season-Taylor-Schilling/dp/B003LXM1PK?ie=UTF8&amp;amp;tag=httpbhaaratta-20&amp;amp;link_code=bil&amp;amp;camp=213689&amp;amp;creative=392969" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;" target="_blank"&gt;&lt;img alt="Mercy: Complete First Season" src="http://ws.amazon.com/widgets/q?MarketPlace=US&amp;amp;ServiceVersion=20070822&amp;amp;ID=AsinImage&amp;amp;WS=1&amp;amp;Format=_SL160_&amp;amp;ASIN=B003LXM1PK&amp;amp;tag=httpbhaaratta-20" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;b&gt;दया का&amp;nbsp;विधि-विधान&lt;img alt="" border="0" height="1" src="http://www.assoc-amazon.com/e/ir?t=httpbhaaratta-20&amp;amp;l=bil&amp;amp;camp=213689&amp;amp;creative=392969&amp;amp;o=1&amp;amp;a=B003LXM1PK" style="border: none !important; margin: 0px !important; padding: 0px !important;" width="1" /&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;भारत में निर्धन और निस्सहाय पर दया करना प्रत्येक समर्थ व्यक्ति को जन्म से मृत्यु तक उपदेशित किया जाता है, उसे&amp;nbsp;सशक्त&amp;nbsp; बनाना&amp;nbsp;उपदेशित नहीं किया जाता ताकि&amp;nbsp;उसे&amp;nbsp;किसी&amp;nbsp;की दया&amp;nbsp;की आवश्यकता&amp;nbsp;ही&amp;nbsp;न&amp;nbsp;हो. इस दया विधान में समाज के&amp;nbsp;सभी अग्रणी वर्ग - ईश्वर भक्त, धर्मात्मा, शासक-प्रशासक, राजनेता और समाज सुधारक, आदि सम्मिलित हैं. स्वतन्त्रता से पूर्व इसका उपदेश केवल धर्मात्मा, समाज-सुधारक, आदि ही दिया करते थे, शासक-प्रशासक इस बारे में उदासीन ही रहते थे. किन्तु स्वतन्त्रता के बाद भारत के राजनेताओं ने&amp;nbsp;केन्द्रीय और सभी राज्य सरकारों के माध्यम से इसे महत्वपूर्ण कर्तव्य मान लिया है, ताकि देश में निर्धन और निस्सहाय लोग सदा बने रहें और उनसे दया की आशा करते रहें. समाज कल्याण योजनाएं यथा आवास-निर्माण हेतु धन, निःशुल्क अथवा सस्ते खाद्यान्न, आदि इसी प्रकार की&amp;nbsp;दया दर्शाने के विधि-विधान हैं. इस प्रकार स्वतन्त्रता पूर्व&amp;nbsp;जो दया&amp;nbsp;विधान सामाजिक स्तर पर था, स्वतन्त्रता के बाद उसे राजनैतिक स्तर पर अपना लिया गया है. इस&amp;nbsp;&amp;nbsp;संस्कारण के दो स्पष्ट प्रभाव हैं -&lt;br /&gt;&lt;ul&gt;&lt;li&gt;समाज का&amp;nbsp;निर्धन वर्ग सदा-सदा के लिए निर्धन ही बना रहना चाहता है ताकि वह दया-पात्र बना रहे और&amp;nbsp;उसका जीवन यापन केवल दया के आश्रय पर होता रहे.&lt;/li&gt;&lt;li&gt;निर्धन वर्ग में स्वयं समर्थ होने का आत्म-विश्वास नहीं रह गया है जिसके कारण वह सदा किसी न किसी का डस बना रहना चाहता है. &amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/li&gt;&lt;/ul&gt;&lt;div&gt;उपरोक्त दोनों प्रभाव भारत में सच्चे लोकतंत्र की स्थापना में बहुत सशक्त बाधक हैं. वस्तुतः जन-साधारण आज भी एक-क्षत्र&amp;nbsp; शासन के अधीन रहने योग्य है और वह इसी योग्य बने रहना चाहता है. &amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4702532971528007953-5636188309312855884?l=bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/feeds/5636188309312855884/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/08/blog-post.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/5636188309312855884'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/5636188309312855884'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/08/blog-post.html' title='शक्ति की पूजा और दासत्व की मनोदशा'/><author><name>राम बंसल/Ram Bansal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10182040999161020512</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/Sy4At1JB9aI/AAAAAAAAAAU/fJMHsDrudkE/S220/Ram30.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/TFp4QLJImbI/AAAAAAAAALs/O_GwputfpC8/s72-c/durga-400.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4702532971528007953.post-4330320971806582999</id><published>2010-07-24T18:03:00.000+05:30</published><updated>2010-07-24T18:03:33.518+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राज्यकर्मी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्रशासक'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='स्वतंत्र भारत'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्रिटिश भारत'/><title type='text'>उपनिवेशीकरण - विदेशी और देशी</title><content type='html'>एक देश से किसी अन्य देश पर शासन करना उपनिवेशीकरण कहलाता है. भारत लम्बे समय तक परतंत्र रहा है किन्तु भारत &amp;nbsp;मुग़ल शासन का उपनिवेश नहीं था क्योंकि मुग़ल इसी भूमि पर रहकर लोगों पर शासन करते थे. ब्रिटिश शासन में लन्दन स्थित&amp;nbsp;राज सिंहासन से भारत पर शासन किया जाता था. ब्रिटिश शासन के जो प्रतिनिधि भारत में शासन व्यवस्था का संचालन करते थे वे भी स्थानीय शासक ही थे यद्यपि उन्हें प्रशासक कहा जाता था.&amp;nbsp;उनकी दृष्टि में भारतीय मनुष्य न होकर केवल उनके गुलाम थे. इसलिए भारत में रह रहे ब्रिटिश नागरिक भारतीय नागरिकों से स्पष्ट दूरी बनाए रखते थे. उनके मत में ऐसा करके वे जनता पर अच्छा प्रशासन कर सकते थे.&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/TErZLM1hR3I/AAAAAAAAALQ/l6gThDuziAM/s1600/LordClive.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="400" src="http://1.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/TErZLM1hR3I/AAAAAAAAALQ/l6gThDuziAM/s400/LordClive.jpg" width="245" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;इस दूरी को बनाये रखने के लिए ब्रिटिश लोगों के निवास भारतीयों के निवासों से प्रथक बनाए जाते थे. इसका एक कारण भारतीय&amp;nbsp; और ब्रिटिश नागरिकों के रहन-सहन और संस्कृति का विशाल अंतराल भी था. प्रशासक होने के कारण, ब्रिटिश लोग अपने निवासों में तत्कालीन सभी सुख-सुविधाओं की व्यवस्था करते थे जो भारतीयों के निवासों में उपलब्ध नहीं होती थीं. इस अंतराल का मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी होता था जिसके कारण ब्रिटिश नागरिक भारतीयों की दृष्टि में भी श्रेष्ठ माने जाते थे. इस मान्यता के कारण भारतीयों द्वारा&amp;nbsp;ब्रिटिश नागरिकों के आदेशों की अवहेलना करना असंभव सा था चाहे वे आदेश कितने भी अवैधानिक हों. इन्हीं के कारण ब्रिटिश भारतीयों के विविध प्रकार के शोषण करते थे.&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/TErdEmk47BI/AAAAAAAAALU/GU-lWKsYx6o/s1600/colony1.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="240" src="http://1.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/TErdEmk47BI/AAAAAAAAALU/GU-lWKsYx6o/s320/colony1.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;ब्रिटिश भारत से चले गए किन्तु प्रशासन के अपने पदचिन्ह यहाँ छोड़ गए. आज भारत स्वतंत्र कहा जाता है किन्तु यहाँ का शासन-प्रशासन ब्रिटिश पद-चिन्हों का ही अनुगमन कर रहा है - विशेषकर कुशल दमनकारी प्रशासन के लिए प्रशासकों और जन साधारण में दूरी बनाए रखकर. इस की व्यवस्था के लिए भारत की&amp;nbsp;केंद्र और राज्य सरकारों के&amp;nbsp;प्रत्येक विभाग के अधिकारियों तथा कर्मियों के लिए अत्याधुनिक बस्तियां बसाई गयी हैं. इन बस्तियों में विद्युत्, जल, संचार आदि की ऐसी&amp;nbsp;विशेष व्यवस्थाएं हैं जो अन्य जन-साधारण की बस्तियों में नहीं हैं और न ही इनके होने की कल्पना की जा सकती है. यथा,&amp;nbsp;भारत के अधिकाँश क्षेत्रों में जन साधारण के लिए ४-५ घंटे प्रतिदिन से अधिक विद्युत् उपलब्ध नहीं है जब कि प्रशासक बस्तियों में इसकी २४ घंटे उपलब्धता सुनिश्चित की जाती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रशासकों के जन साधारण से प्रथक व्यवस्थाओं में रहने से प्रशासकों को सबसे बड़ा लाभ तो यह होता है कि वे जन-साधारण की समस्याओं से पूरी तरह अनभिज्ञ&amp;nbsp;रहते हैं और अपने तथाकथित कर्तव्यों का पालन बिना किसी तनाव के करते हैं. इस प्रथक&amp;nbsp;व्यवस्था का दूसरा लाभ मनोवैज्ञानिक है - प्रशासक स्वयं को जन-साधारण से श्रेष्ठ समझते हैं और चाहते हैं कि जनता भी ऐसा ही समझे जिसकी वे ब्रिटिश प्रशासकों को समझते थे.&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.amazon.com/Civilization-4-Colonization-Mac/dp/B002RSJ5IG?ie=UTF8&amp;amp;tag=httpbhaaratta-20&amp;amp;link_code=bil&amp;amp;camp=213689&amp;amp;creative=392969" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;" target="_blank"&gt;&lt;img alt="Civilization 4: Colonization" src="http://ws.amazon.com/widgets/q?MarketPlace=US&amp;amp;ServiceVersion=20070822&amp;amp;ID=AsinImage&amp;amp;WS=1&amp;amp;Format=_SL160_&amp;amp;ASIN=B002RSJ5IG&amp;amp;tag=httpbhaaratta-20" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;img alt="" border="0" height="1" src="http://www.assoc-amazon.com/e/ir?t=httpbhaaratta-20&amp;amp;l=bil&amp;amp;camp=213689&amp;amp;creative=392969&amp;amp;o=1&amp;amp;a=B002RSJ5IG" style="border: none !important; margin: 0px !important; padding: 0px !important;" width="1" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत में&amp;nbsp;ब्रिटिश प्रशासकों की संख्या जन-साधारण की तुलना में नगण्य होती थी जिससे उनके लिए प्रथक आवास व्यवस्था की लागत बहुत अल्प होती थी. किन्तु स्वतंत्र भारत में सभी राज्यकर्मी प्रशासकों की भूमिकाओं में हैं जिनकी संख्या कुल जनसँख्या का लगभग १० प्रतिशत है. इन सबके लिए प्रथक आवासीय व्यवस्था पर बड़ी मात्रा में&amp;nbsp;सार्वजनिक धन व्यय किया जा रहा है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4702532971528007953-4330320971806582999?l=bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/feeds/4330320971806582999/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/07/blog-post_24.html#comment-form' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/4330320971806582999'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/4330320971806582999'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/07/blog-post_24.html' title='उपनिवेशीकरण - विदेशी और देशी'/><author><name>राम बंसल/Ram Bansal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10182040999161020512</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/Sy4At1JB9aI/AAAAAAAAAAU/fJMHsDrudkE/S220/Ram30.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/TErZLM1hR3I/AAAAAAAAALQ/l6gThDuziAM/s72-c/LordClive.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4702532971528007953.post-3331505097800576591</id><published>2010-07-03T15:37:00.000+05:30</published><updated>2010-07-03T15:37:46.074+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बौद्धिक जनतंत्र'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इस्लामी शासन'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विष्णुगुप्त चाणक्य'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='महापद्मानंद'/><title type='text'>सत्ता हस्तांतरण : बुद्धि, बल और छल के मध्य</title><content type='html'>भारत में राज्य सता का हस्तांतरण बार-बार होता रहा है, जिसमें प्रमुखतः तीन गणक&amp;nbsp;सम्मिलित रहे हैं - बल, छल और बुद्धि.&amp;nbsp;भारत में राज्य सत्ता का श्री गणेश देवों द्वारा किया गया, किन्तु महाभारत संघर्ष&amp;nbsp;में बल और&amp;nbsp;छल-कपट की विजय हुई और नैतिक मूल्यों की पराजय. इस सिकंदर के समर्थन से महापद्मानंद भारत का सम्राट बना.&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/S-_KWpNjqjI/AAAAAAAAAI8/QgVJtnC9S6s/s1600/afghan-war.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://3.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/S-_KWpNjqjI/AAAAAAAAAI8/QgVJtnC9S6s/s320/afghan-war.jpg" width="307" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;महापद्मानंद के सम्राट बनने के बाद विष्णु गुप्त चाणक्य सर्वाधिक हताहत हुए. उनके पास कोई&amp;nbsp;बल शेष नहीं&amp;nbsp;था किन्तु वे बुद्धि के धनी थे. अपने मित्र चित्र गुप्त और पुत्र चन्द्र गुप्त के साथ मिलकर उन्होंने बुद्धि का उपयोग करते हुए उन्होंने भारत की राज्य&amp;nbsp;सत्ता पर अधिकार किया और चन्द्र गुप्त को भारत का सम्राट बनाया. यहीं से गुप्त वंश का शासन स्थापित हुआ जिसमें भारत को विश्व भर में 'सोने की चिड़िया' कहलाने का गौरव प्राप्त हुआ.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पासा फिर पलटा. समुद्र गुप्त जैसे कुछ गुप्त वंश के शासकों के अतिरिक्त शेष&amp;nbsp;शासक बुद्धि-संपन्न तो थे किन्तु उनमें बल का अभाव था. इसके लिए वे बलशालियों की सेना पर आश्रित थे. कालांतर में इन बल-शालियों ने राज्य सत्ता पर अपना अधिकार कर लिया, और बुद्धि पराजित हुई. ये बल-शाली युद्ध कला में तो पारंगत थे किन्तु शासन व्यवस्था में अयोग्य सिद्ध हुए. इनके शासन में देश छोटे-छोटे टुकड़ों में विभाजित हो गया और शासकों का अधिकाँश समय युद्ध क्षेत्र में ही व्यतीत होने लगा. इससे शासन व्यवस्था चरमरा गयी. यह अराजकता भारत में लगभग ७०० वर्ष तक रही.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस अराजकता का लाभ उठाने के लिए कुछ लुटेरे भारत में आये जिनके पास बल और छल दोनों थे. इनका उपयोग करते हुए उन्होंने भारत में इस्लामी शासन स्थापित कर दिया, जो विभिन्न नामों से लगभग ७०० वर्ष चला. इस शासन की सर्वाधिक निर्बलता शासकों के भोग-विलास थे जिनके लिए वे ५०० की संख्या तक स्त्रियाँ रखते थे. इस प्रकार के विलासों ने शासकों की बुद्धि और बल दोनों का हरण कर लिया. इसके प्रभाव में उन्होंने बुद्धि संपन्न अंग्रेजों को भारत में आने के लिए आमंत्रित कर दिया. इस प्रकार बल और छल पर पुनः बुद्धि की विजय हुई, और देश में अंग्रेजों ने अपना शासन स्थापित कर लिया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंग्रेजों के सासन में भारत की धन-संपदा का सतत शोषण होता रहा जिससे ब्रिटिश खज़ाना भरता रहा.यह शोषण इस सीमा तक पहुँच गया कि जन-साधारण के पास जीवन की रक्षा के लिए 'करो या मरो' के अतिरिक्त कोई अन्य मार्ग शेष न रहा. इस जन&amp;nbsp;आन्दोलन का नेतृत्व महात्मा गाँधी ने किया. इसके साथ ही नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने 'आजाद हिंद सेना' का गठन कर अंग्रेजों को बल-शाली चुनौती भी दी. इन दोनों कारणों से अंग्रेजों को भारत स्वतंत्र करना पडा, और देश की राज्य सत्ता&amp;nbsp;ऐसे लोगों के हाथ में आ गयी जो शासन करने के लिए न तो बल से संपन्न थे और न ही बुद्धि से. अतः मात्र छल ही उनके शासन तंत्र की विशिष्टता रही.इस शासन का नेतृत्व जवाहर लाल नेहरु ने किया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नेहरु के बाद सत्ता की स्वामिनी इंदिरा बनी जिसे छल के साथ बल की भी आवश्यकता अनुभव हुई जिसके लिए उसने देश भर के असामाजिक तत्वों का आश्रय लिया और देश पर बल और छल के साथ शासन किया. कालांतर में बल-शालियों को अपनी सामर्थ्य का आभास हुआ और उन्होंने सत्ता हथियाने के साथ-साथ छल भी सीख लिए. इस प्रकार भारत में आज बल और छल का शासन स्थापित है.&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/TC8H7f_kLCI/AAAAAAAAAK8/NkuBXZllf38/s1600/change.png" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://3.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/TC8H7f_kLCI/AAAAAAAAAK8/NkuBXZllf38/s1600/change.png" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;अगला परिवर्तन में देश पर &lt;a href="http://bhaarat-bhavishya-chintan.blogspot.com/"&gt;बुद्धि का शासन&lt;/a&gt; होना अवश्यम्भावी है किन्तु यह तभी होगा जब देश का प्रबुद्ध वर्ग इसके लिए जागृत हो और संघर्ष करे. जहां तक जन-साधारण का प्रश्न है, यह सता परिवर्तन में कभी भी महत्वपूर्ण गणक नहीं रहा है - यहाँ तक कि आज के तथाकथित जनतांत्रिक शासन में भी. आज की स्थिति कुछ उसी प्रकार की है जैसी कि विष्णुगुप्त चाणक्य के समय थी जब बुद्धि ने बल और छल दोनों को पराजित लिया था.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4702532971528007953-3331505097800576591?l=bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/feeds/3331505097800576591/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/07/blog-post.html#comment-form' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/3331505097800576591'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/3331505097800576591'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/07/blog-post.html' title='सत्ता हस्तांतरण : बुद्धि, बल और छल के मध्य'/><author><name>राम बंसल/Ram Bansal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10182040999161020512</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/Sy4At1JB9aI/AAAAAAAAAAU/fJMHsDrudkE/S220/Ram30.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/S-_KWpNjqjI/AAAAAAAAAI8/QgVJtnC9S6s/s72-c/afghan-war.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4702532971528007953.post-6025638254525403190</id><published>2010-06-25T14:45:00.000+05:30</published><updated>2010-06-25T14:45:00.376+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भारत'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कालाधन'/><title type='text'>स्वतंत्र भारत में काला धन</title><content type='html'>अपनी जिस आय पर कोई व्यक्ति समुचित आयकर का भुगतान नहीं करता है, उतना धन व्यक्ति का कालाधन कहलाता है. अतः कालाधन वैध तथा अवैध दोनों प्रकार के आय स्रोतों से प्राप्त किया जा सकता है. चूंकि आय के अधिकाँश वैध स्रोत राज्य को ज्ञात होते हैं, उन पर प्रायः आयकर ले लिया जाता है. इस कारण कालेधन के मुख्य स्रोत अवैध आय के स्रोत होते हैं. स्वतन्त्रता के समय केवल व्यवसायियों के पास कालाधन था जिसके अधिकाँश स्रोत वैध व्यवसाय से आय थे किन्तु उन पर आय कर न दिए जाने के कारण यह कालेधन की संज्ञा पाता था. इसलिए तत्कालीन काला धन उतना काला नहीं था जितना कि देश में आज का काला धन है क्योंकि आज का काला धन अवैध आय स्रोतों से प्राप्त होता है. व्यवसायियों के पास उपलब्ध काला धन उनके व्यवसाय में लगा रहता है इसलिए उसका उत्पादक उपयोग होता है, जबकि अवैध आय स्रोतों से प्राप्त काला धन बहुधा किसी उत्पादक उपयोग में नहीं लगाया जाकर किसी अन्य काले धंधे में लगाया जाता है. अतः आज का काला धन देश की राजनीति, सामाजिक व्यवस्था और अर्थ व्यवस्था के लिए घातक सिद्ध होता है.&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/TCRyiFP0JyI/AAAAAAAAAKM/itZAV-MKW1k/s1600/black-money.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="400" src="http://2.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/TCRyiFP0JyI/AAAAAAAAAKM/itZAV-MKW1k/s400/black-money.jpg" width="400" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;स्वतन्त्रता के लगभग २० वर्षों तक राजनेता राजनैतिक दलों के उपयोग के लिए व्यवसायियों  के काले धन में से सीधे धन प्राप्त करते थे, प्रशासकों को इसमें सम्मिलित नहीं किया जाता था और अधिकाँश राजनेता भी इसमें व्यक्तिगत भागीदारी नहीं रखते थे. अतः यह काला धन केवल राजनैतिक दलों का होता था. इस कारण से राजनेता राज्यकर्मियों पर अपना नियंत्रण बनाये रखते थे जिससे उनका भृष्ट होना दुष्कर था. व्यवसायियों के पास काले धन का लाभ कुछ राज्यकर्मियों ने भी उठाया जिससे वे भी उसके हिस्सेदार बनने लगे और कालांतर में इसके अधिकाँश भाग के स्वामी हो गए. राज्यकर्मी इस काले धन का उपयोग अपने वैभव भोगों के लिए किया करते थे. उन पर राजनेताओं के नियंत्रण का भयबना रहता था. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इंदिरा गाँधी के शासन काल में राजनेताओं ने प्रशासकों को जनता से काला धन कमाने और उन्हें देने के लिए विवश करना आरम्भ कर दिया जिससे राजनेता और राज्यकर्मी जनता से लूटे गए कालेधन के परस्पर भागीदार बन गए, और कर्मी नेताओं के नियंत्रण से मुक्त हो गए. इस मुक्ति और नेताओं द्वारा काला धन कमाने के प्रोत्साहन से राज्यकर्मी भृष्टतर होते गए और वे निर्विघ्न जनता का शोषण करने लगे जो आज तक चल रहा है. इस प्रकार देश के अधिकाँश काले धन के स्वामी राजनेता और राज्यकर्मी बन गए, तथापि व्यवसायी काला धन कमाने के लिए बदनाम बने रहे. आज के व्यवसायी जो भी काला धन कमाते हैं उसका अधिकाँश भाग राज्यकर्मियों के माध्यम से राजनेताओं के पास पहुँच जाता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देश में काले धन के अर्थ-व्यवस्था पर नियंत्रण के लिए अनेक वैधानिक प्रावधान किये गए हैं जो केवल व्यवसायियों पर लागू किये जाते हैं, और काले धन के वास्तविक स्वामी - राजनेता और राज्यकर्मी, इन वैधानिक प्रावधानों से मुक्त ही बने रहते हैं. वस्तुतः ये प्रावधान राजनेताओं तथा राज्यकर्मियों द्वारा ही इस चतुराई से बनाये जाते हैं&amp;nbsp; वे स्वयं इनसे दुष्प्रभावित न हों.&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.amazon.com/Money-Stacks-Explicit/dp/B002B10HKY?ie=UTF8&amp;amp;tag=httpbhaaratta-20&amp;amp;link_code=bil&amp;amp;camp=213689&amp;amp;creative=392969" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;" target="_blank"&gt;&lt;img alt="Money Stacks [Explicit]" src="http://ws.amazon.com/widgets/q?MarketPlace=US&amp;amp;ServiceVersion=20070822&amp;amp;ID=AsinImage&amp;amp;WS=1&amp;amp;Format=_SL160_&amp;amp;ASIN=B002B10HKY&amp;amp;tag=httpbhaaratta-20" /&gt;&lt;/a&gt;&amp;nbsp;&lt;img alt="" border="0" height="1" src="http://www.assoc-amazon.com/e/ir?t=httpbhaaratta-20&amp;amp;l=bil&amp;amp;camp=213689&amp;amp;creative=392969&amp;amp;o=1&amp;amp;a=B002B10HKY" style="border: medium none ! important; margin: 0px ! important; padding: 0px ! important;" width="1" /&gt;&lt;br /&gt;यद्यपि कालेधन का आकलन किसी भी प्रकार से संभव नहीं है, तथापि कुछ विशेषज्ञों के अनुसार भात में कालेधन का परिमाण १,०००,००० मिलियन रुपये है. आज भी व्यवसायियों का काला धन उनके उद्योग धंधों में लगा रहता है जिससे उसका उत्पादक उपयोग हो रहा है. किन्तु राजनेताओं और राज्यकर्मियों के काले धन का बड़ा भाग विदेशी बैंकों में जमा किया जा रहा है. अतः इसका लाभ देश को न होकर विदेशों को हो रहा है. राजनेता इसका उपयोग राजनैतिक सत्ता हथियाने के लिए और राज्यकर्मी इसका उपयोग आर्थिक सत्ता हथियाने के लिए कर रहे हैं. &amp;nbsp;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4702532971528007953-6025638254525403190?l=bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/feeds/6025638254525403190/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/06/blog-post_25.html#comment-form' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/6025638254525403190'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/6025638254525403190'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/06/blog-post_25.html' title='स्वतंत्र भारत में काला धन'/><author><name>राम बंसल/Ram Bansal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10182040999161020512</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/Sy4At1JB9aI/AAAAAAAAAAU/fJMHsDrudkE/S220/Ram30.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/TCRyiFP0JyI/AAAAAAAAAKM/itZAV-MKW1k/s72-c/black-money.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4702532971528007953.post-2694848388089515007</id><published>2010-06-10T01:52:00.000+05:30</published><updated>2010-06-10T01:52:19.931+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ईश्वर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अध्यात्म'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='धर्म'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='संस्कृति'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सभ्यता'/><title type='text'>देवभूमि भारत का सतत सांस्कृतिक प्रदूषण</title><content type='html'>आज से लगभग २,४०० वर्ष पूर्व देवों द्वारा विशुद्ध वैज्ञानिक चिंतन पर आधारित भारत का विकास किया जा रहा था जिसकी ख्याति सुदूर भूभागों में भी पहुँची. ऐसे भारत पर अधिकार करने हेतु कुछ षड्यंत्रकारियों ने योजना बनायी जिसके अंतर्गत भारत को&amp;nbsp; सांस्कृतिक रूप से प्रदूषित किया गया. इन षड्यंत्रकारियों ने दो मनोवैज्ञानिक शस्त्र विकसित&amp;nbsp;किये - ईश्वर और धर्म, और इन्हें लेकर भारत में अपने पैर पसारे. तब से अब तक ये शस्त्र प्रभावी रूप में कार्य कर रहे हैं और देश की जनसँख्या का एक विकराल वर्ग इनके बहुविध प्रचार-प्रसार में लगा हुआ है और जन-मानस को प्रदूषित कर उस पर अपना मनोवैज्ञानिक शासन स्थापित किये हुए है. इसका आरम्भ भारत में यहूदियों के आगमन से हुआ जिन्हें उस समय यदुवंशी कहा गया. &lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/S3XwwfwnzsI/AAAAAAAAADM/F-E3qr8CaNY/s1600/shankar.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="400" src="http://1.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/S3XwwfwnzsI/AAAAAAAAADM/F-E3qr8CaNY/s400/shankar.jpg" width="271" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;img alt="" border="0" height="1" src="http://www.assoc-amazon.com/e/ir?t=httpbhaaratta-20&amp;amp;l=bil&amp;amp;camp=213689&amp;amp;creative=392969&amp;amp;o=1&amp;amp;a=0387848924" style="border: medium none ! important; margin: 0px ! important; padding: 0px ! important;" width="1" /&gt;&lt;br /&gt;शनैः-शनैः विश्व भर में भारत के शत्रु बढ़ते गए और वे अनेक नामों से आकर भारत में बसते रहे और यदुवंशी समूह में सम्मिलित होते रहे तथा जिन्हें वामन भी कहा गया. इससे यह वर्ग और विकराल हुआ और अपना नाम 'यवन' भी रखा क्योंकि यवन जाति इस वर्ग की सर्वाधिक शक्तिशाली जाति थी और यह जाति भारत पर राजनैतिक शासन की स्थापना करना चाहती थी. इस प्रकार वामन सामाजिक और यवन राजनैतिक शासन की अपनी आकांक्षाओं के लिए कार्य करते रहे. राजनैतिक उथल-पुथलों में यवन साम्राज्य तो नष्ट हो गया किन्तु वामनों का सांस्कृतिक प्रदूषण के माध्यम से स्थापित मनोवैज्ञानिक शासन आज तक सतत चल रहा है. इससे एक तथ्य यह उजागर होता है कि&amp;nbsp;किसी भी समाज का सांस्कृतिक प्रदूषण उस पर राजनैतिक आक्रमण से कहीं अधिक घातक और दूरगामी होता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस सांस्कृतिक प्रदूषण का सबसे घातक छल यह रहा है कि आरम्भ में इसके लिए कोई ग्रन्थ ना लिखा जाकर देवों द्वारा रचित वेदों और शास्त्रों में उपयुक्त शब्दावली के अर्थ प्रदूषित कर उनके मंतव्यों को सांस्कृतिक प्रदूषण के हित में मोड़ लिया गया. इस घ्रणित उद्येश्य की प्राप्ति हेतु आधुनिक संस्कृत भाषा का विकास किया गया जिसका वेदों और शास्त्रों की भाषा से कोई सम्बन्ध नहीं होते हुए भी इन बहुमूल्य ग्रंथों के अनुवाद इसी भाषा के आधार पर किये गए. इस प्रकार इस सांस्कृतिक प्रदूषण को समाज की सहज मान्यता मिल गयी क्योंकि यह समाज देवों के वैज्ञानिक एवं ऐतिहासिक तथ्यों से भरपूर वेदों और शास्त्रों को पहले से ही सम्मान देता आया था. इस प्रकार वेदों और शास्त्रों के अर्थों का प्रदूषण भारत के सांस्कृतिक प्रदूषण का आधार बना.  इसी आधार पर सांस्कृतिक प्रदूषण हेतु नए उपाय विकसित किये गए जिनमें अध्यात्म, ज्योतिष, भिक्षावृत्ति, गुरु-शिष्य परम्परा, यंत्र और तंत्र विद्याएँ, भूत-प्रेत, जन्म-जन्मान्तर, अवतारवाद, भाग्यवाद, पूजा-पाठ, यज्ञ, योग-विद्याएँ, आदि प्रमुख हैं जो सभी ईश्वर आर धर्म की छलिया परिकल्पनाओं के विस्तार हैं. इस सांस्कृतिक प्रदूषण के प्रसार हेतु अनेक कारक विकसित किये गए जिनमें साधू-महात्मा, संत, सन्यासी, भिखारी, पुजारी, योगी, अध्यात्मवादी, धर्माचार्य, मठाधीश, ज्योतिषी, कर्मकांडी पंडित, तांत्रिक, भिखारी, आदि आज भी सक्रिय हैं. इस सांस्कृतिक प्रदूषण को और भी बल मिला जब इस्लामी लुटेरों ने भारत पर अपना शासन स्थापित कर लिया जो लगभग ८०० वर्ष चला. इस शासन ने कुछ नए कारक इस प्रदूषण को प्रदान किये जिन्हें मुल्ला-मौलवी, फकीर, सूफी, आदि कहा जाता है.&amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.amazon.com/Effects-Air-Pollution-Cultural-Heritage/dp/0387848924?ie=UTF8&amp;amp;tag=httpbhaaratta-20&amp;amp;link_code=bil&amp;amp;camp=213689&amp;amp;creative=392969" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;" target="_blank"&gt;&lt;img alt="The Effects of Air Pollution on Cultural Heritage" src="http://ws.amazon.com/widgets/q?MarketPlace=US&amp;amp;ServiceVersion=20070822&amp;amp;ID=AsinImage&amp;amp;WS=1&amp;amp;Format=_SL160_&amp;amp;ASIN=0387848924&amp;amp;tag=httpbhaaratta-20" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;आज इस सांस्कृतिक प्रदूषण में भारत की लगभग ५ प्रतिशत प्रतिष्ठित जनसँख्या संलग्न है जो बिना कोई उत्पादक कार्य किये केवल भ्रमों को प्रचारित करते हुए वैभव भोग रही है. बच्चे के जन्म से ही उसके मानस को प्रदूषित किया जाता है जिसके दुष्प्रभाव से वह जीवन पर्यंत उबर नहीं पाता. यह जनसँख्या प्रतिशत उस समय अपने चरम पर था जब सिद्धार्थ ने लाखों युवाओं को बौद्ध भिक्षु बनाकर इस सांस्कृतिक प्रदूषण को गौरव प्रदान किया. दुःख का विषय यह है कि देश में इस प्रदूषण का कोई प्रभावी प्रतिकार नहीं किया गया - केवल स्वामी रामानंद और उनके प्रिय शिष्य कबीर के अतिरिक्त.&amp;nbsp;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह सांस्कृतिक प्रदूषण मानवीय सभ्यता विकास के विरुद्ध कार्य करता है जिसके कारण मूल भारतीय सभ्यता का ह्रास हुआ है और इस प्रदूषित संस्कृति को ही भारत की महान संस्कृति कहा जाने लगा है. यह प्रदूषण मानव बुद्धि को कुंठित कर उसकी चिंतन सामर्थ्य को नष्ट करता है. जनमानस में ईश्वर का आतंक और उसका धर्मावलंबन इसके प्रमुख शस्त्र हैं.&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4702532971528007953-2694848388089515007?l=bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/feeds/2694848388089515007/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/06/blog-post.html#comment-form' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/2694848388089515007'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/2694848388089515007'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/06/blog-post.html' title='देवभूमि भारत का सतत सांस्कृतिक प्रदूषण'/><author><name>राम बंसल/Ram Bansal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10182040999161020512</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/Sy4At1JB9aI/AAAAAAAAAAU/fJMHsDrudkE/S220/Ram30.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/S3XwwfwnzsI/AAAAAAAAADM/F-E3qr8CaNY/s72-c/shankar.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4702532971528007953.post-8412332130598120664</id><published>2010-05-29T02:16:00.000+05:30</published><updated>2010-05-29T02:16:45.506+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पाराशर ऋषि'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='चित्रगुप्त'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='होरा शास्त्र'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विष्णुगुप्त चाणक्य'/><title type='text'>महाभारत युद्ध के बाद विष्णु</title><content type='html'>महाभारत युद्ध में कौरव सेना की पराजय तो हुई ही इसमें विश्व के सभी प्रसिद्ध योद्धा भी मारे गए. इसका सभी को दुःख था सिवाय कृष्ण के, क्योंकि यह परिणाम उसी के मनोनुकूल था. युद्ध में विष्णु, जो शकुनि के रूप में उपस्थित थे, को बंदी बना लिया गया तथा उनके अंडकोष काट डाले गए. इस विशेष दंड का एक विशेष कारण था. विष्णु और यीशु के अतिरिक्त सभी प्रमुख देव मारे जा चुके थे जिससे देव कुल नष्ट होने की संभावना थी. इसे सुनिश्चित करने के लिए परसंतापी कृष्ण ने विष्णु के अंडकोष काटकर उन्हें नपुंसक बनाने का प्रयास किया था.&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://i485.photobucket.com/albums/rr211/jaanu_2721/chanakya.gif" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://i485.photobucket.com/albums/rr211/jaanu_2721/chanakya.gif" width="227" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;महाभारत युद्ध में विजय के बाद कृष्ण और सिकंदर ने यहूदी वंश के महापद्मानंद को भारत के सम्राट पद पर स्थापित किया, किन्तु जिन पांडवों के नाम पर महाभारत युद्ध रचा गया था उन्हें राज्य में कोई हिस्सा नहीं दिया गया तथा कृष्ण ने उन्हें हिमालय में भटकने और नष्ट हो जाने के लिए प्रेरित कर दिया. इस प्रकार कृष्ण ने भारत के साथ ही नहीं अपने अनुयायी पांडवों के साथ भी छल किया. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;युद्ध के बाद विष्णु गुप्त रहने के लिए पाराशर ऋषि के रूप में रहने लगे और राजस्थान के अलवर जनपद&amp;nbsp; में सरस्वती तट पर एक आश्रम बनाकर रहने लगे. यह आश्रम आज भी विद्यमान है जो एक पहाडी की घाटी में स्थित है. यहीं रहकर उन्होंने 'होरा शास्त्र' नामक ग्रन्थ की रचना की जो सूर्य की गति के आधार पर समय-मापन के बारे में है. 'होरा' शब्द का वास्तविक अर्थ सूर्य है जिसके कारण काल संचालित होता है, इसलिए इस शब्द को 'समय' के भाव में भी उपयोग किया गया है.&amp;nbsp; किन्तु आधुनिक पंडितों ने इसके माध्यम से अपने छल 'फलित ज्योतिष' को प्रसिद्ध किया है और इस ग्रन्थ को इसी विषय को समर्पित बताया जा रहा है. यहाँ भी स्पष्ट कर दें कि भारत का मौलिक काल चक्र सूर्य आधारित है जब कि यवन समुदाय काल निधारण के लिए चन्द्र को आधार बनाता रहा हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उक्त आश्रम में रहते हुए ही विष्णु ने अपने अन्डकोशों की चिकित्सा की जिसके लिए पारद भस्म तैयार कर उसे औषधि के रूप में उपयोग किया गया. आश्रम के ऊपर पहाडी पर आज भी इसका प्रमाण उपस्थित है. इस चिकित्सा से स्वस्थ होने के बाद विष्णु ने यीशु की बड़ी बहिन मरियम से विवाह किया ताकि देव संतति सतत बनी रहे. इस विवाह के बाद मरियम देवी लक्ष्मी, विष्णुप्रिया, आदि नामों से जानी जाने लगीं. देवी दुर्गा तथा काली भी इन्हीं के छद्म रूप थे.&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://travel.sulekha.com/india/madhya-pradesh/khajuraho/photos/khajuraho-34.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="240" src="http://travel.sulekha.com/india/madhya-pradesh/khajuraho/photos/khajuraho-34.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;कालांतर में देवी लक्ष्मी ने एक पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम आरम्भ में गोपीचंद और बाद में 'चन्द्रगुप्त' रखा गया. विष्णु ने एक और छद्म रूप धारण किया और इसके लिए अपना नाम 'विष्णुगुप्त चाणक्य' रखा. इस नाम में शब्द 'चाणक्य' इसलिए जोड़ा गया कि उन्हें सदैव याद रहे कि उनके अंडकोष (आण) काटे गए थे और वे इसका प्रतिशोध लेने के लिए संकल्पित रहें.&amp;nbsp; इनका साथ देने के लिए यीशु ने अपना नाम 'चित्रगुप्त' रखा. चित्रगुप्त रूप में आने से पूर्व यीशु गणेश के रूप में थे, जिसका प्रमाण खजुराहो के चित्रगुप्त मंदिर में उनके गणेश रूप की भी प्रतिमा है जिसे ऊपर के चित्र में दर्शाया गया है. विष्णुगुप्त से गुप्त वंश का आरम्भ हुआ तथा चित्रगुप्त से कायस्थ जाति का उदय हुआ. यहाँ शब्द 'चित्र' एवं कायस्थ यीशु के नाम क्राइस्ट के ही परिवर्तित रूप हैं. भारत का सर्वाधिक प्रबुद्ध वर्ग 'कायस्थ' यीशु का ही वंश है.&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://s2.hubimg.com/u/120961_f260.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://s2.hubimg.com/u/120961_f260.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;विष्णुगुप्त और चित्रगुप्त दोनों ने मिलकर देवी लक्ष्मी के साथ चन्द्रगुप्त का लालन-पालन किया और उसे भारत का सम्राट बनाने हेतु शिक्षित एवं दीक्षित बनाया. इसी अवधि में महापद्मानंद के विरुद्ध अनेक स्थानीय विद्रोह नियोजित कराये गए और अंततः उसकी हत्या के बाद चन्द्रगुप्त को भारत का सम्राट बनाया गया. उसने अपनी माता मरियम को सम्मानित करने के लिए अपना उपनाम 'मोर्य' रखा. चन्द्रगुप्त मोर्य भारत में गुप्त वंश के शासन का प्रथम सम्राट बना. यहीं से विष्णुगुप्त और चन्द्रगुप्त के मार्गदर्शन में भारत को 'सोने की चिड़िया' बनाने के सफल प्रयास किये गए. &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4702532971528007953-8412332130598120664?l=bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/feeds/8412332130598120664/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/05/blog-post_29.html#comment-form' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/8412332130598120664'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/8412332130598120664'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/05/blog-post_29.html' title='महाभारत युद्ध के बाद विष्णु'/><author><name>राम बंसल/Ram Bansal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10182040999161020512</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/Sy4At1JB9aI/AAAAAAAAAAU/fJMHsDrudkE/S220/Ram30.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4702532971528007953.post-7445827325006617339</id><published>2010-05-16T11:04:00.032+05:30</published><updated>2010-05-22T12:25:10.847+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='महाभारत युद्ध'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सिकंदर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पांडव'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कृष्ण छल'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विष्णु'/><title type='text'>महाभारत युद्ध का कारण और परिणाम</title><content type='html'>कृत्रिम रूप से जन्म करते जाने के कारण अपने काल का सर्वाधिक क्रूर और चालाक व्यक्ति था. उसका तुलनीय दुष्ट व्यक्ति न कभी पहले कभी उत्पन्न हुआ और न ही उसके बाद से अब तक. ऐसा व्यक्ति कृत्रिम विधि-विधान से विश्व पर शासन करने की महत्वाकांक्षा के लिए उत्पन्न किया गया था. तत्कालीन विश्व में भारत ही सर्वाधिक विशाल समतल भू क्षेत्र था जो विकास पथ पर तीव्रता से आगे बढ़ रहा था. यद्यपि सभ्यता और विकास की दृष्टि से ग्रीस में एथेंस तत्कालीन भारत से आगे था किन्तु इसका क्षेत्रफल भारत की तुलना में नगण्य था, इसलिए उस पर तो कभी भी अधिकार स्थापित किया जा सकता था.&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/S-_KWpNjqjI/AAAAAAAAAI8/QgVJtnC9S6s/s1600/afghan-war.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://3.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/S-_KWpNjqjI/AAAAAAAAAI8/QgVJtnC9S6s/s320/afghan-war.jpg" width="307" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;ऐसे स्थिति में भारत पर शासन करना विश्व पर शासन करने का आरम्भ बिंदु हो सकता था, यही प्लेटो की सोच थी जिसके लिए उसने पहले एक यहूदी परिवार भारत भेजा और फिर उस परिवार में कृष्ण का जन्म कराया - एक बैंगनी रंग के शिशु के रूप में, जैसा रंग किसी शिशु का पहले कभी नहीं रहा था. इस विशिष्टता और अनेक विशिष्ट प्रशिक्षणों द्वारा कृष्ण को अद्भुत नाटक-कार बना दिया जिसके बल पर उसे ईश्वर का रूप सिद्ध कर दिया गया. इसी कृष्ण ने महाभारत युद्ध की रूपरेखा बनायी जिसमें उसने तत्कालीन विश्व के सभी राजाओं को समेट लिया - कुछ पक्ष में तथा कुछ विपक्ष में, ताकि सभी की परस्पर हत्या कराई जा सके और कृष्ण विश्व पर शासन स्थापित कर सके.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;युद्ध के लिए 'पांडवों को राज्य में हिस्सा दिलवाने' का बहाना बनाया गया. पांडव चूंकि कुंती के अवैध संबंधों से उत्पन्न संतानें थीं, इसलिए सभ्य एवं कुलीन देव तथा आर्य इसके लिए तैयार न थे, तथापि वृद्धजनों के आदेश पर उन्हें राज्य में भागीदारी दे दी गयी. किन्तु वे राज्य के संचालन एवं इसकी रक्षा करने में पूर्णतः असमर्थ थे, इस कारण से वे इसे जुए में हार गए. यहाँ तक कि मूर्ख पांडवों ने अपनी पत्नी द्रोपदी को भी एक निर्जीव संपत्ति के रूप में जुए के दांव पर लगा दिया और वे उसे भी हार गए. स्त्री जाति का इससे भीषण अपमान न तो पहले कभी हुआ था और न ही उसके बाद कभी देखा गया है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कृष्ण पांडवों का सतत पथप्रदर्शक था तथापि उन्होंने राज्य जुए में खो दिया, इसमें कृष्ण का आशय महाभारत युद्ध कराना ही था, अन्यथा युद्ध की कोई संभावना नहीं थी. युद्ध के लिए विदुर के माध्यम से सिकंदर को आमंत्रित करना भी कृष्ण की युद्ध की योजना का ही एक अंग था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;युद्ध में जय-पराजय का पूर्वाकलन करना पूरी ताः संभव नहीं होता, इसलिए कृष्ण कदापि अपना जीवन दांव पर लगाना नहीं चाहता था, इसलिए उसने युद्ध में शस्त्र न उठाने की प्रतिज्ञा की. वह जानता था कि सभ्य एवं शिष्ट देव और आर्य कदापि निःशस्त्र पर शस्त्र-प्रहार नहीं करेंगे और वह युद्ध की विभीषिका में भी सुरक्षित बना रहेगा. साथ ही उसने उदध इतना व्यापक बना दिया जिससे भूमंडल पर उसका कोई प्रतिद्वंदी शेष न रहे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;युद्ध आरम्भ होने के अंतिम समय पर युद्ध टालने के लिए अर्जुन ने पूरा प्रयास किया और उसने युद्ध की विभीषिका को समझते हुए किसी भी मूल्य पर युद्ध न करने की ठान ली. किन्तु कृष्ण ने अपनी योजना असफल होते देख अपनी पूरी शक्ति अर्जुन को भ्रमित करने में लगा दी. उसने अर्जुन को क्षत्रिय धर्म की याद दिलाई और उसे युद्ध ही उसका धर्म बताया. किन्तु उसने आचार्य ड्रोन को यह नहीं बताया कि वे ब्रह्मण थे, और युद्ध उनका धर्म नहीं था. उसने स्वयं को यह पाठ नहीं पढाया कि जब वह अन्य लोगों को युद्ध के लिए प्रेरित कर रहा है तो स्वयं भी इसमे सशस्त्र सम्मिलित होना चाहिए. सारथी के निकृष्ट कार्य करते हुए अमानी कायरता प्रदर्शित नहीं करनी चाहिए. अंततः कृष्ण अपने दुश्चक्र में सफल रहा और युद्ध हुआ.&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.amazon.com/Mahabharat-Harish-Bhimani/dp/B00023JH72?ie=UTF8&amp;amp;tag=httpbhaaratta-20&amp;amp;link_code=bil&amp;amp;camp=213689&amp;amp;creative=392969" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;" target="_blank"&gt;&lt;img alt="Mahabharat" src="http://ws.amazon.com/widgets/q?MarketPlace=US&amp;amp;ServiceVersion=20070822&amp;amp;ID=AsinImage&amp;amp;WS=1&amp;amp;Format=_SL160_&amp;amp;ASIN=B00023JH72&amp;amp;tag=httpbhaaratta-20" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;img alt="" border="0" height="1" src="http://www.assoc-amazon.com/e/ir?t=httpbhaaratta-20&amp;amp;l=bil&amp;amp;camp=213689&amp;amp;creative=392969&amp;amp;o=1&amp;amp;a=B00023JH72" style="border: medium none ! important; margin: 0px ! important; padding: 0px ! important;" width="1" /&gt;&lt;br /&gt;युद्ध का परिणाम कृष्ण की आशाओं के अनुकूल ही रहा, उसमें विश्व के सभी योद्धा खेत रहे, शेष बचा तो कृष्ण और पांडव, तथा कुछ अन्य जिनमें विष्णु और सिकंदर भी सम्मिलित थे. पांडवों को राज्य दिलाने के बहाने से युद्ध नियोजित किया गया था किन्तु युद्ध में विजय के बाद भी राज्य पांडवों को नहीं सौंपा गया, सिकंदर और कृष्ण के परामर्श से यहूदी वंश के उत्तरिधिकारी महापद्मानंद को भारत भूमि का सम्राट बनाया गया. युद्ध के बाद सिकंदर भारत से बेबीलोन गया और ज्ञात विश्व इतिहास के अनुसार उसके कुछ समय बाद वहीं मर गया.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4702532971528007953-7445827325006617339?l=bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/feeds/7445827325006617339/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/05/blog-post_16.html#comment-form' title='6 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/7445827325006617339'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/7445827325006617339'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/05/blog-post_16.html' title='महाभारत युद्ध का कारण और परिणाम'/><author><name>राम बंसल/Ram Bansal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10182040999161020512</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/Sy4At1JB9aI/AAAAAAAAAAU/fJMHsDrudkE/S220/Ram30.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/S-_KWpNjqjI/AAAAAAAAAI8/QgVJtnC9S6s/s72-c/afghan-war.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4702532971528007953.post-3551430938802650818</id><published>2010-05-12T12:16:00.000+05:30</published><updated>2010-05-12T12:16:51.929+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='साबरमती नदी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सरस्वती पथ और विलोपन'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सतलज नदी'/><title type='text'>सरस्वती पथ और लोप कथा</title><content type='html'>शास्त्रों में वर्णित नदी सरस्वती के बारे में अनेक किंवदंतियाँ प्रचलित हैं. साथ ही इसके लोप होने के बारे मैं भी अनेक कल्पनाएँ की गयीं हैं. किन्तु ऐसी कल्पनाएँ करते समय इस तथ्य पर किसी ने ध्यान नहीं दिया कि किसी अन्य नदी के लोप होने की घटना प्रकाश में नहीं आयी है, तो फिर सरस्वती का ही विलोपन क्यों हुआ जो अत्यंत विशाल जलधारा थी. हाँ, कुछ छोटे-मोटे नदी-नाले जलाभाव में सूख अवश्य गए हैं किन्तु वे भी अपने पदचिन्ह पीछे छोड़ जाते हैं. मैंने इन प्रश्नों पर गहन विचार किया है, और अपने ऐतिहासिक अन्वेषणों के आधार पर सरस्वती के विलोपन पर शोध किया है. यह प्रथम अवसर है जब में अपने शोध परिणामों को प्रकाशित कर रहा हूँ, जब कि इस सम्बंधित शोध मैंने १९९५-१९९७ की अवधि में किये थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब से लगभग २५०० वर्ष पूर्व देवों द्वारा भारत के विकास काल में सरस्वती नदी भारत की प्रमुख नदी थी जो अनेक बस्तियों के लिए शुद्ध जल का स्रोत भी थी. इसमें स्नान अथवा गंदे हाथों से इसके जल का स्पर्श वर्जित था जिसके यक्ष जाति के लोग इसकी रक्षा करते थे.&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://farm3.static.flickr.com/2446/3753843749_5697eb440c.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="240" src="http://farm3.static.flickr.com/2446/3753843749_5697eb440c.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;सरस्वती पथ&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;सरस्वती नदी भारत की वर्तमान नदियों सतलज और साबरमती का संयुक्त रूप थी. सतलज तिब्बत से निकलती है और साबरमती गुजरात के बाद खम्भात की खादी में गिरती है. इस नदी की धारा को पजाब के लुधियाना नगर से उत्तर-पश्चिम में लगभग ६ किलोमीटर दूर स्थित सिधवान नामक स्थान पर मोड़ देकर बिआस नदी में मिला दिया गया जिससे आगे की धारा सूख गयी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह धारा आगे चलकर चम्बल नदी की शाखा नदी बनास से पुष्ट होती है और वहीं अरावली पहाड़ियों से अब साबरमती नदी का आरम्भ माना जाता है.&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/S-pOZpCS-1I/AAAAAAAAAIs/qTbLQYIPtvU/s1600/IND-Ahmedabad.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="215" src="http://1.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/S-pOZpCS-1I/AAAAAAAAAIs/qTbLQYIPtvU/s320/IND-Ahmedabad.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;मूल धारा तिब्बत से आरम्भ होकर हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरयाणा, राजस्थान और गुजरात होती हुई अरब सागर में खम्भात की खाड़ी में गिरती थी जो अब सतलज तट पर सिधवान तथा साबरमती के वर्तमान उद्गम स्थल के मध्य सूख चुकी है.&amp;nbsp;  यह नदी सिधवान से जगराओं होती हुई हरियाणा के सिरसा पहुँचती थी, जहां से यह नोहर, सरदार शहर के पश्चिम से होती हुई श्री डूंगर गढ़ होकर राजस्थान के अलवर जनपद में प्रवेश करती थी. राजस्थान के अलवर जनपद के पराशर आश्रम, जयपुर के पास उत्तर में आम्बेर के पास से होती हुई साम्भर झील पहुँचती थी जहां से अजमेर पूर्व से होती हुई देवगढ होकर साबरमती के उद्गम क्षेत्र में पहुँचती थी. इस क्षेत्र की टोपोग्राफी से इस नदी का मार्ग स्पष्ट हो जाता है जहां की भूमि का तल अभी भी कुछ नीचा है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;विलोपन का कारण&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;महाभारत युद्ध में देवों और आर्यों की पराजय के बाद उस पक्ष के जो लोग बचे थे वे भयभीत होकर राजस्थान के जंगलों में सरस्वती तट पर फ़ैल गए थे और उन्होंने अपना केंद्र इन जंगंलों के एक गाँव 'वायड' को बनाया था. वायड आज भी एक ऐतिहासिक स्थल के रूप में जाना जाता है जहां से अनेक सुरंगे विविध स्थानों को जाती हैं जहाँ-जहां देव बसे थे. यहीं से एक सुरंग नाथद्वारा मंदिर में भी खुलती है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विष्णु भी इस युद्ध में बच गए थे किन्तु गंभीर रूप से घायल थे. कृष्ण ने उनके अन्डकोशों को कटवा दिया था. उन्होंने गुप्त रहने के उद्येश्य से अपना नाम 'पराशर' रखा और राजस्थान के अलवर जनपद में एक आश्रम बनाकर रहे और अपनी चिकित्सा की. यह आश्रम आज भी है जो नीलकंठ के निकट एक पहाडी की जड़ में बना है.&amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देवों को युद्ध में पराजित करने के बाद भी कृष्ण उन्हें पूरी तरह नष्ट करना चाहता था. वह जानता था कि शेष देव सरस्वती तट पर ही जंगलों में बसे हैं. इसलिए उन्हें पानी के लिए तरसाने के उद्येश्य से उसने सरस्वती नदी को सिधवान में दिशा बदलकर बियास नदी में मिला दिया जिससे सरस्वती जलधारा सूख गयी.&lt;br /&gt;सरस्वती पथ और विलोपन, सतलज नदी, साबरमती नदी&amp;nbsp; &lt;br /&gt;पीछे से जल का आगमन बंद होने पर साम्भर क्षेत्र का&amp;nbsp; तल न्यून होने के कारण वहां समुद्र का जल भरा रहने लगा जिससे वहां का भू जल खारा हो गया. कालांतर में इस क्षेत्र का सम्बन्ध समुद्र से कट गया और साम्भर में खारे पानी की झील बन गयी.&amp;nbsp; आज इस क्षेत्र में नमक की खेती होती है, तथा शुद्ध पेय जल कहीं-कहीं ही पाया जाता है.&amp;nbsp;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4702532971528007953-3551430938802650818?l=bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/feeds/3551430938802650818/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/05/blog-post_12.html#comment-form' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/3551430938802650818'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/3551430938802650818'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/05/blog-post_12.html' title='सरस्वती पथ और लोप कथा'/><author><name>राम बंसल/Ram Bansal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10182040999161020512</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/Sy4At1JB9aI/AAAAAAAAAAU/fJMHsDrudkE/S220/Ram30.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://farm3.static.flickr.com/2446/3753843749_5697eb440c_t.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4702532971528007953.post-1458733682708839545</id><published>2010-05-10T14:49:00.000+05:30</published><updated>2010-05-10T14:49:46.550+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आर्य'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सिकंदर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='महाभारत युद्ध स्थल'/><title type='text'>महाभारत युद्ध</title><content type='html'>वस्तुतः महाभारत युद्ध विश्व का प्रथम विश्व-युद्ध था किन्तु भारतीय  इतिहासकारों द्वारा इसे सही रूप में प्रस्तुत न किये जाने के कारण विश्व  इतिहास इसे विश्व यूद्ध की मान्यता प्रदान नहीं करता है. महाभारत ग्रन्थ के  अनुवादों में हुई त्रुटियों के कारण इस युद्ध के स्थान और समय में गंभीर  भ्रांतियां उत्पन्न हुई हैं जिसके कारण विश्व इतिहास में इस युद्ध का कोई  विवरण नहीं दिया जाता है. इसके पात्रों, काल और स्थल के बारे में मैंने जो शोध किये  हैं, उनके परिणाम निम्नांकित हैं -&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महाभारत के प्रमुख पात्र&amp;nbsp; &lt;br /&gt;महाभारत ग्रन्थ के वास्तविक नायक राम हैं जिन्हें ब्रह्मा भी कहा जाता था. किन्तु ग्रन्थ के मूल पथ में जहां-जहां राम शब्द आया है, हिंदी अनुवाद में उसे बलराम, परशुराम आदि कर दिया गया है जिससे राम को ग्रन्थ से पूरी तरह अनुपस्थित किया गया है.&amp;nbsp; किन्तु राम की हत्या महाभारत युद्ध के पूर्व ही कर दी गयी थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ग्रन्थ में कृष्ण खलनायक की भूमिका में है किन्तु उसकी भूमिका व्यापक सिद्ध करने के लिए अनेक शब्दों, जैसे श्याम, गोपाल, वासुदेव, माधव, हृषिकेश, जनार्दन, देवकीनंदन, आदि, को कृष्ण के अन्य नाम कह दिया गया है, जब कि इनमें से अनेक के तात्पर्य अन्य हैं.&amp;nbsp; &lt;a href="http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/04/blog-post_28.html"&gt;राम और कृष्ण की समकालीनता&lt;/a&gt; एक अन्य प्रमाण मैं पहले ही दे चुका हूँ. &lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://z.about.com/d/ancienthistory/1/0/d/o/2/alexanderissusmosaic.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://z.about.com/d/ancienthistory/1/0/d/o/2/alexanderissusmosaic.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;महाभारत युद्ध  में सिकंदर ने भाग लिया था जिसे महाभारत ग्रन्थ में शिखंडी कहा गया है. इस के  अतिरिक्त महाभारत ग्रन्थ में सेल्युकस का नाम हेल्युकस लिखा गया है जैसे कि सिन्धु को इंडस अथवा हिन्दू कहा जाता है.&amp;nbsp; कृष्ण के आमंत्रण पर सिकंदर&amp;nbsp; द्वारा भारत पर आक्रमण और पराजय के बाद सिकंदर ने समझौता कर लिया था, किन्तु कृष्ण ने उसे और उसकी सेना को दक्षिण भारत में बसा दिया गया था जिससे कि वे आगामी युद्ध की तैयारी कर सकें. १५ माह की तैयारी के पश्चात महाभारत युद्ध हुआ. इसीलिये विश्व इतिहास में सिकंदर का भारत में ठहराव १८ माह कहा गया है.&amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;युद्ध से पूर्व कृष्ण द्वारा देव योद्धाओं जैसे जरासंध, कंस, कीचक, आदि की हत्या छल-कपट से करा दी थी इसलिए वे स्वयं युद्ध करने में असमर्थ थे. इसलिए देव प्रमुख विष्णु ने भारत की यवनों से रक्षा के लिए सिकंदर द्वारा पराजित आर्यणाम के सम्राट डरायस-2 (दुर्योदन) आमंत्रित किया और शकुनि के छद्मरूप में उसक नीतिकार बने रहे. यही भारत में आर्यों का आगमन था. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;काल निर्णय&lt;br /&gt;यदि विश्व इतिहास में माना गया सिकंदर के भारत पर आक्रमण का काल सही माना जाये तो महाभारत युद्ध ३२२ ईसापूर्व में हुआ. मुझे अभी इसकी पुष्टि हेतु कोई सूत्र प्राप्त नहीं हुआ है, इसलिए मैं अभी इस बारे में अपनी ओर से कुछ नहीं कह सकता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;युद्ध स्थल&lt;br /&gt;प्रचारित मान्यता के अनुसार महाभारत युद्ध कुरुक्षेत्र में हुआ जो मुझे सही प्रतीत नहीं हुआ. इस बारे में मैंने कुरुक्षेत्र विश्व विद्यालय के इतिहास और इंडोलोजी विभाग के विद्वानों के मत जानने चाहे जिनके अनुसार कुरुक्षेत्र में की गयी अनेक खुदाइयों पर भी उस क्षेत्र में युद्ध के कोई प्रमाण प्राप्त नहीं हुए हैं. मेरे द्वारा सरस्वती नदी के मार्ग और अवशेषों के अन्वेषण हेतु&amp;nbsp; की गयी&amp;nbsp; पदयात्राओं&amp;nbsp; के दौरान मुझे अजमेर रेलवे स्टेशन के लगभग २ किलोमीटर उत्तर में उपस्थित जलधारा के दूसरे किनारे पर एक विशाल मैदान दिखाई दिया. वस्तुतः यह जलधारा ही सरस्वती नदी का एक अवशेष है. इस मैदान में महाबारत युद्ध क्षेत्र के अनेक लक्षण उपलब्ध हैं, विशेषकर युद्ध का अवलोकन करने का स्थान जो एक समीपस्थ पर्वत शिखर पर बना है. इस बारे में अभी अनुसंधान चल रहा है, विशेषकर महाभारत ग्रन्थ में इस स्थान के सन्दर्भ के बारे में.&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4702532971528007953-1458733682708839545?l=bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/feeds/1458733682708839545/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/05/blog-post_10.html#comment-form' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/1458733682708839545'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/1458733682708839545'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/05/blog-post_10.html' title='महाभारत युद्ध'/><author><name>राम बंसल/Ram Bansal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10182040999161020512</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/Sy4At1JB9aI/AAAAAAAAAAU/fJMHsDrudkE/S220/Ram30.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4702532971528007953.post-2871868182259071141</id><published>2010-05-08T04:08:00.001+05:30</published><updated>2010-05-09T10:17:03.208+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गणेश'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लक्ष्मी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='चाणक्य'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हनुमान'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भरत'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विष्णु'/><title type='text'>शास्त्रीय व्यक्तित्व और उनके बहुरूप</title><content type='html'>देवों द्वारा भारत भूमि के विकास की उत्कंठा और यवन-यहूदी-द्रविड़-असुर, आदि के समूह, जिसे हम 'यवन' समूह कहते हैं, द्वारा व्यवधान डालकर भारत पर शासन करने की महत्वाकांक्षा के संघर्ष में देव जनसँख्या का बहुत ह्रास किया गया था. कंस, कीचक, जरासंध, आदि अनेक देव योद्धा कृष्ण की कुटिलता से मृत्यु को प्राप्त हो गए थे. ऐसी स्थिति में अल्पसंख्य देवों द्वारा बहुसंख्य यवनों से संग्राम करना दुष्कर हो गया था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देव भारतभूमि की संतान थे जबकि यवन समूह बाहर से आया था. देव नहीं चाहते ते कि भारत भूमि पर किसी बाह्य शक्ति का अधिकार हो, इसलिए वे किसी बाह्य शक्ति को अपने सहयोग हेतु आमंत्रित भी नहीं करना चाहते थे. इसलिए उन्होंने एक नया तरीका अपनाया. प्रत्येक प्रमुख व्यक्ति विभिन्न समयों पर भिन्न रूप धारण करता और यवनों के साथ संघर्ष करता. इस के कारण यवनों को देवों के अल्पसंख्य होने का आभास&amp;nbsp; नहीं हो पाता था और उनका मनोबल बढ़ नहीं पाता था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस प्रकार के छद्म रूप धारण करने का एक दूसरा कारण मनोवैज्ञानिक था. जिस व्यक्ति के बारे में ज्ञान हो उससे युद्ध करना सरल होता है जबकि अज्ञात शत्रु प्रबल माना जाता है. छद्म रूप धारण करके देव यवनों के लिए अज्ञात बन जाते थे और उनसे युद्ध किया करते थे. इस क्रम में सर्वाधिक रूप भरत, जिन्हें महेश्वर भी कहा जाता है, ने धारण किये. वे छद्म रूपों की रचना के विशेषज्ञ भी थे. उन्होंने जो अनेक रूप धारण किये उनमें प्रमुख रूप हनुमान, परशुराम, सूर्यावतार, शिव, आदि नौ रूप धारण किये.&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/S-SWOwnjqvI/AAAAAAAAAIg/1C9eYw_kD6s/s1600/shiv-ganesh.jpeg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://2.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/S-SWOwnjqvI/AAAAAAAAAIg/1C9eYw_kD6s/s320/shiv-ganesh.jpeg" width="267" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;भरत ने ही जीसस ख्रीस्त को हाथी की मुखाकृति से आवृत कर उन्हें गणेश का रूप प्रदान किया ताकि वे यवनों की दृष्टि से ओझल होकर लेखन कार्य कर सकें.&amp;nbsp; भरत ने ही शिव के रूप में गणेश को अपना पुत्र बनाकर रखा. देवियों में जीसस की बड़ी बहिन मरियम विष्णु से विवाह कर लक्ष्मी, दुर्गा और काली के रूप धारण किया करती थीं. लक्ष्मी के रूप में विष्णुप्रिया कहलाती थीं तथा दुर्गा एवं काली रूपों में वे शत्रुओं का संहार किया करती थीं. आधुनिक भारत में भी गणेश और लक्ष्मी का पूजन साथ-साथ किया जाता है जो उनके भाई-बहिन के सम्बन्ध को दर्शाता है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ब्रह्मा (राम) के अनुज विष्णु (लक्ष्मण) ने भी दो प्रसिद्ध रूप धारण किये थे. महाभारत युद्ध के लिए देवों की शक्ति अपर्याप्त होने के कारण उन्होंने आर्य सम्राट डरायस -२ (दुर्योधन) को भारत में सेना सब्गठित कर यवनों से युद्ध करने के लिए आमंत्रित किया और स्वयं उसके मामा शकुनि के छद्म रूप में महाभारत युद्ध के नीतिकार बने रहे. इस युद्ध में पराजित होकर उन्होंने विष्णु गुप्त चाणक्य के रूप में महापद्मानंद का वध नियोजित किया और अपने पुत्र चन्द्र गुप्त मौर्य को भारत का सम्राट बनाया. &amp;nbsp;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4702532971528007953-2871868182259071141?l=bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/feeds/2871868182259071141/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/05/blog-post_08.html#comment-form' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/2871868182259071141'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/2871868182259071141'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/05/blog-post_08.html' title='शास्त्रीय व्यक्तित्व और उनके बहुरूप'/><author><name>राम बंसल/Ram Bansal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10182040999161020512</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/Sy4At1JB9aI/AAAAAAAAAAU/fJMHsDrudkE/S220/Ram30.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/S-SWOwnjqvI/AAAAAAAAAIg/1C9eYw_kD6s/s72-c/shiv-ganesh.jpeg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4702532971528007953.post-2438081294261937008</id><published>2010-05-04T05:59:00.001+05:30</published><updated>2010-05-04T06:02:40.118+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='देवनागरी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्राह्मी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='खरोष्टि'/><title type='text'>भारत की आदि भाषा और लिपियाँ</title><content type='html'>प्रत्येक मानव समुदाय की आदि भाषा ध्वन्यात्मक होती रही है जिसमें शब्दों के सुनिश्चित स्वरुप नहीं होते थे. ध्वनि के स्रोत जिह्वा को शास्त्रों में '&lt;a href="http://shastra-shabd-vyakhya.blogspot.com/2010/05/blog-post_1570.html"&gt;लिंग&lt;/a&gt;' कहा गया है, जिसे स्वर के भाव में भी लिया गया है. अंग्रेज़ी का आधुनिक शब्द&amp;nbsp; lenguage&amp;nbsp; भी इसी शब्द से बना है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेखन प्रक्रिया के प्रादुर्भाव ने शब्दों को सुनिश्चित स्वरुप दिए हैं. इसलिए प्रत्येक भाषा विकास का आरम्भ अक्षरों के स्वरुप निर्धारण से ही हुआ है. भारत में भी ऐसा ही हुआ. अक्षरों के विन्यास को आधुनिक काल में 'लिपि' कहा जाता है किन्तु भारत के शास्त्रीय काल में ऐसा नहीं था. उस समय '&lt;a href="http://shastra-shabd-vyakhya.blogspot.com/2010/05/blog-post_04.html"&gt;लिपि&lt;/a&gt;' का अर्थ 'चिकनाई' था.&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/S99qQ0KFyhI/AAAAAAAAAIM/qlWBXZKZg9g/s1600/brahma.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="400" src="http://1.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/S99qQ0KFyhI/AAAAAAAAAIM/qlWBXZKZg9g/s400/brahma.jpg" width="300" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;आधुनिक काल की तरह शास्त्रीय काल में भाषा और लिपि के लिए प्रथक शब्द नहीं थे, अतः दोनों के लिए एक ही शब्द '&lt;a href="http://shastra-shabd-vyakhya.blogspot.com/2010/05/blog-post_2000.html"&gt;श्री&lt;/a&gt;' का उपयोग किया जाता था. इसी शब्द का उपयोग 'लिखित' के भाव में भी किया जाता रहा है. तदनुसार अनेक शास्त्रों के नाम श्री से आरम्भ होते हैं यथा 'श्रीमद्भगवद्गीता', श्रीमद्भागवत' आदि जहां 'श्री' का तात्पर्य लिखित स्वरुप से है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत भूमि पर सर्वप्रथम ज्ञात श्री 'ब्राह्मी' थी जो ब्रह्मा द्वारा प्रस्तावित की गयी थी और आरंभिक ग्रंथों और शिलालेखों में इसका उपयोग किया गया था. ब्रह्मा को ही रामायण में राम कहा गया है. भारत विकास को समर्पित और ब्रह्मा एवं विश्वामित्र के सहयोगी मित्र जीसस ख्रीस्त थे जिन्होंने खरोष्टि श्री का प्रस्ताव किया. भारत के अनेक शिलालेख खरोष्टि में भी उपलब्ध हैं. आरम्भ में यह श्री दायें से बाएं को लिखी जाती थी. इसका कारण इसके प्रनायक का मूल स्थान इजराइल होना है जिस क्षेत्र की  लिपियाँ पर्शियन, अरबिक आदि का दायें से बाएं लिखा जाना था. ब्राह्मी के प्रभाव में खरोष्टि को संशोधित कर बाएं से दायें लिखे जाने हेतु विकसित किया गया.&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://www.omniglot.com/images/writing/devanagari_vwl.gif" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="190" src="http://www.omniglot.com/images/writing/devanagari_vwl.gif" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://www.omniglot.com/images/writing/devanagari_cons.gif" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="284" src="http://www.omniglot.com/images/writing/devanagari_cons.gif" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उपरोक्त देवों ने ही बाद में एक वैज्ञानिक श्री का विकास किया जिसे 'देवनागरी' नाम दिया गया. इसके बाद सभी वेदों और शास्त्रों को इसी श्री में लिखा गया. जिनकी भाषा तथा लिपि 'देवनागरी' ही कही जाती है. आज देवनागरी को एक लिपि के रूप में जाना जाता है, जबकि देवनागरी भाषा को 'वैदिक संस्कृत' कह दिया जाता है. यह श्री एक लिपि के रूप में आज भी प्रचलित है तथा भारत की एक भाषाओं जैसे संस्कृत, हिंदी, मराठी, आदि की अधिकृत लिपि है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4702532971528007953-2438081294261937008?l=bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/feeds/2438081294261937008/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/05/blog-post.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/2438081294261937008'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/2438081294261937008'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/05/blog-post.html' title='भारत की आदि भाषा और लिपियाँ'/><author><name>राम बंसल/Ram Bansal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10182040999161020512</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/Sy4At1JB9aI/AAAAAAAAAAU/fJMHsDrudkE/S220/Ram30.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/S99qQ0KFyhI/AAAAAAAAAIM/qlWBXZKZg9g/s72-c/brahma.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4702532971528007953.post-7339067793295504494</id><published>2010-04-28T14:03:00.000+05:30</published><updated>2010-04-28T14:03:02.648+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='महाभारत'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सहदेव-विभीषण प्रसंग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राम-कृष्ण समकालीनता'/><title type='text'>राम आर कृष्ण की समकालीनता</title><content type='html'>मैंने अपने इस ऐतिहासिक संलेख में अनेक स्तनों पर जोर देकर कहा है कि राम और कृष्ण समकालीन थे और इन दोनों के नेतृत्व में हुए संघर्ष को ही महाभारत कहा जाता है, यद्यपि शस्त्र युद्ध के पूर्व ही राम की हत्या किये जाने के कारण वे युद्ध में सम्मिलित नहीं थे. इसके प्रमाण स्वरुप 'राम' शब्द महाभारत ग्रन्थ के मूल वैदिक संस्कृत पाठ्य में अनेक स्थानों पर पाया जाता है&amp;nbsp; किन्तु हिंदी अनुवादों में 'राम' के स्थान पर 'बलराम', 'परशुराम', आदि नाम देकर राम को महाभारत से पूर्णतः अनुपस्थित किया गया है, जो भारतीय जनमानस के विरुद्ध एक षड्यंत्र के अंतर्गत किया गया है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस षड्यंत्र का विशेष कारण यह है कि कृष्ण चरित्र की तुलना में राम का चरित्र अतिश्रेष्ठ रहा है और दोनों की तलना करने पर कोई भी व्यक्ति कृष्ण को ईश्वर का स्वरुप स्वीकार नहीं कर सकता था. इसलिए कृष्ण भक्तों ने, जो बहुल संख्या में थे, राम को महाभारत से अनुपस्थित कर दिया और सभी अनुवाद इसी षड्यंत्र के अंतर्गत किये गए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महाभारत ग्रन्थ में ही एक प्रसंग राम और कृष्ण के समकालीन होने की स्पष्ट पुष्टि करता है. यहाँ महाभारत ग्रन्थ के गीताप्रेस गोरखपुर द्वार प्रकाशित हिंदी-अनुवाद सहित संस्करण संवत २०६५, चौदहवाँ पुनर्मुद्रण के प्रथम खंड, पृष्ठ ७५४ से आरम्भ, अध्याय ३१, 'सहदेव के द्वारा दक्षिण दिशा की विजय' प्रकरण में&amp;nbsp; पृष्ठ ७५९ पर दिए गए श्लोक समूह ७३ में सहदेव के घटोत्कच के प्रति शब्दों का हिंदी अनुवाद प्रस्तुत है -&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'वत्स! तुम मेरी आज्ञा से कर लेने के लिए लंकापुरी में जाओ और वहां राक्षसराज महात्मा विभीषण से मिल कर राजसूय यज्ञ के लिए भांति-भांति के बहुत से रत्न प्राप्त करो. महाबली वीर! उनकी ओर से भेंट में मिली हुई सब वस्तुएं लेकर शीघ्र यहाँ लौट आओ. बेटा! यदि विभीषण तुम्हें भेंट न दें, तो उन्हें अपनी शक्ति का परिचय इस प्रकार कहना - 'कुबेर के छोटे भाई लंकेश्वर! कुंतीकुमार युधिष्ठिर ने भगवान् श्रीकृष्ण के बाहुबल को देखकर भाइयों सहित राजसूय यज्ञ आरम्भ किया है. आप इस समय इन बातों को अच्छी तरह जान लें. आपका कल्याण हो, अब मैं यहाँ से चला जाऊंगा.' इतना कहकर तुम शीघ्र लौट आना, अधिक विलम्ब मत करना.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इससे आगे के विवरण में विभीषण द्वारा घटोत्कच का स्वागत और उसे अनेक बहुमूल्य उपहार दिए जाने सम्मिलित हैं. इसी प्रसंग में यह भी उल्लिखित है कि सहदेव के पास द्रविड़ सेना थी. यद्यपि यह हिंदी अनुवाद दोषपूर्ण हो सकता है तथापि प्रसंग की उपस्थिति ही यह सिद्ध करती है कि महाभारत काल में विभीषण लंका के राजा थे जिनका राजतिलक राम द्वारा किया गया था. अतः राम और कृष्ण का समकालीन होना सिद्ध होता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहाँ यह भी बाते दें कि इसी गीताप्रेस गोरखपुर के अनेक प्रकाशनों में राम को लाखों वर्ष पूर्व के त्रेता युग में, और कृष्ण को द्वापर युग में कहा गया है. यह सब सिद्ध करता है तथाकथित भारतीय विद्वान् केवल लकीर के फ़कीर हैं और वे तथ्यपरक शोध करने में असक्षम हैं. &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4702532971528007953-7339067793295504494?l=bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/feeds/7339067793295504494/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/04/blog-post_28.html#comment-form' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/7339067793295504494'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/7339067793295504494'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/04/blog-post_28.html' title='राम आर कृष्ण की समकालीनता'/><author><name>राम बंसल/Ram Bansal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10182040999161020512</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/Sy4At1JB9aI/AAAAAAAAAAU/fJMHsDrudkE/S220/Ram30.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4702532971528007953.post-4609337138675663606</id><published>2010-04-18T08:09:00.001+05:30</published><updated>2010-04-18T08:21:03.917+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आर्य'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दुर्योधन'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विष्णु'/><title type='text'>आर्यों का भारत आगमन</title><content type='html'>सिकंदर के भारत पर आक्रमण और उसके कृष्ण के सानिध्य में दक्षिण भारत में  बस कर एक बड़े युद्ध की तैयारियों में जुट जाने से देवों में चिंता  व्याप्त हो गयी. कृष्ण और पांडवों ने उन के योद्धाओं की एक-एक करके पहले ही  हत्या कर दी थी इसलिए उनकी क्षीण हो चुकी थी, जिसके कारण वे स्वयं युद्ध  करने में असमर्थ थे. उनमें से जो प्रमुख व्यक्ति जीवित थे उनमें विष्णु,  जीसस ख्रीस्त, विश्वामित्र, भरत और कर्ण आदि सम्मिलित थे.&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://www.livius.org/a/1/iran/darius.JPG" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="400" src="http://www.livius.org/a/1/iran/darius.JPG" width="300" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;उधर  सिकंदर ने पर्शिया के शासक डराय्स-द्वितीय को पराजित कर दिया था और वह महान योद्धा  जंगलों में भटक रहा था. पर्शिया का साम्राज्य ही आर्य साम्राज्य था और उस  समय उनका प्रमुख डराय्स ही था. यह जाति देवों की तरह ही एक सभ्य जाति थी और  यवनों से आतंकित थी. विष्णु ने डराय्स-द्वितीय से संपर्क स्थापित किया और उसे भारत  में सेना संगठित कर यवनों का मुकाबला करने को राजी कर लिया. डराय्स-द्वितीय का भारतीय नाम दुर्योधन रखा गया जो कौरव प्रमुख के रूप में विख्यात है. इस प्रकार आर्य जाति का भारत  में आगमन हुआ. यह जाति मूल रूप से यूरोप में क्यूरा नदी पर बसती थी जिसके  कारण इसे कुरु वंश भी कहा गया है. वहीं से आकर इस जाति ने पर्शिया में अपना  साम्राज्य स्थापित किया और बेबीलोन को अपनी राजधानी बनाकर विश्व के  सुन्दरतम नगर के रूप में विकसित किया था. पर्शिया का एक अन्य नाम आर्यणाम था जिससे आधुनिक शब्द ईरान बना है.&amp;nbsp; स्वयं के साम्राज्य की स्थापना हेतु आर्य जाति ने अनेक युद्ध किये थे जिसके कारण इन्हें युद्ध का अच्छा अनुभव  था.&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;/div&gt;दुर्योधन के बारे में एक और ऐतिहासिक तथ्य प्रासंगिक है. उसके एक पूर्वज सायरस ने हिन्दुकुश पार करके सिन्धु घाटी के नगरों के समूह को &lt;a href="http://www.voiceseducation.org/category/tag/darius-i"&gt;गांधार&lt;/a&gt; नाम दिया था. इस प्रकार गान्धार, दुर्योधन और शकुनी का गुप्त सम्बन्ध स्थापित होता है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विष्णु स्वयं यवन आतंक के निशाने पर थे और वे अकेले खुले रूप में नहीं रह सकते थे. इसलिए उन्होंने शकुनी का छद्म रूप धारण किया और दुर्योधन के मामा बनकर कौरव पक्ष के नीतिकार के रूप में कार्य करते रहे. इस विषयक सन्दर्भ भावप्रकाश नामक शास्त्र में गुप्त रूप में उपलब्ध है. क्योंकि महाभारत में यवन समूह की विजय के बाद कोई भी तथ्य स्पष्ट रूप में नहीं लिखा जा सकता था, जबकि भाव प्रकाश नामक ग्रन्थ स्वस्तिका, लक्ष्मी और सरस्वती देवियों ने महाभारत युद्ध के बाद उडीसा के तितलागढ़ नामक स्थान पर एक गुफा में गुप्त वास में लिखा था. तित्लागढ़ विष्णु की माँ देवी सुमित्रा का मायका था जिसके निकट के विशाल घोडार नामक ऐतिहासिक स्थल की प्राचीनता अब दम तोड़ रही है तथापि आसपास की पहाड़ियों पर अनेक भित्तिचित्र आज भी विद्यमान हैं.&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4702532971528007953-4609337138675663606?l=bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/feeds/4609337138675663606/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/04/blog-post_18.html#comment-form' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/4609337138675663606'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/4609337138675663606'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/04/blog-post_18.html' title='आर्यों का भारत आगमन'/><author><name>राम बंसल/Ram Bansal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10182040999161020512</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/Sy4At1JB9aI/AAAAAAAAAAU/fJMHsDrudkE/S220/Ram30.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4702532971528007953.post-7268573710611284396</id><published>2010-04-12T11:55:00.000+05:30</published><updated>2010-04-12T11:55:40.054+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मरियम'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गणेश'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जीसस'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लक्ष्मी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विष्णु'/><title type='text'>विष्णु-मरियम विवाह और जीसस का गणेश रूप</title><content type='html'>कृष्ण और यवनों द्वारा छल-कपट अपनाते हुए देवों की एक-एक करके हत्या की जा रही थी, जिनमें ब्रह्मा (राम), कीचक, कंस, जरासंध, आदि सम्मिलित थे. इससे&amp;nbsp; देवों की संख्या निरंतर कम हो रही थी. विष्णु उस समय तक अविवाहित थे, इसलिए वंश वृद्धि के प्रयोजन हेतु उन्होंने मरियम के साथ विवाह किया, जिसके कारण वे विष्णुप्रिया कहलाने लगीं. वे दूध की तरह गोरी थीं इसलिए उन्हें लक्ष्मी अर्थात दूध जैसी (lactum  = दूध) कहा जाने लगा और उनके पति विष्णु लक्ष्मण के नाम से भी जाने जाते थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देवी लक्ष्मी अत्यंत बलशाली थीं और युद्ध कला में पारंगत, इसलिए विष्णु शत्रु विनाश के लिए भी उनका उपयोग किया करते थे. अपने दुर्गा और काली के छद्म रूपों में भी वे शत्रुओं का विनाश करती रहती थीं. उस समय देवों की संख्या अल्प थी इसलिए प्रत्येक जीवित देव को शत्रुओं में भ्रम और भय फैलाने के लिए अनेक रूप धारण करने होते थे ताकि शत्रुओं को उनकी अल्प संख्या का बोध न हो सके. देवी लक्ष्मी भी इसी कारण से कभी दुर्गा तो कभी काली का रूप धारण किया करती थीं. विष्णु से विवाह के बाद ही विष्णुप्रिया लक्ष्मी ने चन्द्र गुप्त मोर्य को जन्म दिया था, जो गुप्त वंश के प्रथम सम्राट बने थे.&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/S8K8yLoJp9I/AAAAAAAAAH0/LBuCJ1Dq01U/s1600/vishnu-lakshmee.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="400" src="http://2.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/S8K8yLoJp9I/AAAAAAAAAH0/LBuCJ1Dq01U/s400/vishnu-lakshmee.jpg" width="306" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;अल्प संख्यक देवों की सुरक्षा के लिए भी उनका छद्म रूपों में रहना आवश्यक था. भरत छद्म रूप धारण करने और इसके लिए साधन निर्माण में निपुण थे. उन्होंने स्वयं भी नौ रूप धारण किये थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जीसस अत्यंत मेधावी व्यक्ति थे किन्तु उनमे शारीरिक बल का अभाव था. उधर यवन उन्हें पकड़ने के प्रयासों में लगे रहते थे. इसलिए देवों को उनकी सुरक्षा की विशेष चिंता रहती थी. यवनों के भारत में बसने से पूर्व वे किसी भी स्थान पर एक रात्री से अधिक नहीं ठहरते थे जिसके कारण वे अपने शोध और लेखन कार्य नहीं कर पाते थे. उन्हें गुप्त रूप में एक स्थान पर रखने के लिए भरत ने उन्हें गणेश जी का छद्म रूप प्रदान किया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गणेश जी का रूप प्रदान करने के लिए अगर की नरम काष्ठ से हाथी की सूंड सहित एक मुखौटा बनाया गया जिससे जीसस के सिर और मुख को आवृत किया गया. इसके बाद वे एक स्थान पर रहकर लेखन कार्य करते रहते थे. जीसस को अनेक नामों से भी जाना जाता था जिनमें श्री, प्रथम, गणेश, सृष्टा आदि प्रमुख थे. भाई बहेन गणेश तथा लक्ष्मी की प्रायः एक साथ पूजा अर्चना की जाती है. &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4702532971528007953-7268573710611284396?l=bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/feeds/7268573710611284396/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/04/blog-post_12.html#comment-form' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/7268573710611284396'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/7268573710611284396'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/04/blog-post_12.html' title='विष्णु-मरियम विवाह और जीसस का गणेश रूप'/><author><name>राम बंसल/Ram Bansal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10182040999161020512</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/Sy4At1JB9aI/AAAAAAAAAAU/fJMHsDrudkE/S220/Ram30.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/S8K8yLoJp9I/AAAAAAAAAH0/LBuCJ1Dq01U/s72-c/vishnu-lakshmee.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4702532971528007953.post-7888169798750003648</id><published>2010-04-04T03:15:00.000+05:30</published><updated>2010-04-04T03:15:11.771+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='महाभारत'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सिकंदर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पोरस'/><title type='text'>सिकंदर का आक्रमण</title><content type='html'>प्रचलित विश्व इतिहास के अनुसार सिकंदर, जिसे यूरोपीय भाषाओँ में अलग्जेंदर कहा जाता है, मिश्र और पर्शिया को विजित करता हुआ ३२३ ईसापूर्व में भारत पहुंचा. वस्तुतः सिकंदर को भारत पर आक्रमण के लिए कृष्ण ने आमंत्रित किया था जिसके लिए संदेशवाहक के रूप में विदुर को भेजा गया था.&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://www.amazon.com/Alexander-Directors-Cut-Full-Screen/dp/B0009PLLN6?ie=UTF8&amp;amp;tag=httpbhaaratta-20&amp;amp;link_code=bil&amp;amp;camp=213689&amp;amp;creative=392969" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;" target="_blank"&gt;&lt;img alt="Alexander - Director's Cut (Full Screen Edition)" height="400" src="http://ws.amazon.com/widgets/q?MarketPlace=US&amp;amp;ServiceVersion=20070822&amp;amp;ID=AsinImage&amp;amp;WS=1&amp;amp;Format=_SL160_&amp;amp;ASIN=B0009PLLN6&amp;amp;tag=httpbhaaratta-20" width="315" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;img alt="" border="0" height="1" src="http://www.assoc-amazon.com/e/ir?t=httpbhaaratta-20&amp;amp;l=bil&amp;amp;camp=213689&amp;amp;creative=392969&amp;amp;o=1&amp;amp;a=B0009PLLN6" style="border: medium none ! important; margin: 0px ! important; padding: 0px ! important;" width="1" /&gt;&lt;br /&gt;भारत के प्रवेश पर ही सिकंदर का सामना भरत ने किया था जिन्हें पुरु वंशी होने के कारण इतिहास में पोरस कहा गया है.इस युद्ध के बारे में बड़ी भ्रांतियां प्रचारित की गयी हैं - कि सिकंदर विजयी हुआ था और उसने भरत को क्षमा कर दिया था. यह सर्व विदित ई कि भारत में आगमन पर सिकंदर की सेना ने विद्रोह कर दिया था. यदि विद्रोह युद्ध से पूर्व किया गया था तो सिकंदर विजयी नहीं हो सकता था, और सिकंदर के विजयी होने बाद सेना को विद्रोह की आवश्यकता ही नहीं थी. यद्यपि सिकंदर की सेना भारतीय सेना की तुलना में अधिक अनुभवी और अस्त्र-शास्त्रों से सुसज्जित थी, किन्तु भरत को युद्ध की आशंका थी और इसके लिए पूरी तैयारियां की गयीं थीं. युद्ध के प्रथम दिन के परिणाम देखते हुए ही सिकंदर के सेना-नायकों ने और आगे युद्ध करने में अपनी असक्षमता दर्शाई थी जिसे विद्रोह कहा गया है. इस पराजय और विद्रोह के बाद ही सिकंदर ने भरत से संझौता किया था और सीमा से ही वापिस लौट जाने का वचन दिया था. युद्ध तो थम गया किन्तु सिकंदर उसी समय वापिस नहीं लौटा. कृष्ण ने उसे और उसकी सेना को दक्षिण भारत मदुरै के पास बसा दिया था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सिकंदर की सेना में यद्यपि अनेक जातियों के सैनिक थे किन्तु मूल सेना में अधिकाँश डोरियन होने के कारण सभी को डोरियन कहा जाता था. 'डोरियन' शब्द का आधुनिक स्वरुप ;द्रविड़' है. अतः दक्षिण भारत के द्रविड़ सिकंदर के सैनिकों के रूप में भारत आये थे. यहाँ यह भी महत्वपूर्ण है कि मलयाली और कन्नड़ मूलतः द्रविड़ नहीं हैं यद्यपि इन्हें भी अब द्रविड़ ही माना जाता है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यूरोपीय इतिहासकारों का अनुसतन करते हुए भारत के राजकीय वेतनभोगी तथाकथित इतिहासकार भी सिकंदर को 'महान' कहते हैं जब कि उसमें महानता का कोई लक्षण नहीं था. इंटरपोल के आधुनिक शोधों के अनुसार वह अत्यधिक शराबी था और मामूली की नाराजगी पर ही अपने प्रियजनों की हत्या कर देता था. उसके शरीर में पाशविक शक्ति थी जिसके कारण वह घायल अवस्था में भी युद्ध में सक्रिय रहता था. इसी पाशविकता के कारण वह युद्धों में विजयी रहा.न कि किसी मानवीय गुण के कारण. हौलीवूद से अभी बनी फिल्म के अनुसार समलैंगिक मैथुन का शौक़ीन था और उसके पुरुष प्रेमी का नाम हाइलास था जो युद्धों में भी उसका शौक पूरा करता था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत में बसने के बाद उसके सैनिकों ने भारतीय स्त्रियों का अपहरण कर अपने घर बसाये जिसके लिए उन्हें क्तिष्ण का अभयदान प्राप्त ता. उसको समर्पित कर वे कुछ भी अनैतिक करने के लिए स्वतंत्र थे. इसी पड़ाव में सिकंदर ने अपनी सेना को पुनर्संगठित किया और लगभग १५ माह बाद हुए महाबारत युद्ध में 'शिखंडी' नाम से भाग लिया.समस्त आशिया का विजयी सिकंदर महाभारत में एक नगण्य योद्धा रहा, अतः भारतीय दृष्टिकोण से उसे महान नहीं कहा जा सकता.  &amp;nbsp;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4702532971528007953-7888169798750003648?l=bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/feeds/7888169798750003648/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/04/blog-post.html#comment-form' title='7 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/7888169798750003648'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/7888169798750003648'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/04/blog-post.html' title='सिकंदर का आक्रमण'/><author><name>राम बंसल/Ram Bansal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10182040999161020512</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/Sy4At1JB9aI/AAAAAAAAAAU/fJMHsDrudkE/S220/Ram30.jpg'/></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4702532971528007953.post-1957905668103144281</id><published>2010-03-26T10:46:00.001+05:30</published><updated>2010-03-26T10:53:57.976+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अकबर का छल'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='देवीदुर्गा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='फ़तेहपुर सीकरी'/><title type='text'>फतेहपुर सीकरी की सत्यता</title><content type='html'>आगरा के निकट एक प्रसिद्द एतिहासिक स्थल फतेहपुर सीकरी है जिसे अकबर द्वारा निर्मित बताया जा रहा है जबकि अनेक ऐतिहासिक साक्ष्य सिद्ध कराते हैं कि अकबर से इसके निर्माण का कोई सम्बन्ध नहीं है. यह महाभारत से पूर्व देवों द्वारा बसाया गया एक लाल पत्थरों से बना नगर था जिसमें देव परिवार रहते थे. इसका निर्माण काल अब से लगभग २,५०० वर्ष पूर्व इस आधार पर सिद्ध होता है कि सिकंदर का भारत पर आक्रमण ईसापूर्व ३२३ में हुआ जिसके १५ माह बाद महाभारत युद्ध हुआ. इस युद्ध में सिकंदर उपस्थित था जिसे 'महाभारत' ग्रन्थ में शिखंडी कहा गया है तथा जो समलैंगिक मैथुन के लिए प्रसिद्द था. इसकी समलैंगिकता का चित्रण अभी कुछ वर्ष पहले हॉलीवुड से निर्मित फिल्म Alexander में भी किया गया है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फतेहपुर सीकरी लगभग ४ वर्ग किलोमीटर क्षत्र में फैला एक नगर था जो ध्वस्त किया जाकर केवल कुछ भवनों तक सीमित कर दिया गया है. मुस्लिम शासकों द्वारा कब्रिस्तान में परिवर्तित किये जाने के बाद भी वर्तमान भवन भी वास्तुकला और सौन्दर्य के अद्भुत उदाहरण हैं. इसके मुख्य भवन के प्रांगण में सलीम चिश्ती का स्मारक बना है जो स्पष्ट रूप से बाद का निर्माण है और संभवतः यही अकबर द्वारा बनवाया गया था. अकबर के शासन काल में भी यह नगर इतना भव्य था कि उसने इसे अपनी राजधानी बनने का प्रयास किया. किन्तु उसके इंजीनिअर इस नगर के प्राचीन जल-प्रदाय संस्थान को सक्रिय न कर सके और वह इसे त्याग कर दिल्ली चला आया. यह विशाल जल संस्थान अब भी सुरक्षित है किन्तु इसे समझने और सक्रिय करने के कोई प्रयास वर्तमान सरकारी वेतनभोगी तथाकथित विशेषज्ञों ने नहीं किये हैं. यदि यह नगर तथा जल संस्थान अकबर द्वारा बनवाया गया होता तो उसे जलाभाव में यह नगर छोड़ने की विवशता नहीं होती. नगर के पश्चिमी किनारे पर एक जलधारा का सतत प्रवाह रहता है जिसके समीप ही जल-संस्थान स्थित है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नगर के मुख्य भवन का द्वार बुलंद दरवाजा कहलाता है जिसके विशाल मुख पर ईसा मसीह का एक वाक्य उत्कीर्ण है जो अकबर कदापि नहीं कराता क्योंकि विश्व का सबसे लम्बा युद्ध ईसाई और इस्लाम धर्मावलम्बियों के मध्य हुआ है जो ६३० से आरम्भ होकर १९वीं शताब्दी तक चला है.  &lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/S6xC3QrL8oI/AAAAAAAAAHY/EifCKkc-JNI/s1600/Bulandgate%2814%29.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="400" src="http://3.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/S6xC3QrL8oI/AAAAAAAAAHY/EifCKkc-JNI/s400/Bulandgate%2814%29.jpg" width="337" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;अकबर इस नगर में एक युद्ध में विजय प्राप्ति के बाद आया था, उस समय ऐसे भव्य नगर का निर्माण करना एक असंभव कल्पना है. नगर के एक भवन को आज भी 'सीताजी की रसोई' कहा जाता है जो इस नगर का देवों के साथ सम्बन्ध स्थापित करता है. जल संस्थान के दक्षिण में ऊंची चारदीवारी से घिरा एक प्रांगण है जिसके मद्य एक जलताल है. इस प्रांगण में देवी दुर्गा के पालतू शेर रखे जाते थे जिनपर सवारी कर वह दुष्टों का संहार करने जाया करती थीं. दुष्टों में उनका इतना आतंक था कि वे रात्रि भर जागृत रहते और देवी को प्रसन्न रखने के लिए उनके गुणगान कराते रहते. इसी प्रचलन को आज देवी-जागरण कहा जता है जो पुनजब क्षेत्र से फैलता हुआ उत्तरी भारत के अनेक क्षेत्रों में प्रचलित है. यही देवी दुर्गा मूलतः ईसा मसीह की बड़ी बाहें मरियम थीं जो विष्णु से विवाह होने के कारण 'विष्णुप्रिया' भी कहलाती थीं. विष्णु का एक नाम लक्ष्मण होने के कारण इन्ही देवी को 'लक्ष्मी' के रूप में भी जाना जाता है. वैश्य समाज की ये आराध्य देवी हैं क्योंकि वैश्य (गुप्त) वंश का आरम्भ इन्ही के पुत्र चन्द्र गुप्त मोर्य से हुआ. काली के रूप में भी ये शतरूप\ओं का संहार किया करती थीं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.amazon.com/Alexander-Directors-Cut-Full-Screen/dp/B0009PLLN6?ie=UTF8&amp;amp;tag=httpbhaaratta-20&amp;amp;link_code=bil&amp;amp;camp=213689&amp;amp;creative=392969" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;" target="_blank"&gt;&lt;img alt="Alexander - Director's Cut (Full Screen Edition)" src="http://ws.amazon.com/widgets/q?MarketPlace=US&amp;amp;ServiceVersion=20070822&amp;amp;ID=AsinImage&amp;amp;WS=1&amp;amp;Format=_SL160_&amp;amp;ASIN=B0009PLLN6&amp;amp;tag=httpbhaaratta-20" /&gt;&lt;/a&gt;फतेहपुर सीकरी के मुख्य भवन के उत्तर में एक विद्यालय भवन है जहाँ देवों के बच्चे शिक्षा पाते थे. यह नगर उस समय बनाया गया जब यवन समुदाय ने देवों को सताना आरम्भ कर दिया था और देव पुरुष संघर्षों में व्यस्त रहते थे. इसलिए परिवारों को सुरक्षित रखने के लिए इस नगर को बसाया गया जिसकी चारदीवारी में केवल एक द्वार था जो पूर्व की ओर आज भी स्थित है. नगर के मुख्य भवनों में देव परिवार रहते थे तथा स्त्रियाँ ग्रंथों के लेखन का कार्य करती थीं. महाभारत की रचना प्रमुखतः इसी नगर में की गयी जिसमें देव स्त्रियों का प्रमुख योगदान है. &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;img alt="" border="0" height="1" src="http://www.assoc-amazon.com/e/ir?t=httpbhaaratta-20&amp;amp;l=bil&amp;amp;camp=213689&amp;amp;creative=392969&amp;amp;o=1&amp;amp;a=B0009PLLN6" style="border: medium none ! important; margin: 0px ! important; padding: 0px ! important;" width="1" /&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4702532971528007953-1957905668103144281?l=bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/feeds/1957905668103144281/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/03/blog-post_26.html#comment-form' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/1957905668103144281'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/1957905668103144281'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/03/blog-post_26.html' title='फतेहपुर सीकरी की सत्यता'/><author><name>राम बंसल/Ram Bansal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10182040999161020512</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/Sy4At1JB9aI/AAAAAAAAAAU/fJMHsDrudkE/S220/Ram30.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/S6xC3QrL8oI/AAAAAAAAAHY/EifCKkc-JNI/s72-c/Bulandgate%2814%29.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4702532971528007953.post-4608256484391460169</id><published>2010-03-17T16:34:00.000+05:30</published><updated>2010-03-17T16:34:01.599+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मरियम'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जीसस ख्रीस्त'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विष्णुगुप्त चाणक्य'/><title type='text'>मरियम के मकबरे का छल</title><content type='html'>आगरा के निकट सिकन्दरा में &lt;a href="http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/03/blog-post_14.html"&gt;अकबर के मकबरे&lt;/a&gt; के सामने सड़क के दूसरी ओर कुछ आगे एक मकबरा और है जिसे 'मरियम का मकबरा' कहा जाता है. इस मकबरे के प्रवेश द्वार के निकट भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा एक बोर्ड लगाया हुआ है जिसमें बताया गया है कि 'मरियम' अकबर की पत्नी जोधाबाई की ही उपाधि थी और इस प्रकार इस मकबरे को जोधाबाई का मकबरा सिद्ध किया गया है. भारत के अकबर कालीन इतिहास का पूरा लेखा-जोखा उपलब्ध है किन्तु उसमें ऐसा कोई उल्लेख नहीं है कि जोधाबाई को कबी मरियम भी कहा गया था. यदि ऐसा कोई प्रमाणित सूत्र उपलब्ध हो तो मेरा भारत के प्रतिष्ठित इतिहासकारों से निवेदन है कि वे उसे प्रकाश में लायें.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी दृष्टि में पुरातत्व सर्वेक्षण जैसा छल अकबर के मकबरे के बारे में कर रा है, मरियम के मकबरे में उससे कहीं अधिक घिनोना छल कर रहा है. भारत के तथाकथित इतिहासकार जीसस तथा मरियम को भारत के इतिहास के पात्र नहीं मानते, इसलिए सदा-सदा से जाने गए 'मरियम के मकबरे को जोधाबाई का मकबरा कहा जा रहा है. मैंने अपने इस संलेख के एक &lt;a href="http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2009/12/blog-post_14.html"&gt;आलेख&lt;/a&gt; में जीसस और मरियम को अपने ऐतिहासिक पात्र कहा है, और यह मकबरा मेरे इतिहास की पुष्टि करता है. इसके समर्थन में अनेक तर्क उपस्थित हैं जिनकी चर्चा यहाँ की जा रही है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अकबर के मकबरे के सामने सड़क के दूसरी ओर का विशाल क्षेत्र इसाई समुदाय की संपत्ति है, जिसपर एक चर्च, एक स्कूल तथा अनेक आवास बने हैं. इन्ही के मध्य उक्त मरियम का मकबरा है. भारत में जहाँ कहीं भी प्राचीन भवनों एवं स्थलों पर मुग़ल शासन काल में इस्लामी तख्तियां लगाई गयीं, उन सब को मुस्लिमों के अधिकार में दे दिया गया था, फलस्वरूप, तःमहल प्रांगण के अनेक भवन, फतहपुर सीकरी के भवन, तथा आगरा के अनेक ऐतिहासिक भवनों पर मुसलामानों का अधिकार है. अकबर के तथाकथित मकबरे पर भी मुस्लिम अधिकार बना हुआ है. इस सबके रहते हुए भी मरियम के मकबरे पर कोई मुस्लिम अधिकार नहीं है और इसके ईसाई संपत्ति के मद्य होने से सिद्ध होता है कि यह मकबरा किसी ऐसी स्त्री का है जिसका सम्बन्ध ईसाई धर्म से है. इस कारण से मुग़ल साम्राज्य काल में भी इसे इस्लाम से सम्बंधित नहीं कहा गया और इस पर अधिकार नहीं किया गया. इससे स्पष्ट है कि यह मकबरा जोधाबाई का न होकर जीसस की बहिन मरियम का है.&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/S6C2Mik2NnI/AAAAAAAAAGQ/t_3birZ-uaQ/s1600-h/mary-tomb.bmp" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="232" src="http://3.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/S6C2Mik2NnI/AAAAAAAAAGQ/t_3birZ-uaQ/s400/mary-tomb.bmp" width="400" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;मरियम के मकबरे का आतंरिक अभिकल्प (ऊपर का चित्र) अन्य किसी भी मकबरे से भिन्न है और यह पशिमी बंगाल में स्थित विष्णुपुर में बने प्राचीन कालीन महलों (नीचे का चित्र) से मेल खाता है. मेरे द्वारा भारत के शोधित इतिहास में महाभारत युद्ध के पश्चात जब देवों की संख्या क्षीण हो गयी थी तब विष्णु (लक्ष्मण) ने मरियम से विवाह किया था जिसने चन्द्रगुप्त को जन्म दिया था. इस युद्ध में पांडव पक्ष का&amp;nbsp; नीतिकार कृष्ण था और कौरव पक्ष के नीतिकार शकुनी के छद्म रूप में स्वयं विष्णु थे. महाभारत युद्ध के बाद कृष्ण और सिकंदर के आग्रह पर महा पद्मानंद को भारत का सम्राट बनाया गया था.&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/S6C2eT0_UxI/AAAAAAAAAGY/hdhqrWDZGAI/s1600-h/Vishnupur.JPG" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://3.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/S6C2eT0_UxI/AAAAAAAAAGY/hdhqrWDZGAI/s320/Vishnupur.JPG" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;महाभारत की पराजय का बदला लेने के लिए विष्णु ने अपना नाम विष्णुगुप्त चाणक्य रखा और जीसस ने अपना नाम चित्रगुप्त रखा और भारत को महा पद्मानंद के शासन से मुक्त कराने का बीड़ा उठाया जिसमें वे सफल रहे और चन्द्रगुप्त को भारत का सम्राट बनाया गया. यहीं से गुप्त वंश के शासन का आरम्भ हुआ और भारत विश्व प्रसिद्द 'सोने की चिडिया' कहलाया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अतः उक्त मकबरा वास्तविक मरियम का ही मकबरा है, जो जीसस की बहिन, विष्णु की पत्नी, एवं चन्द्र गुप्त की माँ थीं. लक्ष्मी, दुर्गा एवं काली इनके अन्य रूप थे जिनकी चर्चा प्रसंगानुसार की जायेगी. &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4702532971528007953-4608256484391460169?l=bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/4608256484391460169'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/4608256484391460169'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/03/blog-post_17.html' title='मरियम के मकबरे का छल'/><author><name>राम बंसल/Ram Bansal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10182040999161020512</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/Sy4At1JB9aI/AAAAAAAAAAU/fJMHsDrudkE/S220/Ram30.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/S6C2Mik2NnI/AAAAAAAAAGQ/t_3birZ-uaQ/s72-c/mary-tomb.bmp' height='72' width='72'/></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4702532971528007953.post-8628497229294910122</id><published>2010-03-14T16:32:00.000+05:30</published><updated>2010-03-14T16:32:49.327+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अकबर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='स्वस्तिका सिकन्दरा'/><title type='text'>अकबर के मकबरे का छल</title><content type='html'>आगरा से लगभग ८ किलीमीटर की दूरी पर एक ऐतिहासिक स्थल है 'सिकन्दरा', जहां एक विशाल प्रांगण में अति भव्य भवन स्थित है. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा इसे अकबर के मकबरे के नाम से प्रचारित किया जाता रहा है. इस के केन्द्रीय भवन में एक कब्र बनी है जिसपर तैनात एक मुस्लिम अपनी चन्दा वसूली करता रहता है. इसी भवन के एक बरामदे में दो कब्रें और बनी हैं जिन्हें अलबर की पुत्रियों की कब्रे कहा जाता है. इसी भवन के चारों ओर भव्य बरामदे हैंजिनकी भूमि खोखली है अर्थात नीचे भी कक्ष बने हैं. यह खोखलापन पदचापों की प्रतिध्वनियों से स्पष्ट हो जाता है.&amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/S5zBUpanROI/AAAAAAAAAFY/_ZXTndIepDs/s1600-h/Sikandra%2816%29.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://4.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/S5zBUpanROI/AAAAAAAAAFY/_ZXTndIepDs/s320/Sikandra%2816%29.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;इस प्रांगन का मुख्य द्वार स्वस्तिक चिन्हों से सुशोभित है और अनेक सह-भवनों के पत्थरों पर अनेक पशु, पक्षी, वस्तु आदि के चित्र अंकित हैं. मैं लगभग पांच वर्ष पूर्व वहाँ गया था और समस्त प्रांगण की भव्यता एवं चित्रकारी से ऐसा प्रतीत नहीं होता कि इस का सम्बन्ध किसी मुस्लिम से है, विशेषकर सर्वाधिक विलासी अकबर से. मैंने इस बारे में वहा तैनात पुरातत्व अधिकारी से बातचीत की.&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/S5zBItsw5RI/AAAAAAAAAFQ/QNXkS2MfR7w/s1600-h/Sikandra1.JPG" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://1.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/S5zBItsw5RI/AAAAAAAAAFQ/QNXkS2MfR7w/s320/Sikandra1.JPG" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&amp;nbsp; &lt;br /&gt;मेरा पहला प्रश्न था कि अकबर का मकबरा किसने बनवाया, उसका पुत्र तो ऐसा कार्य कर नहीं सकता क्योंकि उसने तो अकबर से विद्रोह कर सत्ता हथियाती थी. इसका उत्तर जो मुझे दिया गया वह आश्चर्य काकित करने वाला है. उत्तर था - 'अकबर ने अपनी मृत्यु से पूर्व अपने लिए यह मकबरा बनवाया था.&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/S5zBzSLXsbI/AAAAAAAAAFo/uzKBjiB-3Oc/s1600-h/Sikandra4.JPG" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://3.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/S5zBzSLXsbI/AAAAAAAAAFo/uzKBjiB-3Oc/s320/Sikandra4.JPG" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;मेरा दूसरा प्रश्न था कि एक कट्टर मुस्लिम के मकबरे पर स्वस्तिक चिन्ह और जीवों के चित्रों के अंकन का क्या रहस्य है? इसका उत्तर मिला कि अकबर सभी धर्मों का सम्मान करता था. इस पर मैंने पूछा कि इस सम्पूर्ण प्रांगण में मुझे कोई मुस्लिम प्रतीक दिखाइए, और मुझे इसका लोई उत्तर नहीं दिया गया. वस्तुतः संपूर्ण प्रांगण में कोई इस्लामिक चिन्ह उपस्थित नहीं है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरा तीसरा प्रश्न था कि ज्ञात इतिहास के अनुसार अकबर निःसंतान था और किसी सूफी की कृपादृष्टि से ही उसकी पत्नी के गर्भ से एक पुत्र का जन्म हुआ था. (वैज्ञानिक दृष्टिकोण से ऐसी कतिप का अर्थ मैथुन क्रिया ही होता है, जो अकबर के विरुद्ध विद्रोह का भी कारण हो सकता है.) अतः अकबर की कोई पुत्री थी ही नहीं पुत्रियों की कब्र कैसे बन गयीं. उपस्थित अधिकारी के पास इसका भी कोई उत्तर नहीं था.&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;इस सब का अर्थ यही है कि उक्त भवन अकबर का मकबरा नहीं है और न ही इसे भारत पर मुस्लिम शासन की अवधि में निर्मित किया गया. स्वस्तिक चिन्ह इसे देव जाति द्वारा निर्मित भवन सिद्ध करता है. राम की पत्नी का वास्तविक नाम 'स्वस्तिका' था&amp;nbsp; इसी आधार पर स्वस्तिक शब्द का अर्थ 'स्वास्थ' लिया जाता है क्योंकि उनके मुख लेखन स्वास्थ संबंधी है. देवों द्वारा भारत के विकास के समय लिखे गए अधिकाँश शास्त्र स्त्रियों द्वारा ही लिखे गए थे. अतः उक्त भवन राम की पत्नी स्वस्तिका का स्मारक है. इसी का एक अन्य प्रमाण इसी संलेख पर अगले आलेख में पढ़िए. .&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4702532971528007953-8628497229294910122?l=bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/feeds/8628497229294910122/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/03/blog-post_14.html#comment-form' title='8 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/8628497229294910122'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/8628497229294910122'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/03/blog-post_14.html' title='अकबर के मकबरे का छल'/><author><name>राम बंसल/Ram Bansal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10182040999161020512</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/Sy4At1JB9aI/AAAAAAAAAAU/fJMHsDrudkE/S220/Ram30.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/S5zBUpanROI/AAAAAAAAAFY/_ZXTndIepDs/s72-c/Sikandra%2816%29.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4702532971528007953.post-3099627655564421577</id><published>2010-03-11T08:10:00.001+05:30</published><updated>2010-03-11T08:11:47.731+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अज्ञानता'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अचिंतन'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भारतीय समाज'/><title type='text'>अज्ञानता और अचिंतन का अन्धकार</title><content type='html'>ईश्वर, धर्म, अद्यात्म, आदि, यदि हम इन शब्दों को वर्तमान में प्रचलित अर्थों में लें, मानवता में अचिंतन के सूत्रपात सिद्ध होते हैं. ये सभी शब्द भारत के प्राचीन वेदों और शास्त्रों में पाए जाते हैं किन्तु वहाँ इनके &lt;a href="http://shastra-shabd-vyakhya.blogspot.com/"&gt;अर्थ&lt;/a&gt; वर्तमान में प्रचलित अर्थों से भिन्न हैं. इन शब्दों के नए अर्थ जानबूझकर भिन्न किये गए ताकि ज्ञान के अकूत भण्डार इन देव ग्रंथों के ज्ञान को सदा सदा के लिए लुप्त कर दिया जाये और लोग इनमें उन विकृत भावों को ही देख पायें जो शब्दार्थ परिवर्तन से इन पर थोपे गए हैं. इससे तीन लाभ हुए - &lt;br /&gt;&lt;ol&gt;&lt;li&gt;वेदों और शास्त्रों का वास्तविक ज्ञान लुप्त हो गया,&amp;nbsp;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;वेदों और शास्त्रों की प्रमाणिकता का दुरूपयोग कर षड्यंत्रकारियों ने अपना भ्रम फ़ैलाने का लक्ष्य प्राप्त किया.&lt;/li&gt;&lt;li&gt;निरक्षर षड्यंत्रकारियों को अपने मंतव्य हेतु कोई नया ग्रन्थ नहीं लिखना पड़ा. परिणामस्वरूप, देवों के विज्ञानं और इतिहासपरक ग्रन्थ - वेद और शास्त्र, धर्म ग्रन्थ मने जाने लगे.&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/li&gt;&lt;/ol&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://i41.tinypic.com/241mava.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="300" src="http://i41.tinypic.com/241mava.jpg" width="400" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;इसी आधार पर श्रीमद भगवद्गीता में जन समुदाय को दो वर्गों में दर्शाया गया है - धर्मक्षेत्रे और कुरुक्षेत्रे, अर्थात धर्मावलम्बी और कर्मावलम्बी. इसी से सिद्ध होता है कि धर्म और कर्म परस्पर विरोधी धारणाएं हैं. धर्म का आडम्बर चाहे जितना भी किया गया हो, कर्म के महत्व को कभी कम नहीं किया जा सका. इससे लोगों में असमंजस उत्पन्न हुआ कि वे धर्म को अपनाएं या कर्म को. अपने परिश्रम के बल पर आजीविका चलाने और मानव सभ्यता का विकास करने के पक्षधरों ने कर्म का मार्ग अपनाया तो समाज को ब्रमित कर उसे अज्ञानता के अचिंतन में निमग्न करते हुए उस पर मनोवैज्ञानिक हनन के माध्यम से राजनैतिक शासन करने वालों ने धर्म को अपनाया. यहीं से आरम्भ हुआ मानवता के संगठित शोषण का इतिहास.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज का भारतीय समाज तीन वर्गों में विभाजित देखा जा सकता है - नगण्य कर्मावलम्बी, संगठित धर्मावलम्बी और असंख्य अज्ञान और अचिंतन के अन्धकार से भ्रमित जनसाधारण. कर्मावलम्बी परिश्रम करते हैं और अपनी बुद्धि का सदुपयोग करते हुए मानवीय गुणों का विकास करते हैं, धर्मावलम्बी संगठित रूप में तीसरे वर्ग का शोषण करते हुए वैभव भोगते हैं और अपनी बुद्धि का दुरूपयोग करते हुए समाज को भ्रमित एवं ईश्वर के नाम से आतंकित करने एवं रखने हेतु नए नए मार्ग खोजते हैं. तीसरा वर्ग वस्तुतः शोषित है और असमंजस में है, वह कर्म करता है अपनी आजीविका हेतु किनता इससे प्राप्तियों का बहुलांश संगठित धर्मावलम्बी हड़प लेते हैं&amp;nbsp; आजीविका के संकट से तृस्त यह वर्ग आतंकित भी है और अचिंतन के अन्धकार में निमग्न भी. चूंकि यह समाज का बहुत बड़ा अंश है, इसलिए इसी की स्थिति को समाज की सामान्य स्थिति माना जा सकता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समाज का शोषित तीसरा अंश पूरी तरह निर्धन नहीं है, इसमें अनेक धनवान भी सम्मिलित हैं किन्तु ये बौद्धिक कंगाल हैं क्योंकि ये तो यह भी नहीं जानते कि कितना कमाएं और किसलिए. कमाई की अनंत यात्रा पर बस चलते रहते हैं - धनवान होते हुए भी अनंत धन-सम्पदा की कामना लिए हुए अपनी कमाई कोई सदुपयोग भी नहीं कर पाते. संगठित धर्मावलम्बी इन्ही की अज्ञानता, अचिंतन और सम्पन्नता का शोषण करते हुए वैभवपूर्ण जीवन जीते हैं. &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4702532971528007953-3099627655564421577?l=bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/feeds/3099627655564421577/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/03/blog-post.html#comment-form' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/3099627655564421577'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/3099627655564421577'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/03/blog-post.html' title='अज्ञानता और अचिंतन का अन्धकार'/><author><name>राम बंसल/Ram Bansal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10182040999161020512</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/Sy4At1JB9aI/AAAAAAAAAAU/fJMHsDrudkE/S220/Ram30.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://i41.tinypic.com/241mava_th.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4702532971528007953.post-5886721476595051713</id><published>2010-02-13T06:06:00.000+05:30</published><updated>2010-02-13T06:06:32.139+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सनातन धर्म'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='तुलसी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='शंकराचार्य'/><title type='text'>आचार्य शंकर और सनातन धर्म</title><content type='html'>यवन समूह को सशक्त करने वाले एक मात्र शिक्षित व्यक्ति आचार्य शंकर थे. चूंकि यवन समूह का मुख्य उद्देश्य भारत में धर्मों के माद्यम से ईश्वर का आतंक और भ्रम फैलाकर यहाँ अपना शासन स्थापित करना था, इसलिए आचार्य शंकर के  '&lt;a href="http://shastra-shabd-vyakhya.blogspot.com/2010/02/blog-post_12.html"&gt;सनातन धर्म&lt;/a&gt;' को भी दुष्प्रचारित किया गया और उसके माध्यम से भी यवनों ने अपना मंतव्य सिद्ध किया. . &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आचार्य शंकर ने ही आधुनिक संस्कृत को जन्म दिया और इस भाषा के आधार पर वेदों और शास्त्रों के त्रुटिपूर्ण अनुवाद प्रचारित किये ताकि लोग कभी इनके मूल मंतव्यों को न समझ सकें. आचार्य शंकर चूंकि एक प्रकांड पंडित थे इसलिए उनके वचनों को लोगों ने महत्व दिया और वे वेदों और शास्त्रों के मूल मंतव्यों से दूर हो गए. इससे यवन समूह का मार्ग सरल हो गया.&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/S3XwwfwnzsI/AAAAAAAAADM/F-E3qr8CaNY/s1600-h/shankar.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://4.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/S3XwwfwnzsI/AAAAAAAAADM/F-E3qr8CaNY/s320/shankar.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;धर्म के क्षेत्र में आचार्य शंकर का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा जो भारतीय जनमानस को अभी तक डस रहा है. शब्द 'सनातन धर्म' का मूल मंतव्य लोगों में स्वास्थ के महत्व को रेखांकित करना था किन्तु इसे लोगों के समक्ष छद्म रूप में एक नए धर्म के रूप में प्रस्तुत किया गया. सनातन धर्म के मंतव्य को सिद्ध करने के लिए आचार्य शंकर ने देश के चारों कोनों में चार मठ स्थापित किये -&lt;br /&gt;उत्तर में बदरिकाश्रम में ज्योतिः पीठ,&amp;nbsp; &lt;br /&gt;पूर्व में जगन्नाथ पुरी में गोवर्धन पीठ,&lt;br /&gt;दक्षिण में श्रृंगेरी में शारदा पीठ, तथा &amp;nbsp; &lt;br /&gt;पश्चिम में द्वारिका में कालिका पीठ.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहाँ यह स्पष्ट करना भी प्रासंगिक है कि शंकर और शिव का परस्पर कोई सम्बन्ध नहीं है जैसा कि सामान्यतः माना जा रहा है. शंकर आचार्य शंकर का मूल नाम है जिन्हें आदिशंकराचार्य भी कहा जता है. जबकि शिव देव समुदाय की एक उपाधि है जो महेश्वर को दी गयी थी. जिन्हें महादेव भी कहा जाता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज यह कहना सरल नहीं है कि आचार्य का मूल मंतव्य क्या था - जन-स्वास्थ को नष्ट करना या उसकी रक्षा करना. किन्तु इसका जो प्रभाव हुआ है वह रिनात्मक ही रहा है और सनातन धर्म का प्रचार प्रसार भी धर्म-आडम्बरों का प्रचार प्रसार ही सिद्ध हुआ है. यह आचार्य के साथ यवनों का छल भी हो सकता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वेदों और शास्त्रों का प्राथमिक लक्ष्य भी स्वास्थ की रक्षा है संभवतः इसी को रेखांकित करने के लिए आचार्य शंकर ने इनका सार वेदान्त के रूप में प्रस्तुत किया और सनातन धर्म के नाम से प्रचारित किया. किन्तु आज तक के किसी भी सनातन धर्म साहित्य को स्वास्थ के समर्पित नहीं कहा गया है और उसे धर्म-आडम्बरों के प्रचार-प्रसार का माध्यम बनाया गया है. यहाँ तक कि बाद में प्रतिपादित हिन्दू धर्म प्रचारकों ने सनातन धर्म को ही हिन्दू धर्म का मूल स्वरुप कहा ताकि वे आचार्य शंकर की प्रतिष्ठा का अनुचित लाभ उठा सकें.&amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सनातन धर्म के प्रभाव का आकलन करने के लिए हम बदरिकाश्रम की स्थिति को देखते हैं, जहां समस्त क्षेत्र में कभी तुलसी के वन फैले थे. यह केदारनाथ मंदिर की चारदीवारी पर अंकित एक तमिल कवि के वर्णन से सिद्ध होता है. बदरिकाश्रम में विष्णु के पूजन आदि में तुलसी की पत्तियों का उपयोग किया जाता रहा है जिसके कारण वहां के सभी तुलसी वन अब उजाड़ चुके हैं. स्थानीय मजदूर अपनी आजीविका के लिए तुलसी के एक इंच के अंकुरों को भी नोंच-नोंच कर पत्तियां प्राप्त करते हैं और उन्हें मंदिर में पूजा-अर्चना के लिए प्रदान कर देते हैं. इससे वहां तुलसी के पौधों का विकास प्रतिबंधित हो रहा है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुलसी एक अति महत्वपूर्ण औषधीय पौधा है जो वातावरण एवं शरीर में उपस्थित अनेक विकारों का शोधन कर जन-स्वास्थ की रक्षा करता है. उत्तर में इसके वनों का विशेष महत्व है क्योंकि वहाँ से सुगन्धित वायु देश के बड़े भूभाग को स्वास्थ्जनक बना सकती है. पूजा-अर्चना में तुलसी के उपयोग के अनुत्पादक उपयोग से वहां इसके वनों को नष्ट किया गया है जो किसी भी मानवीय धर्म में मान्य नहीं हो सकता. इसमें आचार्य शंकर का सीधा योगदान है अथवा यवन समूह द्वारा उनको गलत ढंग से प्रस्तुत किया गया है, यह शोध का विषय है. .&amp;nbsp;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4702532971528007953-5886721476595051713?l=bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/feeds/5886721476595051713/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/02/blog-post_13.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/5886721476595051713'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/5886721476595051713'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/02/blog-post_13.html' title='आचार्य शंकर और सनातन धर्म'/><author><name>राम बंसल/Ram Bansal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10182040999161020512</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/Sy4At1JB9aI/AAAAAAAAAAU/fJMHsDrudkE/S220/Ram30.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/S3XwwfwnzsI/AAAAAAAAADM/F-E3qr8CaNY/s72-c/shankar.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4702532971528007953.post-7192155671845577808</id><published>2010-02-06T16:10:00.001+05:30</published><updated>2010-02-07T01:55:24.967+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अहिल्या'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गौतम'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सिद्धार्थ'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बुद्ध'/><title type='text'>दो बुद्धों की कथा</title><content type='html'>&amp;nbsp;देव-यवन संघर्ष के समय कुछ अन्य लोग भी देवों के विरुद्ध यवनों के साथ मिल गए जिनमें एक सिद्धार्थ भी था जो एक प्रतिष्ठित देव शुद्धोधन का पुत्र था. उस समय देवों की परंपरा में बुद्ध एक उपाधि थी जो शीर्ष न्यायाधिपति को दी जाती थी. इस परंपरा में प्रथम बुद्ध शाक्य सिंह थे. उनके बाद यह पड ऋषि गौतम को दिया गया. संघर्ष के समय गौतम ही वास्तविक बुद्ध थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गौतम की पत्नी अहिल्या अप्रतिम रूपवती थी जिसे गौतम की पत्नी होने के कारण गौतमी भी कहा जाता था. उस पर सिद्धार्थ की कुदृष्टि पड गयी. एक बार जब ऋषि गौतम घर से बाहर गए हुए थे उस समय सिद्धार्थ गौतम का वेश धारण कर अहिल्या के पास पहुंचा और उसे भ्रमित कर उसके साथ सम्भोग किया. इससे अहिल्या गर्भवती हो गयी. बाद में जब अहिल्या को इसका ज्ञान हुआ तो वह सदमे में जडवत हो गयी. ब्रह्मा के समझाने-बुझाने और उसे निर्दोष माना जाने पर ही वह सामान्य अवस्था में आयी.&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://tattoo4u.co.uk/wp-content/uploads/free_tattoo_picture_buddha_1.gif" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://tattoo4u.co.uk/wp-content/uploads/free_tattoo_picture_buddha_1.gif" width="240" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;अपने पुत्र के इस अपराध के लिए शुद्धोधन ने सिद्धार्थ को अपने नगर से निष्कासित कर दिया.और वह कृष्ण की शरण में चला गया. कृष्ण ने उसे अब श्रीलंका कहे जाने वाले द्वीप पर बसा दिया जो उस समय निर्जन था और कृष्ण के अधिकार क्षेत्र में था. श्रीलंका का अब ज्ञात इतिहास भी इसी प्रकार कहता है कि यह द्वीप भारत से निष्कासित एक राजकुमार द्वारा बसाया गया था. यहाँ बसने के बाद उसने साधना करने का छल किया और बोधगया में साधना पर कुछ समय बैठने के बाद स्वयं को बुद्ध घोषित कर दिया. उसने अपने बारे में वैसी ही उदघोषणाएँ&amp;nbsp; कीं जैसी कि कृष्ण अपने बारे में किया करता था. इसी सिद्धार्थ ने बाद में बोद्ध धर्म का प्रतिपादन किया जिसमें लाखों युवक बोद्ध भिक्षु बनकर बिना परिश्रम किये वैभव भोगने लगे थे और देश में अकर्मण्यता का रोग लग लग गया था.&amp;nbsp; &amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बोद्ध धर्म का प्रमुख ग्रन्थ तिपिटक है जिसमें सिद्धार्थ को बुद्ध न कहकर सम्बुद्ध - बुद्ध के समान - कहा गया है. इसी ग्रन्थ के अम्बत्थ सुत्त में कहा गया है -&lt;br /&gt;&lt;b&gt;यदि वा सो भवं गोतमो तादिसो, यदि वा न तादिसो&lt;/b&gt;.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो तत्कालीन विद्वानों की मनोस्थिति के बारे में है और जिसका अर्थ - 'क्या वह गौतम जैसा ही हैं, या वैसा नहीं हैं'. इसी प्रकार के अनेक उद्धरणों से स्पष्ट है कि सिद्धार्थ गौतम नहीं था किन्तु गौतम जैसा ही था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बारे में यह भी ध्यातव्य है कि ऐसा कहा जाता है कि सिद्धार्थ ने गृहत्याग रोगों, वृद्धावस्था और मृत्यु के दुखों से दुखी होने के कारण किया था और वह इन दुखों से मुक्ति मार्ग खोजने घर से निकला था. इसके बाद उसने स्वयं को बोधिसत्व घोषित किया जिसका तात्पर्य होता है कि उसे उक्त दुखों से मुक्ति का मार्ग मिल गया था. किन्तु इस पर भी उसने इन दुखों से मुक्ति का कोई मार्ग नहीं दिखाया और ये दुःख उसी प्रकार आज तक बने हुए हैं जैसे कि पहले थे. इससे सिद्ध यही होता है कि सिद्धार्थ का बोधिसत्व होना केवल एक आडम्बर था.&amp;nbsp;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4702532971528007953-7192155671845577808?l=bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/feeds/7192155671845577808/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/02/blog-post_06.html#comment-form' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/7192155671845577808'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/7192155671845577808'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/02/blog-post_06.html' title='दो बुद्धों की कथा'/><author><name>राम बंसल/Ram Bansal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10182040999161020512</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/Sy4At1JB9aI/AAAAAAAAAAU/fJMHsDrudkE/S220/Ram30.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4702532971528007953.post-1512298401998968432</id><published>2010-02-03T08:55:00.002+05:30</published><updated>2010-02-06T15:28:55.585+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कंस का वध'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कृष्ण की महत्वाकांक्षा'/><title type='text'>कृष्ण का लक्ष्य और चरित</title><content type='html'>कृष्ण के जीवन का एक मात्र लक्ष्य भारत भूमि को अपने अधिकार में लेना था क्योंकि यहाँ विशाल समतल भूमि क्षेत्र था, पूरे क्षेत्र में प्राकृत जलधाराएँ थीं, भूमि उपजाऊ थी और खनिजों से संपन्न थी. इनके अतिरिक्त यहाँ के लोग सीधे सादे सरल स्वभाव के थे जिनपर सरलता से शासन किया जा सकता था. देवों ने यहाँ पर्याप्त विकास कार्य कर दिए थे जिससे शोषण के लिए पर्याप्त स्रोत उपलब्ध हो गए थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत में कृष्ण का जन्म यवन शक्ति के प्रतीक के रूप में कराया गया था. मूलतः एक छोटे से क्षेत्र आयोनिया (Ionia ) के लोगों को यवन कहा जाता था जो दूर दूर तक जा बसे थे और अपनी जाती का विस्तार कर रहे थे. प्लेटो भी इसी जाती का था जो ग्रीस के नगर राज्य अथेन्स में जा बसा था और भारत के विरुद्ध षड्यंत्र का रचयिता था. इसी ने एक यवन भ्रूण को बैंगनी रंग कर भारत में कृष्ण का जन्म प्रबंधित किया था जिससे कृष्ण बैंगनी रंग का एक मात्र व्यक्ति था. लैटिन भाषा में ion  शब्द का अर्थ बैंगनी रंग है, इसीलिये कृष्ण का रंग बैंगनी रखा गया ताकि वह यवन शक्ति का परिचायक रहे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अधिकार करने की इस महत्वाकांक्षी योजना में केवल एक बाधा थी - लोकप्रिय राम, परम बुद्धिमान विष्णु, परम बलशाली महेश्वर और कंस, जरासंध, कीचक आदि योद्धाओं की उपस्थिति. इसलिए कृष्ण के लिए यह आवश्यक हो गया कि वह येन केन प्रकारेण इनका सफाया करे अथवा करवाए.&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://www.krisnaworld.com/Images/Visit.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://www.krisnaworld.com/Images/Visit.jpg" width="299" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;कृष्ण ने उस समय तक स्वयं को दिव्य सिद्ध करने में कोई कसर नहीं रख छोडी थी किन्तु वह ब्रह्मा (राम) की तरह लोकप्रिय नहीं हो पाया था. कृष्ण निरक्षर था और उसकी शिक्षा-दीक्षा छल-कपटों तक सीमित थी, इसलिए वह विष्णु (लक्ष्मण) की बुद्धिमत्ता का सामना करने में भी असक्षम था. स्वयं को दिव्य सिद्ध बनाये रखने के किये वह स्वयं किसी से भी सीधे टकराव से बचता था अन्यथा पराजय उसकी दिव्यता की पोल खोल देती. इस कारण से वह स्वयं किसी युद्ध अथवा द्वन्द में भाग लेने से कतराता था जिससे वह स्वभावतः कायर बन गया था. इसलिए बलशाली और योद्धा देवों से भयभीत हो वह बचता ही रहता था, विशेषकर महेश्वर (भरत) से तो वह भयभीत ही रहता था. किन्तु उसकी महत्वाकांक्षा की आपूर्ति के लिए उसे ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर, कंस, कीचक, जरासंध आदि देवों को अपने मार्ग से हटाना अनिवार्य था. उस समय मदुरै में कंस का शासन था और वहीं कृष्ण के यदुवंश का बाहुल्य था, इसलिए उसने सबसे पहले मदुरै पर अधिकार की योजना बनाई. श्रीमदभगवद-गीता की प्रस्तावना में कंस के वध का उल्लेख इस प्रकार है -&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;i&gt;वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम.&amp;nbsp;&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;अर्थात - वसुदेव के रक्षक देव कंस के दोनों आणों (अन्डकोशों) को मसल दिया गया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके बाद दक्षिण भारत पर कृष्ण का अधिकार हो गया और यही उसकी गतिविधियों का केंद्र बना. किन्तु वह उत्तरी क्षेत्र में आकर देव योद्धाओं से टकराने का साहस न कर सका. &amp;nbsp; &amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस कार्य के लिए उसने पांडवों को भारत बुलाया जो कुंती के साथ जंगल-जंगल भटक रहे थे. तीनों पांडव सरल स्वाभाव के तथा बहुत कुछ बुद्धिहीन थे. कृष्ण ने उन्हें भारत के शासन में भागे देने का वचन दिया और वे कृष्ण के छल में आगये. पांडवों में भीम सर्वाधिक बलशाली था इसलिए उसने भीम को ही देव योद्धाओं से एक-एक करके युक्तिपूर्वक भिड़ाया. भीम का बल और कृष्ण का छल अधिकांश देवों को पराजित करने में सफल रहे. इन वधों तथा हत्याओं से देवों की शक्ति क्षीण होने लगी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देवों की इस दुर्बलता का पूरा लाभ उठाने के लिए उसने महाभारत युद्ध की योजना बनायी जो तत्कालीन विश्व के सभी योद्धाओं की हत्या की योजना थी. इस युद्ध के लिए उसने सिकंदर को भारत पर आक्रमण के लिए आमंत्रित किया और पांडवों को राज्य में हिस्सा देने को कारण बनाया. उसके तर्क रखा कि कुंती का विवाह महेश्वर से हुआ था इसलिए उसके पुत्र पांडव महेश्वर के पुत्र हुए, जब कि वे कुंती के अवैध संबंधों से उत्पन्न संतानें थीं. .&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;input id="gwProxy" type="hidden" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;input id="gwProxy" type="hidden" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;input id="gwProxy" type="hidden" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;input id="gwProxy" type="hidden" /&gt;&lt;input id="jsProxy" onclick="jsCall();" type="hidden" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div id="refHTML"&gt;&lt;/div&gt;&lt;input id="gwProxy" type="hidden" /&gt;&lt;input id="jsProxy" onclick="jsCall();" type="hidden" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div id="refHTML"&gt;&lt;/div&gt;&lt;input id="gwProxy" type="hidden" /&gt;&lt;input id="jsProxy" onclick="jsCall();" type="hidden" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div id="refHTML"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4702532971528007953-1512298401998968432?l=bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/feeds/1512298401998968432/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/02/blog-post.html#comment-form' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/1512298401998968432'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/1512298401998968432'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/02/blog-post.html' title='कृष्ण का लक्ष्य और चरित'/><author><name>राम बंसल/Ram Bansal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10182040999161020512</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/Sy4At1JB9aI/AAAAAAAAAAU/fJMHsDrudkE/S220/Ram30.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4702532971528007953.post-778787711111917798</id><published>2010-01-23T09:30:00.001+05:30</published><updated>2010-02-06T16:15:44.462+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कृष्ण'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='समलैंगिक मैथुन'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='वध क्रिया'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सुदर्शन चक्र'/><title type='text'>कृष्ण की शिक्षा-दीक्षा</title><content type='html'>प्रचलित जानकारी के अनुसार कृष्ण की शिक्षा-दीक्षा संदीपनी नामक आश्रम में हुई, किन्तु यह कहीं उल्लेख नहीं मिलता कि यह कब हुई क्योंकि वह तो ज्ञात कथाओं में सभी समय खेलकूद और षड्यंत्रों में लिप्त रहता हुआ पाया जाता है. उसके गुरुजनों के नामों के बारे में भी कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है. इस विषय में जो जानकारी मुझे उपलब्ध हुई है वह इस प्रकार है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कृष्ण के बालपन के समय ही विशेषज्ञों का एक दल प्लेटो की अकादेमी से आकर आज श्रीलंका कहे जाने वाले द्वीप पर ठहरा जो उस समय निर्जन था. यही स्थान कृष्ण की शिक्षा-दीक्षा का संदीपनी आश्रम था. यह दल कृष्ण को बचपन से ही छल-कपट के तौर-तरीके सिखाता था जिससे कि वह अत्यधिक कुशल छलिया बन सके. इसी कारण से अनेक स्थानों पर कृष्ण को छलिया कहा गया है. कृष्ण का सबसे शक्तिशाली शास्त्र उसका सुदर्शन चक्र था जो उसके सीधे हाथ की तर्ज़नी उंगली में बंधा एक चाकू था. चाकू शब्द चक्र का ही सरल रूप है.&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/S21IR4GZQDI/AAAAAAAAAC8/m9mHHuepq0A/s1600-h/krish-gopi.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://4.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/S21IR4GZQDI/AAAAAAAAAC8/m9mHHuepq0A/s320/krish-gopi.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;इस चाकू के उपयोग से कृष्ण अपने मित्र और शत्रुओं के अंडकोष काट दिया करता था. शास्त्रों में इस क्रिया को 'वध' कहा गया है तथा जिसका भ्रमित हिंदी अर्थ हत्या लिया जाता है. इसका संकेत इस तथ्य से भी मिलता है कि लोकभाषा में पशुओं के अंडकोष काटकर उन्हें नपुंसक बनाने के लिए 'वधिया करना' कहा जाता है. महाभारत में 'वध' शब्द का उपयोग प्रायः उन्ही प्रसंगों में है जो कृष्ण से सम्बंधित हैं. &lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;कृष्ण ने अपने यदु वंश के अपने सभी मित्रों को इस क्रिया से नपुंसक बना दिया था ताकि उनकी कामुक पत्नियाँ विवश होकर कृष्ण की प्रेयसी अथवा दीवानी बन कर रहें.जिन्हें गोपियाँ कहा जाता है. राधा के साथ किया गया उसका प्रेम तथा बाद में परित्याग का छल भी इसी के अंतर्गत किया गया. भारतीय जन-मन में इस छल को प्रेम के रूप में ठूंसा गया है तथा कृष्ण-भक्ति में अंधे व्यक्ति इस की प्रशंसा करते हैं तथापि अपनी पुत्रियों अथवा बहुओं को ऐसा प्रेम करने से दूर रखते हैं. संस्कृत के एक बहु-प्रतिष्ठित ग्रन्थ 'गीत गोविन्द' में राधा-कृष्ण प्रेम को महिमा मंडित किया गया है जिसमें कृष्ण मिलन के समय राधा की जंघाओं की कामुक हलचल भी वर्णित की गयी है. विश्व की किसी अन्य संस्कृति में पर-स्त्री गमन को इस प्रकार महिमा-मंडित नहीं किया गया.&amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसने अपने शत्रुओं के वध किये अथवा इसका प्रयास किया ताकि वे अपना शेष जीवन दुखों में व्यतीत करने को विवश हों. इस प्रकार कृष्ण बचपन से ही एक निष्ठुर 'पर-संतापी' (saddist ) के रूप में प्रशिक्षित किया गया और उसका यह प्रशिक्षण पूरी तरह सफल सिद्ध हुआ.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वध करने की प्रक्रिया के अतिरिक्त भी कृष्ण को सभी प्रकार के शारीरिक तथा मानसिक छल करने के लिए प्रशिक्षित किया गया जो उसके जीवन चरित में सर्वत्र स्पष्ट दिखाई देते हैं. इन छलों में स्वयं को बार बार दिव्य घोषित करना भी था जो वह प्रायः किया करता था. इसके विपरीत भारत में प्रचलित अन्य किसी दिव्य विभूति, जैसे राम, ने कभी स्वयं को दिय घोषित नहीं किया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कृष्ण का एक परम मित्र सुदामा कहा जाता है जो उसका गुणवाचक नाम है. सुदामा शब्द लैटिन के शब्द 'sodoma से उद्भव हुआ है जिसका अर्थ 'समलैंगिक मैथुन'' है जो बाइबिल में उल्लिखित एक नगर सोडोम के नागरिकों में प्रचलित थी. बाइबिल के अनुसार यह नगर लोगों के इसी दोष के कारण नष्ट हो गया. इससे यह भी स्पष्ट है कि कृष्ण भी समलैंगिक मैथुन का अभ्यस्त था.&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; .&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;input id="gwProxy" type="hidden" /&gt;&lt;input id="jsProxy" onclick="jsCall();" type="hidden" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div id="refHTML"&gt;&lt;/div&gt;&lt;input id="gwProxy" type="hidden" /&gt;&lt;input id="jsProxy" onclick="jsCall();" type="hidden" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div id="refHTML"&gt;&lt;/div&gt;&lt;input id="gwProxy" type="hidden" /&gt;&lt;input id="jsProxy" onclick="jsCall();" type="hidden" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div id="refHTML"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4702532971528007953-778787711111917798?l=bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/feeds/778787711111917798/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/01/blog-post_23.html#comment-form' title='7 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/778787711111917798'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/778787711111917798'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/01/blog-post_23.html' title='कृष्ण की शिक्षा-दीक्षा'/><author><name>राम बंसल/Ram Bansal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10182040999161020512</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/Sy4At1JB9aI/AAAAAAAAAAU/fJMHsDrudkE/S220/Ram30.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/S21IR4GZQDI/AAAAAAAAAC8/m9mHHuepq0A/s72-c/krish-gopi.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4702532971528007953.post-4666739629526883508</id><published>2010-01-18T16:04:00.001+05:30</published><updated>2010-02-06T16:52:09.310+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्राह्मण'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ग्रीक'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लैटिन'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भारत'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='वैश्य'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='क्षत्रिय'/><title type='text'>वर्ण व्यवस्था के बारे में आशंकाएं और उत्तर</title><content type='html'>इस संलेख के सम्मानित पाठकों ने अंतिम आलेख 'वर्ण व्यवस्था की सच्चाई' पर कुछ संशयात्मक टिप्पणीयाँ की हैं जिनके विस्तृत उत्तर देना आवश्यक है ताकि भारत की ऐतिहासिक सच्चाईयों का निरूपण सरल, सहज और कारगर हो सके. यह टिप्पणी इस प्रकार है - &amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"आपने बात-बात पर लैटिन, हिब्रू शब्दों का प्रयोग करके इतिहास को अपने हिसाब से समझने/समझाने की वैसी ही कोशिश की है जैसा अंग्रेजों ने 'आर्य' शब्द का निकालकर भारत के इतिहास को कलुषित करने के लिये किया था (जो अब पूर्णत: झूठ साबित हो चुका है)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"मेरे मन में भी कुछ प्रश्न  हैं जो आप द्वारा उठाये गये प्रश्नों से कम महत्वपूर्ण नहीं हैं-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;१) क्या वर्ण-व्यवस्था  अपने 'पूर्ण रूप' में कभी लागू हो पायी थी?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;२) वर्ण व्य्वस्था किसी आधुनिक नियम की भाँति किसी एक दिन लागू कर दी गयी या यह कई शताब्दियों तक धीरे-धीरे और बहुत ही धुंधले रूप में प्रकट हुई?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;३) यदि यह किसी धर्माचार्य या राजा द्वारा प्रचलित की गयी तो किसको ब्राह्मण, किसको क्षत्रिय आदि माना गया? क्या ऐसा करना व्यावहारिक लगता है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;४) यदि यह शनै:-शनै: क्रमिक विकास (इवोलूशन) जैसा हुआ तो लोगों को इसमें आपत्ति क्या है? यह तो प्राकृतिक है।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;मेरे स्पष्टीकरण &lt;/b&gt;:&lt;br /&gt;भाषा प्रसंग&lt;br /&gt;भारत की सभी भाषाएँ यूरोपीय भाषा परिवार की सदस्य हैं और इस परिवार की सभी बाषाओं के उद्भव परस्पर सम्बंधित हैं जैसा कि अन्य भाषा परिवारों में है. इस प्रकार लैटिन, ग्रीक, हेब्रू आदि भाषाएँ हमारी प्राचीन भाषाओं को समझाने में सहायक हैं. इसके अतिरिक्त ये भाषाएँ विश्व की प्राचीनतम विकसित भाषाएँ हैं जिनसे इस परिवार की सभी भाषाएँ विकसित हुई हैं. इनका आश्रय लेना हमारे लिए इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि हमारे वेदों और शास्त्रों की भाषा आधुनिक संस्कृत से एकदम भिन्न है और उस भाषा के बारे में हमेंबहुत अधिक ज्ञान नहीं है. वेदों और शास्त्रों के अब तक प्रचलित सभी अनुवाद आधुनिक संस्कृत के आधारित हैं और वे हमें इतिहास का कुछ ज्ञान कारन के स्थान पर भ्रम और संशयों को जन्म देते रहे हैं. इस कारण से सभी अनुवादों में भी परस्पर भारी भिन्नता पाई जाती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्री अरविन्द द्वारा रचित पुस्तक के हिंदी अनुवाद 'वेद रहस्य' को पढ़ने से मुझे ज्ञात हुआ कि वेदों और शास्त्रों में उपयुक्त शब्दावली लैटिन और ग्रीक शब्दावली से बहुत अधिक मेल खाती है. इससे मेरा निष्कर्ष यह है कि इन ग्रंथों की शब्दावली लैटिन, ग्रीक आदि की देवानागारीकृत शब्दावली ही है&amp;nbsp; इसकी पुष्टि तब हुई जब मैंने अनेक अंशों के अनुवाद इस शब्दावली के आधार पर किये.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विदेशी भाषाओं के आश्रय का तीसरा कारण यह है कि भारत पर अनेक आक्रमण हुए है, अनेक जातियां यहाँ आकर बसी हैं, और इस देश को लम्बे समय तक गुलाम बनाकर रखा गया है. इन कारणों से यहाँ की संस्कृति, ग्रंथों के अनुवाद्फ़ आदि अशुद्ध किये जाने की संभावना बहुत अधिक है, जो वेदों, शास्त्रों के हिंदी अनुवादों से स्पष्ट भी है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन सभी कारणों से प्राचीन ग्रंथों के नए सिरे से अनुवाद करने की अतीव आवश्यकता है यदि हम अपना वास्तविक इतिहास जानना चाहें. इस संलेख के माध्यम से भारत के वास्तविक इतिहास को जानने का प्रयास किया जा रहा है. यह एक विशाल और जटिल कार्य है, संदेह और संशय होने स्वाभाविक हैं, औउर वास्तविक के उजागर होने के लिए धैर्य की अतीव आवश्यकता है.&amp;nbsp; &amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आर्य विवाद&lt;br /&gt;इस बहु-चर्चित विवाद के बारे में मैं अभी यही कहूँगा कि इसकी सच्चाई अभी सामने आयी ही नहीं है जो इस संलेख में प्रसंग आने पर स्पष्ट रूप से दर्शाई जायेगी. अभी इस बारे में कुछ कहना अप्रासंगिक होगा और विषय-वस्तु को क्रमानुसार आगे बढाने में बाधक होगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वर्ण व्यवस्था&lt;br /&gt;वर्ण व्यवस्था का प्रथम उल्लेख मनुस्मृति में है जो मूलतः मानव जाति के समाजीकरण और समाज में कार्य विभाजन का मार्गदर्शक है. चाणक्य महोदय ने इसी व्यवस्ठ को संक्षेप में एक सूत्र के रूप में प्रस्तुत किया. कोई भी सामाजिक सिद्धांत पूर्ण रूप से लागू होने में समय लगता है. भारत चूंकि अधिकाँश समय गुलाम रहा इसलिए यह संभव है कि यह पूरी तरह कभी लागू हुआ ही न हो. शासक वर्ग में समाज को सदैव अपने हित में ही गठित करता रहा है और भारत भी इसका अपवाद नहीं रहा है. इसलिए भारत के समाज में अत्यधिक विकृतियाँ समाहित होती चली गयीं जिन सबका दायित्व वर्ण व्यवस्था पर थोपा जाता रहा. &lt;br /&gt;वर्ण व्यवस्था का केवल सूत्रीकरण ही किया गया जो एक बार ही हुआ किन्तु यह कभी पूरी तरह लागू न किया जाकर इसके स्थान पर सामजिक विकृतियाँ ही पनपायी गयीं जिनमें से अनेक आज तक प्रचलित हैं.&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://www.shikaradesign.com/upload/product_img/030420062359231.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://www.shikaradesign.com/upload/product_img/030420062359231.jpg" width="222" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य आदि&lt;br /&gt;जैसा कि पहले स्पष्ट किया जा चुका है, ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश्वर तीन भाइयों ने भारत निर्माण कार्य आरम्भ किया और इसके लिए अपने-अपने कार्य क्षेत्र क्रमशः सृजन, अर्थ व्यवस्था, तथा रक्षा क्रमशः निर्धारित किये. इन्हीं तीनों के अनुयायी कृमशः ब्राह्मण, वैश्य और क्षत्रिय कहलाये. यदि यह कार्य विभाजन स्वेच्छा से लागू किया जाता रहता तो इसमें कोई दोष नहीं था, किन्तु स्वार्थी तत्वों ने इसे स्वेच्छाधारित न रखकर इसे जन्म आधारित बना दिया जिससे समाज में विकृतियाँ उत्पन्न हुईं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो समाज गुलाम बनाकर रखे जाते हैं, उनमें कुछ भी प्राकृत रूप में विकसित नहीं होने दिया जाता और शासक वर्ग उनकी जीवन शैली और संस्कृति अपने स्वार्थ पूर्ति हेतु निर्धारित करता है. भारत की सामजिक विक्रितीय यहाँ की लम्बी गुलामी की देनें हैं. &lt;br /&gt;&lt;input id="gwProxy" type="hidden" /&gt;&lt;input id="jsProxy" onclick="jsCall();" type="hidden" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div id="refHTML"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4702532971528007953-4666739629526883508?l=bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/feeds/4666739629526883508/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/01/blog-post_18.html#comment-form' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/4666739629526883508'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/4666739629526883508'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/01/blog-post_18.html' title='वर्ण व्यवस्था के बारे में आशंकाएं और उत्तर'/><author><name>राम बंसल/Ram Bansal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10182040999161020512</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/Sy4At1JB9aI/AAAAAAAAAAU/fJMHsDrudkE/S220/Ram30.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4702532971528007953.post-8494591088943241660</id><published>2010-01-16T04:50:00.003+05:30</published><updated>2010-02-17T09:40:18.904+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्राह्मण'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अर्थशास्त्र'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विष्णुगुप्त चाणक्य'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='वर्ण-धर्म'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='वैश्य'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='शूद्र'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='क्षत्रिय'/><title type='text'>वर्ण व्यवस्था की सच्चाई</title><content type='html'>&amp;nbsp;भारत में समाज को व्यवस्थित करने और कार्य विभाजन के लिए वर्ण व्यवस्था लागू की गयी जिसका आरंभिक विवरण मनुस्मृति में तथा बाद में विष्णु गुप्त चाणक्य द्वारा अपने ग्रन्थ 'अर्थशास्त्र' में प्रकाशित किया गया. चाणक्य महोदय के शब्दों में -&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://img145.imageshack.us/img145/2161/chanakyaquotesoa6.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://img145.imageshack.us/img145/2161/chanakyaquotesoa6.jpg" width="228" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;स्वधर्मो ब्राह्मनस्याध्ययनमध्यापनं यजनं याजनं दानं प्रतिग्रहश्चेती. क्षत्रियस्याध्ययनं यजनं दानं शस्त्राजीवो भूतरक्षणं च. वैश्यस्याध्ययनं यजनं दानं कृषिपाशुपाल्ये वनिज्या च. शूद्रस्य द्विजाति शुश्रूषा वार्ता कारूकुशीलवकर्म च. &lt;/blockquote&gt;इस ग्रन्थ का प्रचलित हिंदी अनुवाद (श्री वाचस्पति गैरोला, चौखम्बा विद्याभवन) इस प्रकार है -&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;ब्राह्मण का धर्म अध्ययन-अध्यापन, यज्ञ-याजन, और दान देना तथा दान लेना है. क्षत्रिय का है पढ़ना, यज्ञ करना, दान देना, शास्त्रों के उपयोग से जीविकोपार्जन करना और प्राणियों की रक्षा करना. वैश्य का धर्म पढ़ना, यज्ञ करना, दान देना, कृषि कार्य एवं पशुपालन और व्यापार करना है. इसी प्रकार शूद्र का अपना धर्म है कि वह ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य की सेवा करे; पशु-पालन तथा व्यापार करे; और शिल्प (कारीगरी), गायन, वादन एवं चारण, भात आदि का कार्य करे.&lt;/blockquote&gt;इस अनुवाद की कपट-पूर्ण विकृतियों पर ध्यान दीजिये-&lt;br /&gt;&lt;ol&gt;&lt;li&gt;मूल पाठ्य में दानं प्रथम तीन वर्णों का धर्म कहा गया है किन्तु हिंदी अनुवाद में केवल ब्राह्मण के लिए इसका अर्थ 'दान देना तथा दान लेना' किया गया है, शेष दो वर्णों के लिए इसका अर्थ केवल दान देना है.&amp;nbsp;&lt;/li&gt;&lt;li&gt;मूल संस्कृत में शूद्र धर्म द्विजाति सुश्रुषा है जबकि हिंदी अनुवाद में इसके लिए तीनों वर्णों की सेवा करना कहा गया है.&lt;/li&gt;&lt;li&gt;खेती, पशुपालन तथा व्यापार उसके लिए हिंदी अर्थों में बिना सन्दर्भ के ठूंसे गए हैं.&amp;nbsp;&lt;/li&gt;&lt;/ol&gt;इनसे स्पष्ट होता है कि अनुवादक मूल मंतव्य के अतिरिक्त अपना मत भी अनुवाद के माध्यम से अनधिकृत रूप से व्यक्त कर रहे हैं जो ब्राह्मणों को दान लेने का अधिकारी तथा शूद्रों को वैश्य धर्म में सम्मिलित करता है. शास्त्रों के साथ आधुनिक ब्राह्मण वादियों ने इसी प्रकार के छल कर उन्हें विकृत करके ही जन-साधारण के समक्ष प्रस्तुत किया है. इस प्रकार के छलों से ही भारत के इतिहास को विकृत किया गया है जिसका संशोधन किया जाना आवश्यक है. आइये हम इस विषय पर तर्कपूर्ण दृष्टिकोण से विचार करते हुए उक्त वर्ण व्यवस्था का सही अनुवाद करें.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सबसे पहले ब्राह्मण के बारे में - ब्रह्मा रचनाकार थे और उनके अनुयायी ब्राह्मण कहलाये जो रचनाकार ही थे. हिंदी शब्दावली के अनुसार अध्ययन और अध्यापन का अर्थ पढ़ना पढ़ाना है जो रचनात्मक कार्य नहीं हैं तो ये ब्राह्मण धर्म कैसे हो सकते हैं. इसी प्रकार दान देना तथा लेना किसी प्रकार भी रचनात्मक कार्य नहीं कहे जा सकते और ब्राह्मण धर्म नहीं हो सकते. यज्ञ का वर्तमान प्रचलित अर्थ अग्नि में घी एवं अन्य सामग्री जलाना लिया जाता है. ऐसा करने से यदि वातावरण शुद्ध होता है तो श्होद्र ही इससे वंचित क्यों किये गए हैं जबकि उन्हें तो वातावरण शुद्धि की सर्वाधिक आवशकता रहती है. इस सबसे यही प्रतीत होता है कि चाणक्य महोदय के शब्दों को समझाने के कोई प्रयास न किये जाकर अनुवादक ने अपने मत थोपे हैं. आइये, सही अनुवाद पाने के प्रयास करें. किन्तु पहले कुछ शब्दों की व्याख्या करें.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;अध्ययन-अध्यापन&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;लैटिन भाषा का शब्द है aedis जिसका समतुल्य हिंदी शब्द 'भवन' हैं. लैटिन भाषा शब्दों में अंत के भागों -is, -us  तथा ग्रीक भाषा के -os  का उच्चारण नहीं होता. भवन बनाना उच्च कोटि का रचनात्मक कार्य है अतः यह ब्राह्मण का निर्धारित दर्म हो सकता है. इससे स्पष्ट होता है कि शास्त्रीय शब्द 'अध्य' का अर्थ 'भवन' है, जिसके आधार पर अध्ययन-अध्यापन का अर्थ 'भवनों में रहना और उनका निर्माण करना' होता है.&amp;nbsp; यहाँ यह स्पष्ट कर दें कि उस समय बहुत अल्प जन समुदाय ही भवनों में रहते थे, अधिकाँश जन-समुदाय जंगलों में भ्रमणकारी जीवन व्यतीत करते थे. इस दृष्टि से भवनों में रहने का विशेष उल्लेख किया गया है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;यजन-याजन&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;दक्षिण भारतीय परम्परा में आज भी हिंदी के 'ज्ञ' को 'ज्न' उच्चारित किया जाता है, अतः यजन-याजन का हिंदी रूपांतर 'यज्ञ-याज्ञ' है. यज्ञ के बारे में बहुत भारी भ्रान्ति प्रचलित है. यज्ञ शब्द 'योग' से बना है जो जिसका अर्थ मिश्रित करना अथवा एक साथ मिलाना होता है. प्राचीन काल में अंग्रेजी भाषा का एक शब्द 'yogh था जो दो अक्षरों के योग के लिए उपयोग में लिया जाता था जो योग के उपर्युक्त अर्थ को पुष्ट करता है.&lt;br /&gt;व्यक्तियों का समाज बनने के लिए बस्तियों - ग्राम और नगर - का बनाना आवश्यक होता है. उस समय समाज बनाना मानवता&amp;nbsp; विकास के लिए महत्वपूर्ण था जो केवल सभ्य जन-समुदाय ही करते थे. इस आधार पर यज्ञ-याज्ञ का अर्थ 'समाज में रहना तथा समाज बनाना' अर्थात 'बस्ती में रहना तथा बस्ती बनाना' सिद्ध होता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;दान&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;आधुनिक तथाकथित ब्राह्मणों ने अपने स्वार्थ सिद्ध करने के लिए दान शब्द का दुरूपयोग बहुत अधिक किया है. हिंदी भाषा परिवार की भाषा हेब्रू में दान शब्द का अर्थ 'न्याय करना' है.जो एक अति महत्वपूर्ण धर्म होने की संभावना भी रखता है. अतः यही दान शब्द का सही अर्थ है जो ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वश्य वर्णों द्वारा अन्यों के प्रति न्यायपूर्ण व्यवहार किया जाना निर्धारित करता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;प्रतिग्रह&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;लैटिन भाषा के दो शब्द 'granum ' तथा 'graes' हैं जिनके अर्थ क्रमशः 'बीज' तथा 'घास' हैं जो परंपरागत रूप में भोजन के रूप में उपयोग में लिए जाते रहे हैं. अतः प्रतिग्रह का अर्थ 'खाद्यान्न और शाक-भाजी का उपयोग करते हुए भोजन बनाना' सिद्ध होता है, जो लगभग ५० वर्ष पहले तक अनेक ब्राह्मणों का निर्धारित कार्य था. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;शस्त्र&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;शस्त्र शब्द का वही अर्थ है जो हिंदी में 'शब्द' का है. प्राचीन काल में शब्दों के उपयोग से आजीविका चलने वाले लोग राजाओं के आश्रित हुआ करते थे जिन्हें भात कहा जाता था. युद्ध क्षेत्र में सेना उत्साह बढ़ने में उनका विशेष योगदान हुआ करता था.&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;भूत&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;भूत शब्द लैटिन के बोटाने से उद्भूत है जिसका अर्थ पेड़-पौधे है.&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;कृषि&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;वैश्यों का एक धर्म कृषि कहा गया है, किन्तु वैश्य परम्परागत रूप में कभी खेती में लिप्त नहीं रहे और ना ही आज हैं. उनकी जीवनचर्या भी खेती के योग्य नहीं रही है. अतः कृषि शब्द का अर्थ खेती नहीं है. लैटिन भाषा में कृषि के निकटस्थ शब्द cratia  (उच्चारण क्रशिया) तथा crucea  पाए जाते हैं जिनमें से प्रथम का अर्थ 'शासन करना' तथा दूसरे का अर्थ 'क्रोस' है जो उस समय अपराधियों को दंड देने में उपयोग किया जाता था. शासन करना तथा दंड देना सम्बंधित कार्य हैं. चाणक्य महोदय के ग्रन्थ अर्थशास्त्र लिखे जाते समय गुप्त वंश का शासन चन्द्रगुप्त मोर्य के सम्राट बनने से आरम्भ हो चुका था. अतः इस ग्रन्थ में शासन करना वैश्यों का निर्धारित धर्म कहा गया है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;पाशुपाल्य&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;पशुपालन खेती से निकट सम्बन्ध रखता है. इसलिए उपर्युक्त चर्चा के आधार पर पशुपालन भी वैश्यों का धर्म सिद्ध नहीं होता. लैटिन भाषा में passus शब्द का उच्चारण पाशु तथा अर्थ 'यात्रा' है जो वैश्यों के परम्परागत धर्म वाणिज्य से गहन सम्बन्ध रखता है. अतः पाशुपाल्य शब्द का अर्थ 'यात्रा करना' सिद्ध होता है न कि पशुपालन.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;द्विजाति शुश्रूषा&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;प्राचीन काल में सुश्रुत नामक महत्वपूर्ण चिकित्सक रहे हैं जिनके चिकित्सा संबंधी ग्रन्थ आज भी प्रचलित हैं. अतः शुश्रूषा शब्द का अर्थ सेवा न होकर चिकित्सा सिद्ध होता है. इसी आधार पर द्विज शब्द का अर्थ रोगी सिद्ध होता है. रोग की चिकित्सा व्यक्ति को दूसरा जन्म देने के समान होती है क्योंकि उस समय रोग अनेक लोगों की जान ले लेते थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;कारुकुशीलवकर्म&lt;/b&gt;&amp;nbsp; &lt;br /&gt;लैटिन शब्द carruca का अर्थ 'हल' अथवा 'हल चलाना' है जो खेती कार्य का प्रतीक हैं. लैटिन में ही carnis  तथा caro  शब्दों के अर्थ 'मां'स' हैं जिसे चर्म के भाव में भी लिया जाता है. अतः उपरोक्त शब्द समूह में कारू दो भ्हवों में उपयुक्त किया गया है - एक कुशील के साथ तथा दूसरा कर्म के साथ. इस आधार पर पूरे शब्द समूह का अर्थ 'खेती करना तथा चर्म संबंधी कार्य करना' सिद्ध होता है. चर्म कार्य शूद्रों का परम्परागत कार्य रहा है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन सब्द व्याख्याओं के आधार पर चाणक्य महोदय के उक्त सूत्र वर्ण धर्म इस प्रकार निर्धारित करता है -&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;ब्राह्मण का अपना धर्म भवन में रहना तथा भवन बनाना, बस्ती (समाज) में रहना तथा बस्ती बसाना, सभी के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार करना तथा भोजन पकाना है. क्षत्रिय धर्म भवन में रहना, बस्ती में रहना, सभी के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार करना, तथा शब्दों के उपयोग से उत्साह वर्धन कर जीविकोपार्जन करना तथा पेड़-पौधों की रक्षा करना है. वैश्य धर्म भवन में रहना, बस्ती में रहना, सभी के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार करना, शासन करना, यात्राएं करना तथा व्यापार करना है. शूद्र धर्म रोगियों की चिकित्सा करना, सन्देश वाहक के रूप में कार्य करना, खेती करना तथा चमड़े का कार्य करना है.&amp;nbsp; &lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस आलेख के अंत में 'ब्राह्मण' का परिचय भी प्रासंगिक है. उक्त वर्ण धर्म निर्धारण यह सिद्ध करता है ब्राह्मण धर्म मुख्यतः भोजन, भवन और बस्तियों का निर्माण करना है जो सभी रचनात्मक कार्य हैं और ब्रह्मा की रचनात्मकता से सम्बन्ध रखते हैं. आधुनिक युग में जो समुदाय स्वयं को ब्राह्मण कह रहे हैं, उन्होंने भोजन पकाने के अतिरिक्त कोई अन्य निर्धारित कार्य कभी नहीं किया है. अतः ये ब्राह्मण कभी नहीं रहे हैं और न आज हैं. ग्रामीण अंचलों में इन्हें वामन कहा जाता है. दूसरी ओर कृष्ण ने छल-कपट के लिए वामन का रूप धारण किया था. यह सिद्ध करता है कि आधुनिक समुदाय जो स्वयं को ब्राह्मण कहते हैं, वस्तुतः वे 'वामन' हैं. &amp;nbsp; . &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;input id="gwProxy" type="hidden" /&gt;&lt;input id="jsProxy" onclick="jsCall();" type="hidden" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div id="refHTML"&gt;&lt;/div&gt;&lt;input id="gwProxy" type="hidden" /&gt;&lt;input id="jsProxy" onclick="jsCall();" type="hidden" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div id="refHTML"&gt;&lt;/div&gt;&lt;input id="gwProxy" type="hidden" /&gt;&lt;input id="jsProxy" onclick="jsCall();" type="hidden" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div id="refHTML"&gt;&lt;/div&gt;&lt;input id="gwProxy" type="hidden" /&gt;&lt;input id="jsProxy" onclick="jsCall();" type="hidden" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div id="refHTML"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4702532971528007953-8494591088943241660?l=bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/feeds/8494591088943241660/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/01/blog-post_16.html#comment-form' title='8 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/8494591088943241660'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/8494591088943241660'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/01/blog-post_16.html' title='वर्ण व्यवस्था की सच्चाई'/><author><name>राम बंसल/Ram Bansal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10182040999161020512</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/Sy4At1JB9aI/AAAAAAAAAAU/fJMHsDrudkE/S220/Ram30.jpg'/></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4702532971528007953.post-9115825471292213208</id><published>2010-01-13T00:08:00.000+05:30</published><updated>2010-01-13T00:08:19.848+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आधुनिक संस्कृत'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='वैदिक संस्कृत'/><title type='text'>ऐतिहासिक सन्दर्भों की क्लिष्टताएं भाग 3</title><content type='html'>शब्दार्थ बदलकर किस तरह शास्त्रों के अर्थ बदले गए हैं, इसके लिए दो उदाहरण दिए जा रहे हैं -&lt;br /&gt;१. एक शब्द है 'तृप्ति' जिसका अर्थ आधुनिक संस्कृत के अनुसार 'संतुष्टि' है. किन्तु वेदों और शास्त्रों में इस शब्द का अभिप्राय एकदम विपरीत है. यह शब्द लैटिन भाषा के शब्द 'turpitude ' का देवनागरी रूप है जिसका अर्थ 'अभाव' है. इस प्रकार वेद और शास्त्रों में आये इस शब्द का अर्थ 'संतुष्टि' लेने से आशय एकदम विपरीत हो जायेगा.&lt;br /&gt;'तृप्ति' शब्द का ही द्रविड़ रूप 'तिरुपति' है जिसे दक्षिण भारत के एक देवता के नाम के लिए उपयोग किया जाता है जिसके दर्शन के लिए लाखों लोग तिरुपति नामक स्थान पर जाते हैं. मेरे एक सहकर्मी आन्ध्र प्रदेश के थे - श्री इ. एन. राव, वे कहा करते थे कि तिरुपति के बारे में एक किंवदंती प्रसिद्द है कि वहां कोई श्रद्धालु चाहे जितना भी धन लेकर जाये, वह वहां से खाली हाथ ही वापिस आता है. सभवतः यह किंवदंती सच न हो, किन्तु इसके प्रसिद्द होने का कुछ तो कारण होगा ही. मेरे विचार में यह किंवदंती तिरुपति शब्द का वास्तविक अर्थ प्रकट करने के लिए कभी प्रचलित की गयी होगी. जब जन-समुदाय भावावेश में सच्चाई से दूर भागता है तो उसे सत्य से परिचित कराने के लिए ऐसे मार्ग अपनाए जाते रहे हैं. इस किंवदंती से भी तिरुपति का अर्थ 'अभाव' सिद्ध होता है.&lt;br /&gt;२. एक शब्द है 'शुभ' जो वेदों, शास्त्रों तथा आधुनिक संस्कृत एवं हिंदी में भी प्रचलित है. आधुनिक संस्कृत एवं हिंदी में इसका अर्थ है 'अच्छा' अथवा 'जिसकी उपस्थिति मात्र लाभकर हो' जबकि ऐसी कोई वस्तु नहीं होती जिसकी उपस्थिति लाभ या हानिकर हो. वस्तु की उपस्थिति का प्रभाव ही लाभकर या हानिकर हो सकता है.&lt;br /&gt;वेदों तथा शास्त्रों में यह शब्द लैटिन भाषा के शब्द 'sophia ' से लिया गया है जिसका व्यापक अर्थ है - भाषा के उपयोग संबंधी कार्य जैसे लेखन, प्रवचन, शिक्षण, अध्ययन, चिंतन, आदि. फिलोसोफी शब्द भी इसी से बना है. अरबी और हिन्दुस्तानी में इसका समतुल्य शब्द सूफी है जिसका अर्थ भी वेदों और शास्त्रों के मूल मंतव्य से मेल खाता है. अतः वेदों एवं शास्त्रों में इसका अर्थ आधुनिक संस्कृत के अनुसार लेने से भाव में विकृति उत्पन्न होना स्वाभाविक है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस प्रकार शब्दार्थ परिवर्तन कर वेदों और शास्त्रों के मंतव्यों को विकृत किया गया है. यहाँ आश्चर्य यह है कि सभी मानते और जानते हैं कि वेदों और शास्त्रों की भाषा आधुनिक संस्कृत से भिन्न है तथापि जब इनके अनुवाद करते हैं तो आधुनिक संस्कृत के आधार पर ही करते हैं. यह या तो बुद्धिहीनता है अथवा जानबूझकर वेदों और शास्त्रों के मंतव्यों में विकृति उत्पन्न करना है. अभी तक मैंने कोई ऐसा अनुवाद नहीं देखा है जो आधुनिक संस्कृत के उपयोग पर आधारित न हो. इसलिए अब तक किये गए सभी अनुवादों को टाक पर रखकर इस कार्य को नए सिरे से की जाने की आवश्यकता है. इस कार्य के लिए मैं एक शब्दकोष भी तैयार कर रहा हूँ जिसमें लगभग ५००० शब्दों के अर्थ संकलित भी किये जा चुके हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन कारणों से इस संलेख में सन्दर्भ देना संभव नहीं है, तथापि कुछ स्थानों पर मूल लिपि को सही ढंग से अनुवाद करके नए अर्थ दर्शाए जायेंगे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;input id="gwProxy" type="hidden" /&gt;&lt;input id="jsProxy" onclick="jsCall();" type="hidden" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div id="refHTML"&gt;&lt;/div&gt;&lt;input id="gwProxy" type="hidden" /&gt;&lt;!--Session data--&gt;&lt;input id="jsProxy" onclick="jsCall();" type="hidden" /&gt;&lt;div id="refHTML"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4702532971528007953-9115825471292213208?l=bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/feeds/9115825471292213208/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/01/3.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/9115825471292213208'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/9115825471292213208'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/01/3.html' title='ऐतिहासिक सन्दर्भों की क्लिष्टताएं भाग 3'/><author><name>राम बंसल/Ram Bansal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10182040999161020512</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/Sy4At1JB9aI/AAAAAAAAAAU/fJMHsDrudkE/S220/Ram30.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4702532971528007953.post-111538780456418862</id><published>2010-01-09T12:11:00.000+05:30</published><updated>2010-01-09T12:11:34.565+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='शास्त्रीय संस्कृत'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='शास्त्र'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='वेद'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आधुनिक संस्कृत'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='वैदिक संस्कृत'/><title type='text'>ऐतिहासिक सन्दर्भों की क्लिष्टताएं - भाग दो</title><content type='html'>इस संलेख में प्रकाशित भारत के इतिहास में सन्दर्भ प्रदान करने की सबसे बड़ी क्लिष्टता यह है कि यह इतिहास किसी ग्रन्थ से यथावत न लिया जाकर अनेक ग्रंथों के मेरे अनुवादों के कणों को संगृहीत करके बनाया गया है जिसमें बौद्धिक तर्कों का भी समावेश है. यदि इतिहास किसी ग्रन्थ में सीधे-सीधे समावेशित होता तो इस सम्बन्ध में अभी तक फ़ैली भ्रांतियां उत्पन्न ही नहीं होतीं और मुझे यह इतिहास नए सिरे से लिखने की आवश्यकता ही नहीं होती. किसी ग्रन्थ में प्राचीन इतिहास को समावेशित करने में जटिलताएं थीं जिनका अवलोकन यहाँ किया जा रहा है.&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://www.indiadivine.org/content_images/1/9/ha-01.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="182" src="http://www.indiadivine.org/content_images/1/9/ha-01.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;भारत राष्ट्र के विकास के बारे में सबसे पहले वेड लिखे गए जो आरम्भ में किसी अन्य लिपि में लिखे गए होंगे किन्तु बाद में इन्हें देवनागरी में लिपिबद्ध किया गया. इनकी शब्दावली लातिन तथा ग्रीक भाषाओं की शब्दावली है क्योंकि उस समय तक ये भाषाएँ ही विकसित हुई थीं. यह भाषा आधुनिक संस्कृत से एकदम भिन्न है और इसके आधार पर वेदों का अनुवाद करना मूर्खतापूर्ण तथा अतार्किक है. इस तथ्य को सभी मानते हैं तथापि सभी अनुवाद आधुनिक संस्कृत के आधार पर ही किये गए&amp;nbsp; है जो वेदों के बारे में भ्रांत धारणाएं उत्पन्न करते हैं.वेदों में पूर्णतः तत्कालीन वैज्ञानिक ज्ञान निहित है किन्तु काल अंतराल के कारण इनके अनुवाद करनी अति क्लिष्ट है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यवनों एवं अन्य जंगली जातियों के भारत में आने और उन के द्वारा देवों द्वारा किये जा रहे विकास कार्यों में धर्म प्रचार के माध्यम से बाधा उत्पन्न किये जाने के अंतर्गत उन्होंने वेदों तथा अन्य ग्रन्थों के गलत अनुवाद प्रसारित करने आरम्भ किये&amp;nbsp; जिनमें धर्म और अध्यात्म प्रचार पर बल दिया गया जो पूरी तरह देवों तथा वेदों के मंतव्य से भिन्न था. इस उद्देश्य से इन जंगली जातियों ने आधुनिक संस्कृत विकसित की जिसमें शब्दार्थ मूल शब्दार्थ से बहुत भिन्न हैं. शास्त्रों के प्रचलित अनुवाद इसी आधुनिक संस्कृत शब्दार्थों पर आधारित होने के कारण दोषपूर्ण हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसी स्थिति में यदि देव उसी प्रकार अन्य ग्रन्थ भी लिखते तो उससे कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता. अतः देवों ने एक नयी लेखन शैली का विकास किया जिसे शास्त्रीय शैली कहा जा सकता है. इस शैली में शब्दावली को इस प्रकार बदला जाता है कि उसमें वास्तविक अर्थ तो छिपा रहे किन्तु प्रतीत अर्थ धर्म एवं अध्यात्मा परक लगे. इस आशय के संकेत प्रत्येक ग्रन्थ के आरम्भ में गूढ़ रूप में दे दिए गए ताकि गंभीर पाठक इस शैली में लिखे ग्रंथों के सही अनुवाद पा सकें. साथ ही अध्यात्मवादी भी इन ग्रंथों से प्रसन्न रहें और इन्हें नष्ट करने के स्थान पर इन्हें सुरक्षित रखें. इस कारण से अधकांश ग्रंथों की मूल भाषा आज तक सुरक्षित है किन्तु उनके उलटे-सीधे अनुवाद प्रचलित हैं जिसके कारण इन ग्रंथों में अतार्किक वर्णन प्रतीत होते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस शास्त्रीय शैली में पुराण लिखे गए जिनमें पुरु वंश एवं इसके प्रमुख व्यक्तियों के इतिहास निहित हैं. किन्तु इस इतिहास को आधुनिक संस्कृत के आधार पर किये गए अनुवादों में प्राप्त नहीं किया जा सकता. इसके कारण इस इतिहास के सीधे सन्दर्भ देना संभव नहीं है. मूल भाषा में सन्दर्भ प्रदान करने से उसके अनुवादों की जटिलता सामने आती है. इसलिए इस इतिहास को कण-कण करके बनाया गया है, शास्त्रीय शैली में सबसे बाद में लिखा गया ग्रन्थ भाव प्रकाश है जिसमें आयुर्वेद के अतिरिक्त इतिहास का भी समावेश है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4702532971528007953-111538780456418862?l=bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/feeds/111538780456418862/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/01/blog-post_09.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/111538780456418862'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/111538780456418862'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/01/blog-post_09.html' title='ऐतिहासिक सन्दर्भों की क्लिष्टताएं - भाग दो'/><author><name>राम बंसल/Ram Bansal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10182040999161020512</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/Sy4At1JB9aI/AAAAAAAAAAU/fJMHsDrudkE/S220/Ram30.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4702532971528007953.post-5804591370055328739</id><published>2010-01-02T06:18:00.000+05:30</published><updated>2010-01-02T06:18:25.691+05:30</updated><title type='text'>एतिहासिक सन्दर्भों की क्लिष्टताएं -  भाग एक</title><content type='html'>विश्व-संजोग पर लिखे जा रहे इस इतिहास के आलेखों पर अनेक विद्वानों ने टिप्पड़ियों द्वारा सन्दर्भ गिये जाने की मांग की है जो सर्वथा उचित है. किसी भी परम्परा को तोड़ने अथवा सुधारने के लिए नयी स्थापनाओं को प्रमाणित किया जाना आवश्यक होता है, जो दो प्रकार से किया जा सकता है - नयी स्थापनाओं के साक्ष्य प्रदान किये जा सकते हैं, अथवा परम्परागत स्थापना की विशंगताओं को प्रकाशित करते हुए उन्हें दोषपूर्ण सिद्धकर नयी निर्दोष एवं तर्कपूर्ण स्थापनाएं दी जा सकती हैं. प्रथम भौतिक, सीधा एवं परम्परागत तरीका है जिसकी अपेक्षा की जाती है. दूसरा&amp;nbsp; बौद्धिक, तिर्यक एवं अपराम्परागत तरीका है जिसे अल्प बौद्धिक जन ही स्वीकार करते हैं. किन्तु प्रथम तरीके में क्लिष्टताएं होने पर दूसरा तरीका अपनाया जा सकता है जो मैं अपना रहा हूँ. अपने पक्ष को पुष्ट करने के लिए मैं सर्वप्रथम प्रचलित इतिहास की उन विशंगताओं को प्रस्तुत करना&amp;nbsp;चाहूंगा जिनके कारण मुझे भारत के प्राचीन इतिहास को नए सिरे लिखना पड़ रहा&amp;nbsp; है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_fij4MaROjgQ/SfKm_Zpb3xI/AAAAAAAACAo/r0WTnoKLKT4/s1600/mahabharat.gif" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://1.bp.blogspot.com/_fij4MaROjgQ/SfKm_Zpb3xI/AAAAAAAACAo/r0WTnoKLKT4/s320/mahabharat.gif" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;महाभारत भारत का प्राचीन इतिहास है, इससे सभी विद्वान् सहमत होंगे. इसके प्रचलित स्वरुप को यदि तार्किक दृष्टि से विश्लेषित किया जाए तो हम पाते हैं कि जो घटनाएं&amp;nbsp;बुद्धि और तर्क दोनों दृष्टियों पर खरी नहीं उतरतीं उन्हें दिव्यता के आवरण में लपेट कर प्रस्तुत किया गया है जिससे कि उनपर बौद्धिक बहस न हो. मेरी दृष्टि में यह इस इतिहास लेखाकारों के एक छल है और हमारे द्वारा इसे स्वीकार किया जाना हमारी बुद्धिहीनता का परिचायक. अतः मेरा विद्वान् जनों से आग्रह है कि वे प्रचलित इतिहास को केवल दिव्यता के बहाने स्वयं-सिद्ध न स्वीकारें और उसे तार्किक दृष्टि से परखें.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस विषय में मेरा प्रमुख मंतव्य कृष्ण के चरित्र से है जिसमें उसके द्वारा १२ वर्ष की अवस्था में महाबली कंस&amp;nbsp; की ह्त्या किया जाना, गोवर्धन पर्वत को सर पर उठाया जाना, ह्त्या हेतु जरासंध के शरीर को चीरा जाना, रक्तबीज की परिकल्पना, अपना विश्व-रूप प्रदर्शित करना, विवाहित राधा को मोह-जाल में फंसाकर उसका यौन-शोषण कर उसे त्यागा जाना तथापि भारतीय परम्परागत एवं संकीर्ण समाज में अविवाहित राधा-कृष्ण युगल को पूजनीय स्वीकार किया जाना, स्वयं को ईश्वर घोषित करते रहना, आदि आदि अनेक ऐसे घटनाक्रम हैं जो केवल दिव्यता के आधार पर स्वीकार किये जा रहे हैं और बुद्धि को परे धकेला जा रहा है. इसके साथ-साथ वे राम को भी दिव्य विभूति स्वीकारते हैं जिनके चरित्र कहीं भी कोई इस प्रकार का दंभ अथवा भोंडा प्रदर्शन नहीं है. इस प्रकार दोनों में व्यासीय अंतराल है और कृष्ण को छलिया सिद्ध करता है जो संज्ञा उसे प्रदान भी की जाती रही है, तथापि उसके सब दोष और छल-कपट उसकी दिव्यता के भय से स्वीकारे जा रहे हैं. इस पर भी कोई भी अनुयायी अपनी पुत्री अथवा अपनी वधु को किसी पर-पुरुष के साथ प्रेमालाप में लिप्त नहीं देखना चाहता जबकि यही समाज आज भी अनेकानेक व्यक्तियों को दिव्य विभूति स्वीकार कर रहा है और उनकी वन्दना की जा रही है. क्या कोई अनुयायी किसी ऐसी दिव्य विभूति को अपनी कन्या अथवा वधु प्रेमालाप हेतु प्रस्तुत करेगा?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब आते हैं हम पांडवों के प्रचलित चरित्र पर - यह सभी स्वीकारते हैं कि वे अज्ञात पिताओंकी संतानें थे किन्तु कुंती की दिव्य शक्तियों के आवरण में उसके व्याभिचार को सहज रूप में स्वीकार लेते हैं. तथापि ऐसे अनुयायी अपनी तुच्छ पारिवारिक संपदा में किसी अवैधसंतान को हिस्सा देना नहीं स्वीकारते. जबकि कौरव-पांडव संग्राम केवल पारिवारिक संपदा का प्रश्न न होकर देश को कुशल शासन प्रदान करने का था. क्या अपने शौक के लिए अपनी वधु को जुए में दांव पर लगाने वाले पांडवों से कुशल शासन व्यवस्था प्रदान करने की अपेक्षा की जा सकती थी? तो फिर दोष दुर्योधन को क्यों दिया जा रहा है? इस के बाद भी कृष्ण के पांडवों को शासन में भागीदारी प्रदान किये जाने&amp;nbsp; के नाम पर महाभारत विजय के बाद पांडवों को वनों में भटकने के लिए प्रेरित किया और उन्हें राज्य में हिस्सा नहीं दिया, जबकि अर्जुन कदापि युद्ध नहीं चाहता था और केवल कृष्ण&amp;nbsp;द्वारा ही उसे विवश किया गया था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब आते हैं हम मर्यादा-पुरुषोत्तम राम पर जो वस्तुतः महाभारत के आरभिक काल के नायक थे और महाभारत की मूल संस्कृत में अनेक स्थानों पर उनका उल्लेख है किन्तु इस ग्रन्थ के हिंदी अनुवादकों ने जहां भी राम शब्द आया है उसे बलराम, परशुराम, आदि शब्दों से विस्थापित कर दिया है. क्या यह एतिहासिक छल नहीं है? मेरा विद्वान् जनों से अनुरोध है कि वे स्वयं महाभारत में राम को पायें और इस छल को समझें. अनुवादकों के छल का स्पष्ट कारण है - वे राजनैतिक कारणों से कृष्ण को स्थापित करने के लिए राम को विलुप्त करने के लिए प्रतिबद्ध थे अन्यथा राम की तुलना में कृष्ण को महान दिव्य विभूति सिद्ध नहीं किया जा सकता था. वस्तुतः महाभारत का आरंभिक काल राम और कृष्ण का संघर्ष था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गंभीर शोध करने वाले सभी भाषाविद एक मत हैं कि रामायण ग्रन्थ महाभारत के बाद लिखा गया, जबकि रामायण काल महाभारत काल से लाखों वर्ष पूर्व का स्वीकार जाता है. रामायण में राम की मृत्यु का कोई उल्लेख नहीं है जिसे विस्फोटक होने के कारण लुप्त किया गया है. संकेत के लिए इतना बता दें कि 'राम' शब्द का एक अर्थ 'बकरा' है, ईद में बकरे की बलि दी जाती है, और किसी निर्दोष व्यक्ति की की ह्त्या के लिए बलि के बकरे की उपमा चिर काल से दी जाती रही है. यह एक अति संवेदनशील और गंभीर प्रश्न है इसलिए इस पर चर्चा फिर कभी विस्तार से की जायेगी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महाभारत काल के बारे में भी भ्रांत धारणाएं प्रचलित हैं. महाभारत में ही गजेन्द्र और हेलिउकस चरित्र उपस्थित हैं. अरबी भाषा में विशेष उल्लेख के लिए 'अल' शब्द का प्रचलन रहा है. इस विषय में विस्तृत शोध करने पर मुझे ज्ञात हुआ कि अल-गजेंदर ही अलगजेंदर अर्थात अलेक्संदर अर्थात सिकंदर है, तथा 'सेलयूकस' नाम 'हेलयूकस' में इसी प्रकार परिवर्तित है जैसे 'सिन्धु' से 'हिन्दू' बना हुआ है. अतः महाभारत काल वही काल है जो सिकंदर के भारत पर आक्रमण का काल है. इसे छिपाने का उद्देश्य केवल यही है कि सिकंदर को भारत पर आक्रमण के लिए कृष्ण द्वारा आमंत्रित किया गया था जो कृष्ण-अनुयायी स्वीकार नहीं करना चाहते. महाभारत स्थल के बारे में मेरी चर्चा कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के इंडोलोजी विभाग के विशेषज्ञों से हुई जिन्होंने कुरुक्षेत्र में युद्ध के संकेत खोजने के लिए व्यापक प्रयास किये हैं और उनके हाथ एक भी प्रमाण नहीं लगा है. कुरुक्षेत्र में ही महाभारत अभिलेखागार के विशेषग्य भी इसी मत के पाए गए. अतः मैंने तत्कालीन सरस्वती नदी के मार्ग और महाभारत स्थल खोजने के लिए पंजाब, हरियाणा&amp;nbsp;और राजस्थान की व्यापक पदयात्राएं कीं और उन्हें पाया जिसका उल्लेख में फिर कभी इसी संलेख में करूंगा. इस सम्बन्ध में यह भी उल्लेखनीय है कि भारत के प्रचलित इतिहास में महाभारत युद्ध का उल्लेख नहीं किया जाता जो एक विश्व-युद्ध था. अयोध्या के पास एक नदी की लगभग ५ किलोमीटर की लम्बाई को सरयू नदी कहा जाता है, शेष भाग के अन्य नाम हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी प्रकार की भ्रान्ति वैदिक काल के बारे में है जिसे लाखों वर्ष पूर्व से लेकर हजारों वर्ष पूर्व का बताया जाता है जबकि ३,००० वर्ष से&amp;nbsp; पूर्व पृथ्वी पर किसी भाषा अथवा मानव सभ्यता के विकसित होने के कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं. भारत में पाए गए सिक्कों के आधार पर भी यहाँ का इतिहास २५०० से अधिक पुराना नहीं पाया जाता. यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि कार्बन पद्यति जो काल निर्धारण के लिए उपयोग की जाती है, अभी तक प्रमाणित नहीं मानी जाती.  आर्यों के बारे में भी इतिहास विशेषग्य अभी तक एकमत नहीं हो पाए हैं. देवों के बारे में भी भारतीय इतिहास में कोई अवधारणा नहीं है जबकि वेदों और शास्त्रों में उनके विस्तृत उल्लेख हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे ही अनेकानेक&amp;nbsp;कारणों से भारत के इतिहास को विश्व स्तर पर भ्रांतियों का पिटारा माना जाता है जो हमारे लिए शर्मनाक है. मेरा निवेदन है कि इतिहास का अध्ययन भावुकता और आस्था को दूर करके ही यथार्थपरक किया जा सकता है.&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4702532971528007953-5804591370055328739?l=bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/feeds/5804591370055328739/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/01/blog-post_02.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/5804591370055328739'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/5804591370055328739'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/01/blog-post_02.html' title='एतिहासिक सन्दर्भों की क्लिष्टताएं -  भाग एक'/><author><name>राम बंसल/Ram Bansal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10182040999161020512</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/Sy4At1JB9aI/AAAAAAAAAAU/fJMHsDrudkE/S220/Ram30.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_fij4MaROjgQ/SfKm_Zpb3xI/AAAAAAAACAo/r0WTnoKLKT4/s72-c/mahabharat.gif' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4702532971528007953.post-1957486926193954035</id><published>2010-01-01T01:20:00.001+05:30</published><updated>2010-01-10T00:33:15.079+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='महाभारत'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कुंती'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='परशुराम'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भरत'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सूर्यावतार'/><title type='text'>महेश्वर का आक्रोश</title><content type='html'>महेश्वर को जब उसके जन्म की कथा बताई गयी तो वे बहुत क्रोधित हुए. भरत एक शक्तिशाली योद्धा होने के साथ-साथ रूप परिवर्तन की कला में भी निपुण थे. उन्होंने अपने जीवन काल में विशेष प्रयोजनों के लिए अलग अलग समयों पर नौ प्रकार के रूप धारण किये थे. उनका सर्वाधिक भयानक रूप परशुराम का था जो उन्होंने अपने जन्म की कथा जानने के बाद धारण किया.इस कथा के कारण सबसे पहले उन्हें अपनी माता के चरित्र पर संदेह हुआ.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परशुराम के रूप में सबसे पहले भरत अपनी माताश्री के पास गए और उनसे उनके चरित्र संबंधी अपने संदेह व्यक्त किये और उन्हें भला-बुरा कहा. माता द्वारा स्पष्टीकरण दिए जाने पर उन्होंने अपनी माता के साथ किये गए छल का बदला लेने की ठानी. सबसे पहले उन्होंने उन सभी कुलों को नष्ट करने का संकल्प किया जो विदेशों से आकर भारत के पश्चिमी क्षेत्र में अपने राज्य स्थापित कर लोगों का शोषण कर रहे थे. इस अभियान में उन्होंने २१ कुलों को नष्ट किया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://www.netglimse.com/images/events/makar_sankranti/surya_kunti.gif" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://www.netglimse.com/images/events/makar_sankranti/surya_kunti.gif" width="312" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;इसके बाद महेश्वर ने उस कुल की कन्या की खोज की जिसके सदस्य ने उनकी माताश्री के साथ विवाहपूर्व छल किया था और उन्हें मिली पृथा नामक एक कन्या. महेश्वर ने तब सूर्यावतार का वेश धारण किया और पृथा को उसी प्रकार छला जिस प्रकार दुष्यंत ने उनकी माता को छला था. परिणामस्वरूप पृथा गर्भवती हो गयी और महेश्वर का आक्रोश शांत हुआ.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पृथा बाल्यकाल के इस यौनाभिचार से अत्यधिक प्रभावित हुई और वह सदैव यौनाभिचार की कामना करने लगी. स्त्री योनि के लिए एक शब्द कुंत है, सदैव अपनी कुंत के बारे में चिंतन करते रहने के कारण पृथा का गुणवाचक नाम कुंती हो गया. कुंती ने अविवाहित अवस्था में ही एक पुत्र को जन्म दिया जिसका उसने लोकलाज के कारण परित्याग कर गंगा नदी में बहा दिया. कुंती का यही पुत्र महाभारत का सुप्रसिद्ध योद्धा और दानवीर कर्ण नाम से विख्यात हुआ.&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4702532971528007953-1957486926193954035?l=bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/feeds/1957486926193954035/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/01/blog-post.html#comment-form' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/1957486926193954035'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/1957486926193954035'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2010/01/blog-post.html' title='महेश्वर का आक्रोश'/><author><name>राम बंसल/Ram Bansal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10182040999161020512</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/Sy4At1JB9aI/AAAAAAAAAAU/fJMHsDrudkE/S220/Ram30.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4702532971528007953.post-6560969717577134702</id><published>2009-12-25T17:49:00.002+05:30</published><updated>2010-01-10T00:30:49.691+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दुष्यंत'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='महेश्वर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भारत'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='शकुंतला'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भरत'/><title type='text'>महेश्वर का जन्म</title><content type='html'>महेश्वर के बड़े होने पर भी राम को युवराज बनाये जाने का कारण उनके जन्म की जटिलता थी जिसका उस समय तक महेश्वर को ज्ञान नहीं था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://images.smashits.com/newspics/241010.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="213" src="http://images.smashits.com/newspics/241010.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;शकुंतला एक अति सुंदर युवती थी और उसके सौन्दर्य कि ख्याति दूर दूर तक फ़ैल रही थी. उधर, भरत के पश्चिमी भू-क्षेत्र पर अनेक बाहरी लोगों ने अपना अधिकार कर वहां के भोले-भले लोगों को अपने अधीन कर लिया था, जिनमें से एक राज्य का राजकुमार दुष्यंत था. दुष्यंत ने भी शकुंतला के बारे में सूना था और उसमें शकुंतला के यौवन भोग की इच्छा जागी. वह सूर्यवातार का वेश धारण कर शकुंतला के पास पहुंचा और उसे अपने मोहजाल में फंसा लिया. दोनों ऊर्जावान युवा थे इसलिए प्रेमालाप में शकुन्तला गर्भवती हो गयी. जब दुष्यंत को इसकी सूचना दी गयी तो उसने शकुंतला को पहचानने से इंकार&amp;nbsp; कर दिया. शकुंतला का जीवन बर्बादी के कगार पर आ पहुंचा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शकुंतला एक देवकुल कि कन्या थी और उसकी लाज तथा जीवन की रक्षा करना देव समाज के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया. अतः गुरुजनों के आग्रह पर उस समय तक युवा और अविवाहित दशरथ ने शकुंतला से विवाह कर लिया. कुछ&amp;nbsp;गोपनीयता के उद्देश्य से शकुंतला का नाम कौशल्या कर दिया गया. इस प्रकार दशरथ कि प्रथम पत्नी कौशल्या बनी. उचित समय आने पर कौशल्या ने एक पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम महेश्वर रखा गया.&amp;nbsp;कौशल्या के ही दूसरे पुत्र का नाम ब्रह्मा रखा गया जो सौम्य स्वभाव के कारण अत्यधिक लोकप्रिय बने. इसके विपरीत महेश्वर अति क्रोधी स्वभाव के थे और अपने शारीरिक&amp;nbsp;बल का भरपूर प्रदर्शन तथा उपयोग करते थे. &amp;nbsp;.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4702532971528007953-6560969717577134702?l=bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/feeds/6560969717577134702/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2009/12/blog-post_25.html#comment-form' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/6560969717577134702'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/6560969717577134702'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2009/12/blog-post_25.html' title='महेश्वर का जन्म'/><author><name>राम बंसल/Ram Bansal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10182040999161020512</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/Sy4At1JB9aI/AAAAAAAAAAU/fJMHsDrudkE/S220/Ram30.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4702532971528007953.post-7079903408965457266</id><published>2009-12-22T12:49:00.002+05:30</published><updated>2009-12-25T18:03:51.925+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लक्ष्मण'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राजगढ़'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='महेश्वर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हैदराबाद'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विष्णुपुर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भरत'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्रह्मा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राम'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विष्णु'/><title type='text'>भारत की प्रथम राज्य व्यवस्था</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: left;"&gt;&amp;nbsp;जब देवों ने भारत भूमि को अपना घर बनाया था उस समय उनकी शासन करने की कोई अभिलाषा नहीं थी. वे बस यही चाहते थे कि यहाँ की समतल एवं उर्वरक भूमि मानवता के विकास के लिए हो क्योंकि इतनी विशाल समतल&amp;nbsp;एवं सजल भूमि उन्हें अन्यत्र नहीं पाई थी. इसलिए उन्होंने बिना कोई राज्य-व्यवस्था स्थापित किये ही विकास कार्य आरम्भ कर दिए.&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;उनके विकास से प्रभावित होकर अनेक जातियों ने इस भूमि पर अपना अधिकार चाह जिसके लिए सबसे पहले यहाँ यहूदी आये और इश्वर, धर्म आदि के नाम पर लोगों को पथ्भ्रिष्ट करने लगे ताकि उनपर शासन करना सरल हो. इसका देवों द्वारा विरोध किये जाने पर संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो गयी, जिससे निपटने के लिए उन्हें अपनी राज्य-व्यवस्था कि अनिवार्यता अनुभव हुई और उन्होंने इसका निर्णय लिया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://www.hyderabadplanet.com/images/Charminar-Hyderabad-Image1.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://www.hyderabadplanet.com/images/Charminar-Hyderabad-Image1.jpg" width="244" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;यहूदियों का प्रथम मुख्यालय दक्षिण भारत के मदुरै में था&amp;nbsp;जिसका सीधा मुकाबला करने के लिए उन्होंने अपनी राज्य व्यवस्था के&amp;nbsp;मुख्यालय के लिए दक्षिण भारत में ही एक नया नगर बसाया और उसे अपने प्रसिद्द विद्वान् अत्री के सम्मान में 'आत्रेयपाद' नाम दिया जिसे आज हैदराबाद कहा जाता है.&amp;nbsp;हैदराबाद की&amp;nbsp;चारमीनार&amp;nbsp;नगर एवं राज्य कि स्थापना के अवसर पर बनायी गयी थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश्वर के पिताश्री दशरथ को राज्याध्यक्ष बनाया गया. यहाँ यह भी ध्यान दिया जाये कि इन तीनों भाइयों को बाद के लिखे झूंठे ग्रन्थ 'वाल्मीकि रामायण' में राम, लक्ष्मण तथा भरत कहा गया है जो इनके गुणात्मक नाम थे. उस समय गुणात्मक नामों का प्रचालन था जो व्यक्तियों के कर्मों के अनुसार निर्धारित किये जाते थे और इनको&amp;nbsp;वास्तविक नामों से अधिक महत्व दिया जाता था ताकि लोग सत्कर्म करने के लिए उत्साहित हों.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राज्य व्यवस्था में ब्रह्मा को युवराज घोषित किया गया जिसपर भरत ने घोर आपत्ति की क्योंकि वे आयु में सबसे बड़े थे और युवराज बनाने के अधिकारी थे. इस आपत्ति के कारण राज्य को तीन भागों में बांटा गया तथा तीनों भाइयों को भागों का&amp;nbsp;उप-राज्याध्यक्ष बनाया गया. तदनुसार ब्रह्मा को पूर्वी क्षेत्र का प्रबंध सौंपा गया और उनका मुख्यालय वर्तमान के म्यांमार क्षेत्र में, जिसका नाम अभी कुछ समय पहले तक ब्रह्मा ही था, प्रजा नामक स्थान में रखा गया जिसके कारण ब्रह्मा को प्रजापति भी कहा जाने लगा..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मध्य क्षेत्र का कार्यभार विष्णु को दिया गया जिसका मुख्यालय वर्तमान के पश्चिमी बंगाल में स्थित विष्णुपुर को बनाया गया. उसी समय बनाये गए महल&amp;nbsp;विष्णुपुर में आज भी विद्यमान हैं. पूर्वी क्षेत्र भरत के अधीन दिया गया जिसका मुख्यालय वर्तमान राजस्थान के राजगढ़ को बनाया गया. राजगढ़ का विशाल किला खँडहर अवस्था में आज भी विद्यमान है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4702532971528007953-7079903408965457266?l=bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/feeds/7079903408965457266/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2009/12/blog-post_22.html#comment-form' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/7079903408965457266'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/7079903408965457266'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2009/12/blog-post_22.html' title='भारत की प्रथम राज्य व्यवस्था'/><author><name>राम बंसल/Ram Bansal</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10182040999161020512</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_OMRMLINaRoA/Sy4At1JB9aI/AAAAAAAAAAU/fJMHsDrudkE/S220/Ram30.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4702532971528007953.post-225202969427907186</id><published>2009-12-21T17:54:00.000+05:30</published><updated>2009-12-21T17:54:25.156+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कांग्रेस की सामंतवादी संस्कृति'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कुंवर सुरेन्द्र पल सिंह का मृत्युभोज'/><title type='text'>कांग्रेस संस्कृति : तब और अब</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: auto;"&gt;&lt;a href="http://www.tribuneindia.com/2003/20030613/ed1.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="210" src="http://www.tribuneindia.com/2003/20030613/ed1.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;भारत के स्वतन्त्रता आन्दोलन के समय कांग्रेस की बागडोर महात्मा गाँधी के हाथ में थी जिन्होंने जनसाधारण को उस समय उपलब्ध वस्त्र केवल एक लंगोटी को अपनी वेशभूषा बनाया. इसके प्रभाव में पूरे देश में गांधीजी के नेतृत्व में स्वतंत्रता के लिए एक जन-आन्दोलन छिड़ गया. जनसाधारण जैसा बनकर रहना उस समय के कांग्रेस नेताओं और पार्टी की संस्कृति थी.&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_UipTUzf-jt0/Sy9nHRe1MoI/AAAAAAAAAVY/cgcvLDZETys/s1600-h/gandhi+team.gif" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://4.bp.blogspot.com/_UipTUzf-jt0/Sy9nHRe1MoI/AAAAAAAAAVY/cgcvLDZETys/s400/gandhi+team.gif" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;स्वतन्त्रता के बाद जवाहर लाल नेहरु के प्रथम प्रधान मंत्री बनाने पर उन्होंने जनसाधारण को तिलांजलि देते हुए उन शाही परिवारों को कांग्रेस में सम्मिलित कर लिया जो ब्रिटिश भारत में देश की&amp;nbsp;स्वतंत्रता के विरोधी और अंग्रेजी शासन के पक्षधर थे. इन परिवारों के लोग स्वतंत्रता संग्राम सैनानियों को बंदी बनवाने में अंग्रेजी शासकों का साथ देते थे. इस प्रकार के लोगों को कांग्रेस में लाकर नेहरु ने कांग्रेस की संस्कृति में आमूल-चूल परिवर्तन आरम्भ कर दिया जिससे शासक और शासितों में वैसा ही अंतराल आने लगा जैसा की ब्रिटिश शासन में था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस अंतराल का प्रत्यक्षीकरण अभी मेरे गाँव के निकट के गाँव ऊंचागांव में हुआ. यहाँ के एक बड़े जमींदार और भारत की स्वतन्त्रता के&amp;nbsp;घोर विरोधी कुंवर सुरेन्द्र पाल सिंह को नेहरु ने सन १९५७ में कांग्रेस में आमंत्रित करके उन्हें संसदीय चुनाव में कांग्रेस का प्रत्याशी बनाया था. इसके बाद वे केंद्रीय सरकार में अनेक बार मंत्री बने किन्तु उन्होंने खेत्र के विकास के लिए कोई प्रयास नहीं किये. इस कारण से यह खेत्र रेलवे आदि की सुख सुविधाओं से अभी तक वंचित है जब की कुंवर सुरेन्द्र पल सिंह एक बार रेल मंत्री भी रहे थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभी हाल में उनकी मृत्यु हुई और २० दिसम्बर को उनके मृत्यु-भोज में सम्मिलित होने के लिए लगभग १०,००० लोगों को आमंत्रित किया गया. इसकी व्यवस्था कुंवर साहेब के पुत्र ने की जो आज कांग्रेस के प्रदेश स्तरीय नेता हैं. आमंत्रित लोग दो प्रकार के थे - वर्त्तमान शासक तथा शासित. जहाँ शासक वर्ग के लोगों की सुख-सुविधाओं का विशेष ध्यान रखा गया वहीं शासित वर्ग को भोजन पाने की भी समुचित व्यवस्था नहीं की गयी. शासक वर्ग के भोजन पान के&amp;nbsp;लिए महल में विशेष व्यवस्था की गयी तथा उनकी कारें किले के अन्दर विशेष भोज-स्थल तक ले जाई गईं ताकि वे जनसाधारण के कोलाहल से किसी प्रकार का&amp;nbsp;व्यवधान अनुभव न करें.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरी ओर लगभग १०,०००&amp;nbsp;जनसाधारण लोगों के लिए एक पंडाल में भोजन पाने की खुली&amp;nbsp;व्यवस्था की गयी जिसका आकार इतना ही था जैसा की&amp;nbsp;शादी-विवाहों में ५०० लोगों के भोजन के लिए होता है. परिणामस्वरुप भूखे लोगों में भोजन पाने के लिए कड़ा संघर्ष होता रहा जिसमें अनेक लोगों के वस्त्र दूषित हो गए तथा अनेकों को भूखे ही लौटना पड़ा. परिस्थिति ऐसी थी जिसमें जिसको जो भी प्राप्त हो पाता उसी पर संतोष करता. किसी को पूड़ी नहीं तो किसी को सब्जी नहीं. किसी को मिष्टान्न नहीं तो किसी को क्खाली पलते भी नहीं मिल पायीं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस घटनाक्रम में दो बातें सामने आती हैं - एक व्यवस्था करने की सक्षमता की तथा दूसरी व्यवस्थापकों की&amp;nbsp;सामंतवादी प्रवृति की. जो व्यक्ति अपने निवास पर इतनी छोटी सी व्यवस्था कर पाने में सक्षम नहीं हैं, वे इस देश को कैसे चला पाएंगे. दूसरे &amp;nbsp;लोकतंत्र में शासक जन-सेवक कहे जाते हैं और होने भी चाहिए. इनका जनसाधारण से इस प्रकार दूरी बनाये रखना इस देश के जनतंत्र पर प्रश्नचिन्ह लगाता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसका तीसरा एवं सर्वाधिक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि लोगों को भोजन के लिए आमंत्रित करके उनके लिए समुचित व्यवस्था न करना आमंत्रित लोगों का घोर अपमान है. संभवतः व्यवस्थापकों का यह भी उद्देश्य हो ताकि क्षत्र के जनसाधारण कभी उनकी सामंतशाही के समक्ष सर न उठा सकें.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4702532971528007953-225202969427907186?l=bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/feeds/225202969427907186/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2009/12/blog-post_21.html#comment-form' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/225202969427907186'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/225202969427907186'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2009/12/blog-post_21.html' title='कांग्रेस संस्कृति : तब और अब'/><author><name>Ram Bansal</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh5.googleusercontent.com/-jGdzYzJKHU4/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAAvI/Zfj435ifJH8/s512-c/photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_UipTUzf-jt0/Sy9nHRe1MoI/AAAAAAAAAVY/cgcvLDZETys/s72-c/gandhi+team.gif' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4702532971528007953.post-5465955941056441993</id><published>2009-12-17T03:32:00.000+05:30</published><updated>2009-12-17T03:32:42.603+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कृष्ण'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ईश्वर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अध्यात्म'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='धर्म'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='देव'/><title type='text'>अकादेमी की महत्वपूर्ण देने</title><content type='html'>अफलातून की अथेन्स में स्थापित अकादेमी की विश्व को सर्वाधिक विनाशकारी देनें ईश्वर, धर्म और अध्यात्म हैं. ईश्वर के नाम से मनुष्यों को भयभीत किया जाता है, धर्म उनकी बुद्धि को सुषुप्त&amp;nbsp; करता है तथा अध्यात्म उन्हें एक अनंत परिनामविहीन&amp;nbsp;यात्रा पर बने रहने को उत्साहित करता है. इन के माद्यम से चतुर लोग जान-साधारण पर सरलता से अपना शासन बनाए रखते हैं. ये सभी पूरी तरह सारहीन हैं तथा मनुष्यों पर केवल मनोवैज्ञानिक प्रभाव बनाये रखती हैं. लम्बे समय तक चलते रहने से ये जान-मानस को एक विकृत संस्कृति के रूप में जकड लेती हैं जिससे इनसे पीछा छुड़ाना सरल नहीं होता. अकादेमी ने इन पर शोध किये और विश्व मानवता को गुलाम बनाने हेतु इनको विकसित किया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहाँ यह स्पष्ट करना प्रासंगिक है कि धर्म उस समय वेदों में प्रयोग किया गया लातिन भाषा का शब्द है जिसका अर्थ 'सोना' या 'सुलाना' है. अकादेमी में इस शब्द का अर्थ बदला और इसे मनुष्यों कि जीवन-चर्या में ईश्वर का प्रासंगिक बना दिया किन्तु इसका प्रभावी अर्थ वही रखा अर्थात ईश्वर के प्रसंग से धर्म द्वारा&amp;nbsp;मनुष्यों कि बुद्धि को सुषुप्त करना. अफलातून तथा अरस्तु दोनों भारत निर्माण प्रक्रिया से प्रभावित थे और इसे अपने अधिकार में लेने को लालायित थे. वस्तुतः ईश्वर, धर्म तथा अध्यात्म जैसे झूठी मान्यताएं&amp;nbsp;विकसित करने के पीछे उनका लक्ष्य भारत पर अधिकार करना था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://www.indianetzone.com/photos_gallery/22/Ved-vyas_13734.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://www.indianetzone.com/photos_gallery/22/Ved-vyas_13734.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;इन शोध परिणामों को कार्यान्वित करने की दिशा में सर्व प्रथम यहूदी धर्म बनाया गया. इसके अनुनायियों का एक विशाल दल भारत में धर्म का प्रसार करने हेतु&amp;nbsp;भेजा गया. यही दल अपने साथ गाय और गन्ना लेकर आया जिनको भारत भूमि पर विकसित किया गया. यह&amp;nbsp;भारत में यदु वंश का आगमन था. यदु वंश का प्रथम मुख्यालय दक्षिण भारत के मदुरै में बनाया गया जिसका तत्कालीन नाम मथुरा था. वेबस्टर dictionary &amp;nbsp;के अनुसार&amp;nbsp;आज के मथुरा का तत्कालीन नाम मूत्र था. इस दल के अनुयायी जान-समुदायों में साधुओं के रूप में स्थापित हो गए और ईश्वर, धर्म और अध्यात्म का प्रचार प्रसार करने लगे.&lt;br /&gt;जब&amp;nbsp;ईश्वर का भय और धर्म का&amp;nbsp;सुषुप्ति प्रभाव लोगों को भ्रमित करने लगा तो विकास कार्य में लगे देवों ने इनका विरोध करना आरम्भ किया जिससे देवों तथा यदुओं में संघर्ष कि स्थिति उत्पन्न हो गयी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अकादेमी ने उक्त संघर्ष में यदुओं कि सहायता&amp;nbsp;के लिए आगे शोध किये और एक गर्भवती&amp;nbsp;यदु स्त्री यशोदा के गर्भ से मूल भ्रूण निकालकर एक अन्य भ्रूण को बैंगनी&amp;nbsp;वर्ण में रंग कर स्थापित कर दिया जिसके परिणाम-स्वरुप बैंगनी वर्ण का कृष्ण उत्पन्न हुआ. इस विशिष्ट रंग के शिशु को ईश्वर का अवतार घोषित कर जोरों से इसका प्रचार प्रसार किया गया. अकादेमी के विशेषज्ञों का एक दल आज के श्रीलंका द्वीप पर ठहरा और कृष्ण को छल-कपट तथा बाजीगरी कि कलाओं में प्रशिक्षित करने लगा. इन कलाओं के माध्यम से जन-साधारण में&amp;nbsp;कृष्ण को ईश्वर के अवतार के रूप में सिद्ध&amp;nbsp;करना सरल हो गया. गोवर्धन पर्वत का उठाना, शेष-नाग को वशीभूत करना आदि इन्ही बाजीगरी कलाओं के रूप थे जिनके माध्यम से जन-साधारण को कृष्ण कि अद्भुत क्षमताओं से प्रभावित किया गया.&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.ljplus.ru/img3/a/n/ananastasia/Shri-Krishna.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="272" src="http://www.ljplus.ru/img3/a/n/ananastasia/Shri-Krishna.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;जैसे-जैसे कृष्ण बड़ा होता गया, उसका ईश्वरीय आतंक देवों के विरुद्ध विकराल रूप धारण करता गया जिसमें उसे जन-साधारण का समर्थन भी प्राप्त हो रहा था. छल-कपटों तथा बाजीगरी कलाओं से देवों को मन-गढ़ंत कहानियों के प्रचार-प्रसार से बदनाम किया जाने लगा तथा उनकी&amp;nbsp;एक-एक करके&amp;nbsp;हत्याएं की जाने लगीं जिनमे कंस, कीचक, जरासंध, रक्तबीज आदि प्रमुख थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहाँ यह स्पष्ट करना भी आवश्यक है कि धर्मावलम्बियों&amp;nbsp;ने कोई ग्रन्थ नहीं लिखा केवल देव ग्रंथों के गलत अनुवाद करके उनमे ईश्वर, धर्म, अध्यात्म, कृष्ण आदि विषयों को आरोपित किया. इस कार्य में शंकराचार्य ने विशेष भूमिका निभायी क्योंकि उस समूह में वही एकमात्र शिक्षित व्यक्ति था. गलत अनुवादों को पुष्ट करने के लिए वेदों तथा शास्त्रों में प्रयुक्त लातिन एवं ग्रीक शब्दावली के अर्थ बदले गए और नए अर्थों को पुष्ट करने के लिए आधुनिक संस्कृत भाषा बनाई जिसका वेदों तथा शास्त्रों की भाषा से कोई सम्बन्ध नहीं है. इन दोषपूर्ण अनुवादों के कारण ही जन-मानस में&amp;nbsp;कृष्ण आज तक भगवन के रूप में स्थापित है. &amp;nbsp; &amp;nbsp;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4702532971528007953-5465955941056441993?l=bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/feeds/5465955941056441993/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2009/12/blog-post_17.html#comment-form' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/5465955941056441993'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/5465955941056441993'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2009/12/blog-post_17.html' title='अकादेमी की महत्वपूर्ण देने'/><author><name>Ram Bansal</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh5.googleusercontent.com/-jGdzYzJKHU4/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAAvI/Zfj435ifJH8/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4702532971528007953.post-7366576894711631602</id><published>2009-12-16T02:19:00.002+05:30</published><updated>2009-12-20T15:10:33.670+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अलेक्सान्दर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अथेन्स'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्लेटो'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अकादेमी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अरिस्तोतले'/><title type='text'>अफलातूनी कारनामा</title><content type='html'>&lt;span style="font-family: Arial; font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-size: 13px;"&gt;आपने पढ़ा कि एक्रोपोलिस पर फिलिप ने आक्रमण कर नगर वासियों&amp;nbsp;को वहां से खदेड़ उस पर अधिकार कर लिया. कैसे हुआ यह सब संपन्न, इस बारे में यहाँ पढ़िए.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family: Arial; font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-size: 13px; line-height: 23px;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://www.freakingnews.com/pictures/41000/Plato-making-a-quick-call--41194.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://www.freakingnews.com/pictures/41000/Plato-making-a-quick-call--41194.jpg" width="257" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-family: Arial; font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-size: 13px;"&gt;उच्च कोटि के विद्वानों में सदैव यह कमी रही है कि उन्हें कोई भी सरलता से ठग सकता है. ऐसा ही हुआ सुकरात महोदय के साथ. अफलातून, जिसे अंग्रेजी में प्लेटो कहा जाता है, उनका शिष्य बन गया और नगर में अकादेमी नामक अपना स्कूल खोल लिया. इस स्कूल में खादिम तैयार किये जाते थे जो अफलातून के दिशा निर्देशों के अनुसार जान-समुदायों को भ्रमित करते थे. अकादेमी में ऐसे भ्रमों को जन्म देने और प्रसारित करने पर शोध किये जाते थे जिनके विवरण अगले अध्याय में दिए जायेंगे.&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family: Arial; font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-size: 13px; line-height: 23px;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family: Arial; font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-size: 13px;"&gt;अफलातून &amp;nbsp;बहुत महत्वाकांक्षी था और विश्व पर अपना शासन स्थापित करना चाहता था जिसका आरम्भ उसने अथेन्स से किया. अथेन्स की&amp;nbsp;&amp;nbsp;जनतांत्रिक व्यवस्था&amp;nbsp;का वह घोर विरोधी था और शासन का अधिकार केवल संभ्रांत लोगों को देना चाहता था. यहाँ रहते हुए उसने नगर राज्य के बारे में जानकारियाँ एकत्र &amp;nbsp;कीं&amp;nbsp;और उनके आधार पर नगर पर आक्रमण करा उसे अपने अधिकार में लेने की&amp;nbsp;योजना बनाई. इसके लिए उसने दोर्रिस नगर के जंगली शासक फिलिप को नगर पर आक्रमण के लिए&amp;nbsp;आमंत्रित किया. इस आमंत्रण और तदनुसार ईसापूर्व ३३८ में&amp;nbsp;आक्रमण द्वारा अच्रोपोल्स को पराजित किया गया जिसके कारण वे भारत पहुंचे. अफलातून ने ही अपने गुरु सुकरात - अंग्रेजी नाम सोक्रेटेस, शास्त्रीय नाम शुक्राचार्य - को विषपान करवाया.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://galileoandeinstein.physics.virginia.edu/lectures/aristot2_files/image002.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://galileoandeinstein.physics.virginia.edu/lectures/aristot2_files/image002.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-family: Arial; font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-size: 13px; line-height: 23px;"&gt;अफलातून का एक विश्वसनीय शिष्य अरस्तु - अंग्रेजी नाम&amp;nbsp;अरिस्तोतले - था. उधर फिलिप का एक पुत्र था जिसका नाम था सिकंदर - अंग्रेजी नाम अलेक्सान्दर. प्लेटो कि मृत्यु के बाद&amp;nbsp;अरस्तु १३ वर्षीय सिकंदर का शिक्षक नियुक्त किया गया&amp;nbsp;जिससे कि उसे बचपन से ही विश्व&amp;nbsp;पर आक्रमण करने के लिए प्रशिक्षित किया जा सके. इसके लिए उसे बुद्धिहीन किन्तु परम शक्तिशाली बनाया गया. वह पूरी तरह अरस्तु पर निर्भर करता था तथा उसके आज्ञाकारी बना रहता था. अरस्तु तथा सिकंदर ने ईसापूर्व ३२६ में अपना विश्व अभियान आरम्भ किया और अफ्रीका तथा एशिया के देशों को पराजित करता हुआ ईसापूर्व ३२३ में भारत पर आक्रमण के लिए पहुंचा.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family: Arial; font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-size: 13px; line-height: 23px;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family: Arial; font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-size: 13px; line-height: 23px;"&gt;इस आक्रमण से पूर्व भारत को निर्बल करने के लिए अफलातून तथा अरस्तु&amp;nbsp; ने अकादेमी के माध्यम से&amp;nbsp;क्या क्या किया इसे पढ़िए अगले खंड में.&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family: Arial; font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-size: 13px; line-height: 23px;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family: Arial; font-size: small;"&gt;&lt;span style="font-size: 13px; line-height: 23px;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4702532971528007953-7366576894711631602?l=bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/feeds/7366576894711631602/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2009/12/blog-post_16.html#comment-form' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/7366576894711631602'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/7366576894711631602'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2009/12/blog-post_16.html' title='अफलातूनी कारनामा'/><author><name>Ram Bansal</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh5.googleusercontent.com/-jGdzYzJKHU4/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAAvI/Zfj435ifJH8/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4702532971528007953.post-6078960170202118721</id><published>2009-12-15T04:05:00.002+05:30</published><updated>2010-03-17T15:45:17.617+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अग्रवाल'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='महेश्वर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भारत'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सुकरात'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ख्रिस्त'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्रह्मा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विष्णु'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विश्वामित्र'/><title type='text'>भारत निर्माण का आरम्भ</title><content type='html'>इस संलेख के&amp;nbsp;कथानकों&amp;nbsp;का काल यह मानकर निर्धारित किया गया है कि सिकंदर का भारत पर आक्रमण ३२३ ईसापूर्व में हुआ जिसे आज विश्व स्तर पर सत्य माना जाता है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब से लगभग २,35० वर्ष पहले आज थाईलैंड कही जाने वाली भूमि पर एक परिवार था 'पुरु' नाम का. इस परिवार के तीन पुत्रों - ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश्वर ने आज के विएतनाम से अफगानिस्तान तक कि भूमि पर एक देश के निर्माण कि ठानी जो तब छुटपुट जंगली बस्तियों के अतिरिक्त जंगलों से भरी थी. हिमालय से सागर तक बहने वाली नदियाँ क्षेत्र को हरा-भरा रखने के लिए पर्याप्त जल प्रदान कर रही थीं और मानव बस्तियों के लिए अनुकूल जलवायु एवं पर्यावरण प्रदान&amp;nbsp;कर रही थीं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पुरु परिवार शिक्षित था और अपने क्षेत्र में सभ्यता का विकास करने में लगा था. अपने अनुभवों को भावी पीढ़ियों के लिए लिखते रहना इसकी परंपरा थी. इसी आलेखन&amp;nbsp;को बाद में वेदों का नाम दिया गया. भारत कि मुख्य भूमि पर आकर इस परिवार ने एक नयी&amp;nbsp;भाषा का विकास आरम्भ किया जिसे 'देवनागरी' नाम दिया गया. उस समय भाषा तथा लिपि एक ही नाम से जानी जाती थीं. इसके बाद वेदों को भी इसी भाषा में लिखा गया. यहीं इस परिवार का सम्बन्ध स्थानीय व्यक्ति 'विश्वामित्र' से बना जो भ्रमणकारी थे और जनसेवा उनका व्रत था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://uropinion.sulekha.com/mstore/uropinion/albums/default/1_DSC00603.JPG" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="240" src="http://uropinion.sulekha.com/mstore/uropinion/albums/default/1_DSC00603.JPG" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;तीनों भाइयों में सबसे बड़े महेश्वर थे जो एक विशालकाय&amp;nbsp;योद्धा थे इसलिए&amp;nbsp;क्षेत्र कि रक्षा का दायित्व इन्हें सोंपा गया. ब्रह्मा सृजन कार्य करते थे और मानवोपयोगी&amp;nbsp;घर, बर्तन&amp;nbsp;तथा अन्य वस्तुएं बनाने में लगे रहते थे. इनका स्वभाव अत्यधिक सौम्य था तथा लोगों के दुःख दर्दों को दूर करने का प्रयास करते थे जिसके कारन सर्वाधिक लोकप्रिय थे. स्वभाव में साम्यता के कारण विश्वामित्र इनके घनिष्ठ मित्र बन गए. विष्णु बुद्धिवादी थे और परिस्थिति तथा&amp;nbsp;समयानुकूल योजना बनाने में लगे रहते थे. तीनो समाज को देने में लगे रहने के कारण लोग इन्हें 'देव' कहते थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उधर आज इजराएल कहे जाने वाले क्षेत्र&amp;nbsp;पर एक बाहरी जंगली जाति ने अपना शाषन स्थापित कर लिया था जिससे स्थानीय जनता दुखी थी जिसके&amp;nbsp;आक्रोश का स्वर&amp;nbsp;एक स्थानीय किशोर 'क्रिस्तोफेर' ने बुलंद करना आरम्भ किया. इस आक्रोश के दमन के लिए क्रिस्तोफेर पर अवैध संतान होने का आरोप लगाकर उसे क्रॉस पर यातना देते हुए मृत्यु दण्ड का प्रयास किया गया. हताहत किशोर के शरीर का औषधीय लेपन से&amp;nbsp;गुप्त रूप में उपचार किया गया जिससे बालक कि जान बच गयी. इस किशोर की बड़ी बहिन मरियम उसे साथ लेकर गुप्त रूप से भारत आ गयी और देवों के साथ इस नव निर्माण कार्य में जुट गयी. गुप्त रहने के लिए भाई-बहिन नौका परिचालन का कार्य करते थे. क्रिस्तोफेर विष्णु के परम मित्र और सहयोगी बने.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसी&amp;nbsp;समय ग्रीस के अथेन्स नगर में एक सभ्यता का विकास किया जा रहा था जिसके अंतर्गत नगर में विश्व की प्रथम जनतांत्रिक शाषन व्यवस्ता स्थापित की गयी. इस नगर राज्य को एक्रोपोलिस कहा जाता था जो चरों और से जंगली जातियों से घिरा था. मसदोनिया के जंगली शाषक फिलिप ने नगर राज्य पर आक्रमण किया और सभ्य नागरिकों को वहां से खदेड़ दिया. इनके शीर्ष विद्वान् सुकरात को विषपान करा मृत्युदंड दे दिया गया. नगर के लोग छिपकर भागते हुए भारत पहुंचे और देवों में मिल गए. इन्होने भारत में आगरा और आसपास के क्षेत्रों को विकसित किया. यहाँ ये लोग अक्रोपोल होने के कारण&amp;nbsp;अग्रवाल कहलाये.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस प्रकार स्थानीय लोगों के साथ मिलकर एक बड़ा समूह भारत निर्माण के कार्य में जुट गया. नयी-नयी बस्तियां बनाने लगीं, भोजन के उत्पादन के&amp;nbsp;लिए कृषि विकसित की जाने लगी. &amp;nbsp; &amp;nbsp;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4702532971528007953-6078960170202118721?l=bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/feeds/6078960170202118721/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2009/12/blog-post_14.html#comment-form' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/6078960170202118721'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/6078960170202118721'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2009/12/blog-post_14.html' title='भारत निर्माण का आरम्भ'/><author><name>Ram Bansal</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh5.googleusercontent.com/-jGdzYzJKHU4/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAAvI/Zfj435ifJH8/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4702532971528007953.post-1957556404364328263</id><published>2009-12-13T05:21:00.000+05:30</published><updated>2009-12-13T05:23:09.226+05:30</updated><title type='text'>जनमानस : अंग्रेजी और भारतीय राज में</title><content type='html'>अब स्वतंत्र भारत के लोकतान्त्रिक राज में लोग कहने लगे हैं कि इससे तो अंग्रेजी राज ही अच्छा था. क्यों पनप रही है यह धारणा जबकि तब से&amp;nbsp;अब तक लोगों के जीवन स्टार में भरी सुधार आया है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विकास केवल भारत का ही नहीं हुआ है किन्तु यह प्रक्रिया विश्व स्तर पर हुई है. विकास एक सापेक्ष परिमाप है, तदनुसार यदि एक समाज दूसरे समाज से अधिक विकास करता है तो दूसरे समाज का पिछड़ना कहा जाएगा. इस दृष्टि से भारत विकास की दर में अनेक देशों से पिछड़ा है. अतः भारत का विकास या यहाँ के लोगों के&amp;nbsp;जीवन स्तर में सुधार कोई अर्थ नहीं रखता. इसे एक प्राकृत प्रक्रिया के अंतर्गत स्वीकार लिया जाता है और इसका श्रेय किसी शाशन को नहीं दिया जा सकता. यहाँ तक की यह भी कहा जा सकता है की भारत के विकास की दर अपेक्षाकृत कम रही है जिसके लिए शाशन उत्तरदायी है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वास्तविक विकास देश के सकल घरेलु उत्पाद से नहीं मापा जा सकता. इसकी सही परिमाप देश के&amp;nbsp;निर्धनतम व्यक्ति के जीवन स्तर में सुधार से किया जाना चाहिए. आज भी भारत का निर्धनतम व्यक्ति लगभग उसी स्तर पर जीवन यापन कर रहा है जिस पर वह अंग्रेजी राज में करता था. अतः उसके लिए देश की स्वतंत्रता तथा इसके सकल घरेलु उत्पाद में वृद्धि कोई अर्थ नहीं रखती. इस दृष्टि से स्वतंत्र भारत के शाषन को असफल ही कहा जायेगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंग्रेजी शाशन में देश की सम्पदा तथा लोगों&amp;nbsp;का शाशकों द्वारा भरपूर शोषण किया जाता था. स्वतंत्रता के बाद&amp;nbsp;इस शोषण में जो परिवर्तन आया है उसका प्रभाव केवल शाषक वर्ग पर पड़ा है जिसमे राजनेता तथा राज्यकर्मी सम्मिलित हैं. जनसाधारण तथा व्यवसायी वर्ग का शोषण उतना ही हो रहा है जितना अंग्रेजी राज में होता था. अतः इन वर्गों को&amp;nbsp;शाषन परिवर्तन का कोई लाभ प्राप्त नहीं हुआ है. इस कारन से शाषन के प्रति इनकी भावना आज भी वैसी ही है जैसी अंग्रेजी शाषन के प्रति थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.hindu.com/fline/fl2218/images/20050909001107802.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://www.hindu.com/fline/fl2218/images/20050909001107802.jpg" width="316" /&gt;&lt;/a&gt;भारत में&amp;nbsp;अँगरेज़ शाषक शोषण चाहे जितना भी करते रहे हों, वे अपनी रानी के प्रति निष्ठावान थे और इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि वे अनुशाषित थे. अंग्रेजी राज में जनसाधारण छल-कपट से दूर था. वह अपनी दयनीय निर्धन अवस्था में ईमानदारी के साथ&amp;nbsp;परिश्रम करके अपना भरण-पोषण करता था. न्याय व्यवस्था ठीक थी, अपराधियों को दण्ड दिया जाता था और जनसाधारण सुरक्षित था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्वतंत्र भारत का शाषक वर्ग न तो किसी के प्रति निष्ठावान है और न ही अनुशाषित. छल-कपट और भ्रष्टाचार उनकी रग-रग&amp;nbsp;में बसा है. इसका प्रभाव&amp;nbsp;व्यापक रूप से जनमानस पर पड़ा है. आज जनमानस भी अपने नेताओं से प्रेरणा पाता हुआ भृष्ट और बेईमान हो गया है. सार्वजनिक सम्पदा कि चोरी आम बात हो गयी है जिसका कोई प्रतिकार शाशको के पास नहीं है क्योंकि वे सब भी यही कर रहे हैं. सामाजिक अपराधों&amp;nbsp;में वृद्धि हुई है जिससे जनसाधारण असुरक्षित हो गया है.&amp;nbsp;न्याय व्यवस्था चरमरा गयी है तथा अपराधी वर्ग ने राजनैतिक सत्ता हथिया ली है जिससे जनसाधारण असुरक्षा कि भावना से पीड़ित है.&amp;nbsp;जनमानस में इस परिवर्तन के कारण ही अंग्रेजी राज को भारतीय राज से अच्छा कहा जाने लगा है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4702532971528007953-1957556404364328263?l=bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/feeds/1957556404364328263/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2009/12/blog-post.html#comment-form' title='14 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/1957556404364328263'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/1957556404364328263'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2009/12/blog-post.html' title='जनमानस : अंग्रेजी और भारतीय राज में'/><author><name>Ram Bansal</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='//lh5.googleusercontent.com/-jGdzYzJKHU4/AAAAAAAAAAI/AAAAAAAAAvI/Zfj435ifJH8/s512-c/photo.jpg'/></author><thr:total>14</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4702532971528007953.post-7071204386198684222</id><published>2009-12-12T09:43:00.000+05:30</published><updated>2009-12-12T14:34:59.017+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सम्प्रदाय'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अध्यात्म'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='स्वतंत्रता'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भारत'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='धर्म'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जनमानस'/><title type='text'>पृष्ठभूमि</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_UipTUzf-jt0/SyNDM87VhnI/AAAAAAAAATw/GwYZRbuJ-68/s1600-h/india-map-flag.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://2.bp.blogspot.com/_UipTUzf-jt0/SyNDM87VhnI/AAAAAAAAATw/GwYZRbuJ-68/s400/india-map-flag.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;मध्य प्रदेश के एक विचारक से टिप्पड़ी के माध्यम से अचानक परिचय हुआ और उनके विचार पढ़ने का संयोग हुआ. अपना नाम तो वे सही नहीं प्रकाशित करते किन्तु स्वयं को &lt;a href="http://www.blogger.com/profile/16479285471274547360"&gt;असुविधाजनक&lt;/a&gt; कहते हैं. बहुत&amp;nbsp;अच्छा लिखते हैं - भाषा और ज्ञान दोनों दृष्टियों से. विश्व-संजोग (इन्टरनेट) पर हिंदी में ऐसा अच्छा&amp;nbsp;आलेखन और कहीं देखने को नहीं मिला. उन्हीं से प्रेरणा पाकर इस नए जोगालेख (ब्लॉग) का आरम्भ किया है ताकि हिंदीभाषियों तक अपने&amp;nbsp;विचार पहुंचा सकूं.&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;यों तो मैं अपने १२ अन्य जोगालेखों के माध्यम से विश्व समुदाय से सम्बद्ध हूँ तथापि हिंदी में जोगयेख का यह प्रथम प्रयास है, इसलिए कुछ भूलचूकें स्वाभाविक हैं जीसके लिए मैं पाठकों से अग्रिम क्षमा याचना करता हूँ. मुद्रण माध्यम से बहुत कुछ लिखा है और प्रकाशित किया है इसलिए हिंदी में लिखने में मुझे कोई कठिनाई नहीं है तथापि शब्दानुवाद के माध्यम से लिखने का यह प्रथम अवसर है.&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;मूलतः भारत की&amp;nbsp;वर्त्तमान स्थिति से मैं बहुत दुखी हूँ जिसे व्यक्त करने के लिए लिखता हूँ. अपने इंजीनियरिंग व्यवसाय को लगभग १६&amp;nbsp;वर्ष पूर्व त्याग कर भारत के इतिहास और शास्त्रों का अध्ययन आरम्भ किया था जिससे पाया की भारत को गुप्त वंश के शासन से पूर्व तथा पश्चात अनेक प्रकारों से ठगा जाता रहा है जिनमें से सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण ठगी लोगों को&amp;nbsp;ईश्वर के भय से आक्रांत कर अध्यात्म,&amp;nbsp;धर्म और सम्प्रदायों के माध्यम से की गयी है.&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;इन ठगियों का कारण केवल सामाजिक न होकर राजनैतिक रहा है. लोगों के मानस का पतन कर उन्हें बौद्धिक चिंतन से विमुख किया जाता रहा है और उनपर&amp;nbsp;निरंकुश शाशन के माध्यम से उनका&amp;nbsp;अमानवीय शोषण&amp;nbsp;किया जाता रहा है. इसके परिणामस्वरूप देश पर चोर, ठग और डाकू अपना शाशन स्थापित करते चले आ रहे हैं. &amp;nbsp;यह स्थिति लगभग २,००० वर्षों से वर्त्तमान तक चल रही है और जनमानस अपना सर उठाने का साहस नहीं कर पा रहा है. छुटपुट व्यक्ति जो इस सतत दमन के विरुद्ध अपना स्वर उठाते रहें&amp;nbsp;हैं उन्हें कुचला जाता रहा है.&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;स्वतंत्रता के&amp;nbsp;बाद देश पर लोकतंत्र थोपा गया जबकि जनमानस इसके लिए परिपक्व&amp;nbsp;नहीं था और न ही स्वतंत्र भारत की सरकारों ने जनता को स्वास्थ, शिक्षा और न्याय प्रदान कर उसे लोकतंत्र हेतु सुयोग्य बनाने का कोई प्रयास किया है. अतः २,००० वर्षों से चली आ रही गुलामी आज भी जारी है. देश में सुयोग्यता और बोद्धिकता का कोई सम्मान न होने के कारण बुद्धिवादी या तो देश से&amp;nbsp;पलायन कर जाते हैं या दमनचक्र में पीस दिए जाते हैं. &lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;इस सबसे दुखी होकर गाँव में रहता हूँ ताकि अनाचार से न्यूनतम सामना हो. यहीं से अपना अध्ययन और लेखन कार्य करता हूँ. जहां अवसर पाता हूँ अनाचार&amp;nbsp;के विरुद्ध संघर्ष करता हूँ. किन्तु इस संघर्ष में स्वयं&amp;nbsp;को अकेला ही खड़ा पता हूँ &amp;nbsp;क्योंकि जनमानस अभी भी संघर्ष करने को तैयार नहीं है.&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4702532971528007953-7071204386198684222?l=bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/feeds/7071204386198684222/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2009/12/welcome.html#comment-form' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/7071204386198684222'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4702532971528007953/posts/default/7071204386198684222'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhaarat-tab-se-ab-tak.blogspot.com/2009/12/welcome.html' title='पृष्ठभूमि'/><author><name>Ram Bansal</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' 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